श्री रानी सती की अमावस्या
(रानी सती की अमावस्या अग्रवालों से संबंधित है क्योंकि वे अग्रकुल से थीं।)
1. रानी सती झुंझुनू राजस्थान की थीं। अतः उनका लगभग 400 वर्ष पुराना मुख्य मंदिर वहीं पर है। वैसे भारत में रानी सती के 125 से भी अधिक मंदिर हैं।
2. रानी सती की अमावस्या भाद्रपद मास की अमावस्या के दिन आती है।
3. कई अग्रवाल परिवारों में इसका व्रत किया जाता है।
4. इस दिन रानी सती की पूजा लगभग सभी अग्रवाल परिवारों में की जाती है।
5. पूजा के लिए की जाने वाली तैयारियां -
- स्नान आदि करके शुद्ध होकर पूजा करें।
- रानी सती की तस्वीर (यदि उपलब्ध हो तो) रखलें।
- तस्वीर के सामने रखकर एक स्वच्छ पटिये पर स्वस्तिक बना लिया जाता है।
- हमारे यहां गुड़ की 25 पपड़ियां और पांच आटे के दिए बनाए जाते हैं। उनमें घी की बत्तियां लगा लेते हैं।(अलग अलग परिवारों में पूजन की विधि अलग हो सकती है )
- घी का दीपक, आरती का दीपक, अगरबत्ती , जल, पूजा की सुपारी, कंकु, लच्छा, अक्षत, हल्दी, मेंहदी, फूल आदि एकत्र करलें।
6. पूजन की विधि -
चित्रः रानी सती की चौकी
- इसमें हम सामान्य पूजन ही करते हैं।
- सर्वप्रथम पटिए पर पांच स्थानों पर गुड़ की पांच पांच पापड़ियों को एक के ऊपर एक जमाकर रख देते हैं। प्रत्येक गिड्डी पर आटे का दिया रख देते हैं।
- घी का दीपक एवं अगरबत्ती प्रज्वलित कर लेते हैं।
- पूजा की सुपारी के गणपती बनाकर चैकी पर रख लेते हैं एवं उस पर जल छिड़ककर, लच्छा, कंकू, अक्षत, लगाकर उनकी पूजा कर लेते हैं।
- पापड़ियों पर रखे पांचों दीपक प्रज्वलित कर लेते हैं। अब तस्वीर पर एवं पापड़ियों के पास जल, लच्छा, कंकू, अक्षत, हल्दी, मेंहदी, पुष्प, दक्षिणा चढ़ा कर आरती घूमा लेते हैं।
- अंत में उस पटिए के समक्ष धोक लगाकर पूजन को समाप्त कर लेते हैं। परिवार के सभी सदस्य धोक लगाते हैं।
7. श्री रानी सती दादी मां की कथा (वैसे कथा वाचन की जानकारी नहीं है परंतु सभी की जानकारी के लिए यह कथा संक्षेप में दी जा रही है। वैसे सामान्यतः हर पूजा के बाद कथा कही जाती है उसी प्रकार यह कथा भी कही जा सकती है ताकि रानी सती के बारे में अग्रकुल के लोग उसे जान सकें। ) -
महाभारत का युद्ध चल रहा था। अर्जुन युद्ध भूमि से दूर जा चुके थे। कौरवों ने चक्रव्यूह की रचना की। वीर किशोर अभिमन्यु उस चक्रव्युह को भेदकर अंदर प्रवेश कर गया। लेकिन उसकों चक्रव्यूह से बाहर निकलना नहीं आता था। युद्ध में कौरवों के सात महारथियों के हाथों अभिमन्यु वीर गति को प्राप्त हुए। श्री कृष्ण जब अर्जुन के साथ लौटे तो अभिमन्यु की पत्नी उŸारा को सात्वना देते हुए उन्होंने वरदान दिया कि तू कलियुग में नारायणी एवं श्री सती दादी के नाम से विख्यात होगी और सारी दुनिया में पूजित होगी।
दादी सती का जन्म संवत 1638, कार्तिक शुक्ला नवमीं के दिन रात 12 बजे डाकवा गांव के सेठ श्री गुरवामल जी के यहां हुआ। उनका नाम नारायणी बाई रखा गया। उनको धार्मिक, शस्त्र, घुड़सवारी की शिक्षा प्रदान कराई गई। उनका विवाह हिस्सर(हिसार) राज्य के दीवान सेठ श्री जालीराम जी के पुत्र श्री तनधन दासजी के साथ मगसिर शुक्ला नवमीं सन 1352 को हुआ। हिसार राज्य में नवाब का राज था। नवाब के पुत्र और श्री तनधन दासजी में अच्छी मित्रता थी। श्री तनधन दास जी के पास एक सुंदर घोड़ी थी। वह घोड़ी नवाब के पुत्र को पसंद आ गई। घोड़ी को पाने के विवाद में शहजादा मारा गया। इस हादसे से घबराकर श्री तनधन दास जी के पिताजी रातों रात राज्य छोड़कर पलायन कर झुंझुनू पहुंच गए। झुंझुनू के राणा की सेना अधिक ताकतवर थी अतः नवाब से परेशान लोग वहां आकर बसते गए।
श्री तनधन दास जी मुकलावे के बुलावे पर कुछ सैनिकों को लेकर महम पहुंचे। मंगसिर कृष्णा नवमीं सन 1352 को श्री तनधन दासजी नारायणी देवी को लेकर विदा होकर झुंझुनू के लिए रवाना हुए। नवाब को इसकी खबर लग गई थी। देवसर की पहाड़ी के पास पहुंचते ही नवाब ने घात लगाकर हमला कर दिया। युद्ध के दौरान एक सैनिक ने धोखे से पीछे से वार कर तनधन दास जी को मार दिया। इस दृश्य को डोली में बैठी नारायणी ने देखा एवं क्रुद्ध हो देवी चंडिका का रूप धर सारे दुश्मनों का सफाया कर दिया। राणा को यह समाचार मिला तो उन्होंने देवी रूप धारी नारायणी से अस्त्र शस्त्र त्यागने की विनती कर उन्हें शांत किया। उन्होंने राणाजी से सती होने के लिए चिता की व्यवस्था करवाई। तैयारी होने में सूर्यास्त होने लगा तो कहते हैं कि उन्होंने अपने सत बल से सूर्य को अस्त होने से रोक दिया एवं पति के शव को अपनी गोद में लेकर सती हो गई।
चिता में से देवी रूप मे सती प्रकट हुई और बोली कि मेंरी चिता की भस्म घोड़ी पर रखकर ले जाना एवं जहां घोड़ी रूक जाए वही स्थान मेंरा निवास होगा। मैं वहां रहकर जन जन का कल्याण करूंगी साथ ही वरदान दिया कि मेंरे नाम से पूर्व तुम्हारा नाम आएगा। इसी कारण रानी सती नाम प्रसिद्ध हुआ। राणा जी द्वारा झुँझुनू में जिस जगह घोड़ी रूकी उसी जगह भव्य मंदिर बनाया गया।
अनुकरणीय संदेष
- कैसी भी विपरित हो सदैव आत्मविश्वास एवं वीरता से उसका सामना करना चाहिए।
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