सोमवार, 19 जनवरी 2026

ध्वजा : एक पावन धार्मिक प्रतीक A Sacred symbol of Hindu Dharm

   



ध्वजा 

अन्य नाम: झंडा, झंडी, पताका

ध्वजा: हिंदु धर्म में ध्वजा एक कपड़ा नहीं अपितु एक पवित्र प्रतीक है जो कि आध्यात्मिक महत्व रखता है। यह प्रतीक होता है विजय, देवत्व, समर्पण, पवित्र स्थान, सांस्कृतिक विरासत का। सनातन धर्म एवं बोद्ध धर्म के संतों, साधुओं, सन्यासियों द्वारा इसका उपयोग किया जाता है। मंदिरों के शिखर या किसी स्थान पर इसका लगा होना उस स्थान पर पवित्र देवस्थान की उपस्थिति को दर्षाता है। प्राचीन सेनाओं के रथों पर यह ध्वज लगे होते थे।

हिंदु धर्म ध्वजा की संरचना: यह सामान्यतः भगवा रंग की होती है। मंदिरों के शिखर पर सामान्यतः लहराती ध्वजा त्रिभुजाकार होती है। दो भागों में लहराती ध्वजा का उपयोग बहुत होता है। दक्षिण में तिरंगी भी होती है। कई मंदिरों में लाल , सफ़ेद रंग की ध्वजाएं भी होती हैं। 

ध्वजा का माहात्म्य: 

  • देवत्व एवं संरक्षण का प्रतीक: किसी भी मंदिर के शिखर पर लहराती ध्वजा उस पवित्र स्थान में देवीय शक्ति की उपस्थित की द्योतक होती है। वह पवित्र स्थान के आभा मंडल को दर्शाती  है जो कि भक्तों को ईश्वर  प्राप्ति हेतु मार्गदर्षित  करती हैं। वह इस बात के लिए आश्वस्त करती हैं कि आप नकारात्मक शक्तियों  से सुरक्षित हैं। मान्यता है कि मंद बयार में लहराती ध्वजा मंदिर एवं भक्तों के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है ताकि वे होने वाली हानियों से बचे रहें और सदेव सुखी रहें। 
  • विजय एवं आनंद की द्योतक: सनातन धर्म में ध्वजा नकारात्मक शक्तियों पर विजय से अर्जित आनंद का प्रतीक है। ब्रह्मांड में सामंजस्य, समरसता, एकता, तारतम्य  बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध देवीय शक्तियों से संबंद्ध होती है ध्वजा। शिखर पर लहराती ध्वजा भक्तों को अपनी आध्यात्मिक यात्रा को संरक्षित रखने के लिए न केवल प्रेरित करती है अपितु वह उनकी आस्था, प्रतिबद्धता एपं संकल्प को निरंतर स्मरण कराती रहती है। इससे भक्त आध्यात्मिक यात्रा में आने वाली बाधाओं को पार कर अपने चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकें। 
  • त्याग, भक्ति एवं समर्पण की अभिव्यक्ति: मंदिर के शिखर पर ध्वजा चढ़ाना भक्ति एवं समर्पण का पवित्र कृत्य माना जाता है। भौतिक लाभों को त्याग कर निस्वार्थ सेवा एवं भक्ति का प्रतीक है। यह भगवान के प्रति पूर्णतः समर्पित होकर अपने जीवन को आध्यात्मिक सिद्धांतों से जुड़ जाने की ईच्छा को प्रतिबिंबित करता है। भक्त द्वारा चढ़ाई गई ध्वजा का लहराना भक्त की प्रार्थना को भगवान के द्वारा स्वीकार कर लिए जाने एवं आशिर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
  • ध्वजा प्रतीक है पवित्र स्थल एवं समय का: ध्वजा द्योतक होती है उस स्थान की पवित्रता का जहां देवत्व एवं सांसारिकत्व परस्पर मिलता है। यह केंद्रीय बिंदु होता है धार्मिक क्रियाओं, उत्सव, त्यौहारों, आध्यात्मिक ऊर्जाओं के मिलन से बनने वाले वृहदाकार आभामंडल एवं मंगलकारी अवसर का। ध्वजा समय का द्योतक भी होती है, उसकी परछाई, रंग आदि के बदलने से इसका अनुमान लगाया जाता है।
  • सांस्कृतिक एवं प्रतीकात्मक परंपराओं का प्रतिबिंब: ध्वजा का रंग, आकृति आदि धर्म, संप्रदाय, परंपराओं, संस्कृतियों के अनुसार भिन्न भिन्न होते हैं। हर ध्वजा का एक अद्वितीय प्रतीकात्मक अर्थ होता है। यह आराध्य देवीय शक्ति एवं सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व करती है। दक्षिण भारत के तिरंगी ध्वजाओं से उत्तर भारत की भगवा ध्वजाएं आध्यात्मिकता की शक्तिशाली प्रतीक होती हैं।
  • ज्ञान, शुद्धता, शास्वत और अनंतता का प्रतीक: यह ज्ञान के प्रकाश , मन की शुद्धता, सनातन परंपरा के शास्वत एवं अंनत होने का प्रतीक है। 

भगवा रंग ही क्यों: प्राचीन काल से प्रकृति में भगवा रंग विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होता रहा है पलाश , सेमल आदि वृक्षों के फूलों से यह रंग प्राप्त होता है। उस रंग में किटाणु रोधी गुण पाए जाते हैं। नारंगी रंग में ऊर्जा की प्रचुरता होती है जो व्यक्ति में शौर्य की भावना उत्पन्न करती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार केसरिया रंग सूर्यास्त और अग्नि का रंग है।

श्री माधव सदाषिवराव गोलवलकर जी के वचन(रा स्व स के द्वितीय  पूज्य प्रमुख ): भगवाध्वज अनादिकाल से हमारे धर्म, संस्कृति, परंपराओं, और आदर्शों  का प्रतीक रहा है। यह यज्ञ की पवित्र अग्नि के रंग को, जो आदर्शवाद  की अग्निशिखा  में आत्मबलिदान करने का संदेश  देती है तथा विश्व  में सभी और अंधकार दूर कर प्रकाश  फैलाने वाले उदयोन्मुख तेजस्वी सूर्य के नारंगी रंग को अपने में मूर्तिमान करता है।

राष्ट्रीय स्वयं संघ भगवा ध्वज को अपना गुरु मानता है।



शनिवार, 17 जनवरी 2026

खड़ाऊ एक अत्यंत पावन प्रतीक KHADAU A Sacred Symbol of Hindu Dharma

   


खड़ाऊ एक अत्यंत पावन प्रतीक
  

अन्य नाम: पादुका

खड़ाऊ का अर्थ: लकड़ी से निर्मित चप्पल को खड़ाऊ कहते हैं। चपटी लकड़ी की पट्टी पर पांव के अंगुठे और अंगुलियों के मध्य में पकड़ने के लिए एक नॉब जैसी आकृति लगी होती है। 

खड़ाऊ की लकड़ीः ये नीम, शीशम, पलास, आम, बबूल जैसे पेड़ों की लकड़ी से बनाई जाती हैं।

खड़ाऊ का माहात्म्य: भारतीय साधुओं सनातन, जैन, बौद्ध धर्म के संत एवं साधुओं द्वारा पैरों में पहनने के लिए खड़ाऊ का उपयोग किया जाता है। वस्तुतः खड़ाऊ का उपयोग वैदिक काल में ऋषि मुनि  किया करते थे। धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।

सांस्कृतिक महत्व: रामायण में भगवान राम के वनवास के पश्चात भरत ने उनके खड़ाऊ को सिंहासन पर रखकर शासन किया था जो कि इसके महत्व को अभिव्यक्त करता है।

धार्मिक महत्व: अहिंसा के चलते साधु संतों द्वारा चमड़े का उपयोग किया जाना वर्जित था। अतः वे लकड़ी से निर्मित खड़ाऊ का उपयोग किया करते थे। संतों द्वारा तप तपस्या से अर्जित विद्युत शक्ति पृथ्वी में न चली जाए इसलिए लकड़ी की खड़ाऊ विद्युत प्रवाह को अवरोधित करती है एवं अर्जित शक्ति मानव तन में संचित होती रहती है।

स्वास्थ्य संबंधी महत्व: यजुर्वेद में उल्लेख मिलता है कि खड़ाऊ पहनने से कई रोगों से हमारी रक्षा होती है। खड़ाऊ पहनने से तलवे की मांसपेशियां शक्तिशाली बनती हैं। शरीर में रक्त प्रवाह सही रहता है। मानव तन में सकारात्मक ऊर्जा का सृजन होता है। शरीर का संतुलन सही रहने से रीढ़ की हड्डी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रक्त संचार के सही रहने से मानसिक थकान दूर होती है। ऐसी भी मान्यता है कि अंगुठे एवं अंगुलियों के मध्य खड़ाऊ को पकड़ने से मन पर नियंत्रण होने से क्रोध पर भी नियंत्रण रहता है।

वर्तमान स्थिति:  आज भी कई संत खड़ाऊ का उपयोग करते हैं। कुछ लोग एथनिक वियर के रूप में फैशन के लिए भी पहनते हैं।

  





कमंडल एक पावन प्रतीक Sacred symbol of Sanatan Kamandal



 कमंडल   

अन्य नाम: कमंडलू, कमंडलम

कमंडल की आकृति: यह सामान्यतः अंडाकार या गोलाकार आकृति का खोखला पात्र होता है जिसके मुंह पर हैंडल लगा होता है। प्राचीन समय में और आज भी यह सूखी लौकी(तुंबा), नारियल की खोल, मिट्टी या धातु से बनाया जाता है। आजकल धातु से निर्मित कमंडल ही अधिक प्रचलन में हैं।

कमंडल का माहात्म्य: साधु संन्यासियों द्वारा कमंडल का उपयोग किया जाता है। सनातन संत, जैन साधू एवं बौद्ध साधू आज भी इसका उपयोग करते हैं। कई देवी देवताओं के हाथ में भी कमंडल दर्शाया  जाता है। सामान्यतः यह पीने के जल को रखने में प्रयुक्त होता है। परंतु देवी देवताओं के हाथ में इसका होना आध्यात्मिक अर्थ रखता है। यह पवित्रता, सादगी, आत्मसंयम, ज्ञान के भंडार आदि का प्रतीक है। पौराणिक कथाओें में भगवान शिव एवं ब्रह्मा के हाथ में कमंडल पवित्र नदियों के उद्गम का प्रतीक माना गया है। कमंडल की रिक्तता और शुद्धिकरण की प्रक्रिया मानव के अंतर्मन के बुरे विचारों यथा लोभ, क्रोध और सांसारिक ईच्छाओं के त्याग, सांसारिक मोह से विरक्ति का प्रतीक है। देवी ब्रह्मचारिणी के हाथ में कमंडल उनकी देवीय शक्ति का प्रतीक है। शिवजी के हाथ में दर्शाया  गया कमंडल ब्रह्मांडीय ऊर्जा एवं सृष्टि सृजन को दर्शाता  है। 

पूजन, अनुष्ठान एवं परंपराओं में कमंडल:

पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों में  कमंडल के जल से अभिषेक और शुद्धिकरण किया जाता है। बौद्ध धर्म में कमंडल रखना जीवन के अमृत का प्रतीक है। जैन साधु जल एवं भोजन सामग्री रखने के लिए कमंडल का उपयोग करतेे हैं। कमंडल केवल जल या अन्य सामग्री रखने का प्रतीक मात्र नहीं अपितु एक गहरा आध्यात्मिक प्रतीक है जो कि मन की पवित्रता और आध्यात्म के पथ पर अग्रसर रहने हेतु प्रेरित करता है।


बुधवार, 7 जनवरी 2026

बेलपत्र/बिल्व वृक्ष/ बिल्वा एक अत्यंत पवित्र वृक्ष

   

बेलपत्र/बिल्व वृक्ष/ बिल्वा  

बेलपत्र: एक अत्यंत पवित्र बेलवृक्ष का पत्ता बेलपत्र है। 

बेल के अन्य नाम: विली, श्रीफल, शैलपत्र, शिवेष्ट, बिलूबम, बिल्वयु 

बेलपत्र की आकृति: मुख्यतः यह तीन पत्तों का एक समूह होता है। कभी कभी पांच पत्तियों का समूह भी प्राप्त हो जाता है जिसे बहुत अधिक पवित्र माना जाता है।

बेलपत्र का धार्मिक माहत्म्य: बेलपत्र शिवजी को सबसे अधिक प्रिय है। इसे भगवान शिव की पूजा के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। तीन पत्रों को ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश  का प्रतीक माना जाता है। इसे शिव के तीन नेत्रों का प्रतीक भी माना जाता है। प्रकृति के तीन गुणों सत्व, रज और तम का प्रतीक भी माना जाता है। घर में बेलवृक्ष का होना शुभ और फलदायी माना जाता है। घर की उत्तर/ईशान दिशा  में इसे लगाना वास्तु के अनुसार श्रेष्ठ माना जाता है। इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होकर सकारात्मकता का वातावरण बनने के साथ ही पर्यावरण में शुद्धता आती है। परिवार में सुख-शांति  एवं समृद्धि आती है। ऐसी मान्यता है कि परिवार में वंश  का नाश  नहीं होता है।

पूजन में प्रयुक्त किए जाने वाले बेल पत्र की विषेषताएंः बेल पत्र कीड़े लगा या खंडित नहीं होना चाहिए। उसे सोमवार, अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्थी को नहीं तोड़ना चाहिए। ताजा पत्र चढ़ाना श्रेष्ठ होता है। परंतु उपलब्ध न होने पर एक ही बेलपत्र को शुद्ध जल से धोकर पुनः प्रयुक्त करने का शास्त्रों में प्रावधान किया गया है।

बेलपत्र के औषधीय गुण और लाभ: पाचन तंत्र हेतु यह बहुत लाभकारी होता है। कब्ज, गैस, अम्लीयता, पेट फूलना जैसी समस्याओं में यह राहत देता है। मधुमेह और रक्तदाब को नियंत्रित करता है। यकृत एवं गुर्दों को डिटाॅक्स (विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालना) करता है। पत्तियां चबाने से मुंह के छाले व बदबू ठीक होती है। तनाव और मानसिक थकान को दूर करता है और एकाग्रता बढ़ाने में सहायक होता है। त्वचा पर चमक लाता है और बालों  के झड़ने को कम करता है। अस्थमा और श्वसन संबंधी समस्याओं से लड़ने में सक्षम बनाता है। बलगम साफ करता है। 

यह एक अच्छा एंटी आक्सीडेंट होता है। यह एंटी बैक्टीरियल, एंटीवायरल, एंटी फंगल गुणों से भरपूर है। इससे यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है और विभिन्न संक्रमणों से बचाव करता है।

पोषक तत्व जैसे विटामिन ए, बी, सी, बी1,बी6, कैल्सियम, और फाइबर से भरपूर होता है।

खाली पेट चबाकर या काढ़ा बनाकर सेवन किया जाता है।

बिल्वा: बेल के वृक्ष पर लगने वाले फल को बिल्वा/बेल कहते हैं। पके हुए फल के वे सभी लाभ हैं जो कि बेलपत्र में होते हैं। इसके जूस का सेवन ग्रीष्मकाल में करने से न केवल शीतलता प्रदान करता है अपितु लू से भी बचाव करता है। इसकी चटनी बनाकर उसे संरक्षित कर इसका उपयोग किया जाता है। बिल्व के चुर्ण का भी उपयोग कई व्याधियों से बचाव एवं चिकित्सा में प्रयुक्त होता है।

बेलवृक्ष के उपयोगः बेल वृक्ष का हर अपयव आयुर्वेद में प्रयुक्त किया जाता है। पत्ते, बाल फल, अधपका फल, पका फल, बीज, छाल एवं जड़ सभी उपयोगी होते हैं संभवतः इसी कारण यह सबसे पवित्र वृक्षों में सम्मिलित है।

 


सोमवार, 5 जनवरी 2026

संकष्ट चतुर्थी/माही चौथ (तिल चौथ ) एवं उसकी लोक कथा

 


 


संकष्ट चतुर्थी/माही चौथ (तिल चौथ ) एवं उसकी लोक कथा

(माही चौथ /तिल चौथ  माघ मास के कृष्ण पक्ष में आती है। )

1 पूजन विधिः

   जैसे प्रत्येकचौथ  की पूजा होती है वैसे ही करना है। केवल आज के दिन तिलकुट्टे का उपयोग और होता है।

2 माही चौथ की लोक कथा:-

एक साहूकार-साहूकारनी थे। उनके संतान नहीं होती थी। एक दिन साहूकारनी ने पड़ोसन को माही चौथ का व्रत करते देखा। उससे उसका माहात्म्य पूछकर उसने कहा कि यदि मेरे गर्भ ठहर गया तो मैं सवा सेर का तिल कुट्टा और चौथ माता का व्रत करूँगी। जब गर्भ ठहर गया तो बोली कि मेरे पुत्र होगा तो ढाई सेर का तिल कुट्टा और चौथ माता का व्रत करूँगी, पुत्र भी हो गया तो बोली कि बेटे का विवाह हो जाएगा तो सवा मन का तिल कुट्टा और चौथ माता का व्रत करूँगी। चौथ माता ने सोचा कि ये तो अपनी बात को टालती जा रही है उसका पालन नहीं कर रही है ऐसी महिला को तो सीख देना चाहिए अन्यथा यह तो लोगों को ऐसे ही मुर्ख बनाती रहेगी। जब विवाह वाले दिन तीन फेरे पूरे हो गए तो चौथ माता ने अपने प्रभाव से दूल्हे रूपी बेटे को उठा कर एक बड़े पीपल के पेड़ पर बैठा दिया। कई दिन तक दूल्हे की खोज होती रही पर नहीं मिला। जब गणगौर आई तो युवतियाँ पीपल के पेड़ के नीचे दूब लेने के लिए जाती। पीपल पर बैठा हुआ दुल्हा एक युवती से हमेशा  एक ही बात बोलता - आ मेरी अधब्याहेड़ी। यह बात सुनकर वो डर के कारण दुबली होने लग गई। उसकी माँ एक दिन उससे बोली कि मैं तुझे इतना खाने को देती हूँ फिर भी तू क्यों सूखे जा रही है। इस पर उसने उसकी माँ से बताया कि एक दूल्हे की पोशाक में पीपल पर बैठा युवक मुझसे कहता है कि आ मेरी अधब्याहेड़ी। सबकुछ सुनकर उसकी माँ ने खुद जाकर देखा। उसने कहा अरे ये तो तेरा दूल्हा ही है। माँ ने उससे पूछा कि जमाईसा आप वहाँ क्यों बैठे हैं? उसने बताया कि मैं तो चौथ माता के रहन पड़ा हुआ हूँ। मेरी माँ ने चौथ माता का व्रत और तिल कुट्टा करने का बोला था पर किया नहीं। इस लिए चौथ माता मुझे उठा लाई और यहाँ पीपल पर बैठा दिया। युवती की माँ साहूकारनी के पास गई और सारी बात बताई। तो साहूकारनी बोली कि हे चौथ माता मैं ढाई मन का तिलकुट्टा करूँगी। तब चौथ माता ने प्रसन्न होकर दूल्हे को फेरे में लाकर बैठा दिया और धूमधाम से विवाह हो गया। फिर इस बार साहूकारनी ने गलती नहीं की और पूर्ण श्रद्धा भाव से चौथ माता का व्रत और तिलकुट्टा किया। 

  हे चौथ माता जैसे साहूकारनी के बेटे बहु को मिलाया उसी प्रकार सबके बेटे बहु को मिलाए रखना।

अनुकरणीय संदेश -

  • अपने वचनों पर कायम रहें।

3 गणेश जी की कथा:--

एक देवरानी जेठानी थी। देवरानी धनवान और जेठानी बहुत गरीब थी। जेठानी देवरानी के घर पर काम करती थी। वहाँ पर जिस कपड़े से वह आटा छानती थी उसे अपने घर ले जाकर उसे पानी में धोकर वह पानी अपने पति को पीने के लिए दे देती। एक दिन देवरानी के बच्चों ने ताईजी को यह करते हुए देख लिया। उन बच्चों ने घर जाकर सारी बात माँ से बता दी। यह सुनकर देवरानी को बहुत गुस्सा आया। अगले दिन जब जेठानी आई तो उसने उसे कहा कि तुम आटा छानने का कपड़ा यहीं छोड़कर तथा हाथ धोकर फिर घर जाओगी। उस दिन जेठानी ने ऐसा ही किया। जब घर पर पहुँची तो उसके पति ने आटे का घोल खाने को माँगा। उसने सारी बात बताते हुए कहा कि आज वह कुछ भी खाने को नहीं दे सकती है तो उसके पति ने गुस्से में आकर उसे लकड़ी के पटिए से जोर से मारा। जेठानी गणेशजी की भक्त थी। गणेशजी को याद करते हुए वह पीड़ा से कराहती हुई सो गई। सपने में गणेशजी ने आकर पूछा तो उसने सारी घटना बता दी। गणेशजी ने सारी बात सुनकर कहा कि मैं कई जगह पर तिलकुट्टा खाकर आ रहा हूँ निमटने की ईच्छा हो रही है। जेठानी ने बहुत सारी जगह पड़ी है कहीं भी निमट लो। गणेशजी ने घर भर में जगह जगह निमटने का काम कर लिया। फिर पूछा कि पोंछू कहाँ पर। जेठानी ने कहा कि मेरे सिर के बालों से पौंछ लो। गणेश जी पौंछ कर चले गए। जब नींद खुली तो उसने देखा कि सारे घर में जगह जगह हीरे जवाहरात बिखरे पड़े हैं। सिर में भी हीरे जड़े हुए थे। हीरे जवाहरात समेटने में समय लगने से देवरानी के यहाँ जाने में  देर हो गई तो देवरानी ने बच्चों को देखने के लिए भेजा। बच्चों ने ताईजी के यहाँ का नजारा जाकर अपनी माँ से बता दिया। यह जानकर देवरानी दौड़ी-दौड़ी जेठानी के घर गई। वहाँ इतनी दौलत देखकर उसकी आँखे फटी की फटी रह गई। उसने जेठानी से पूछा तो उसने सबकुछ सच सच बता दिया। वो भी जल्दी से घर गई। पति को सारी बात बताकर पटिए से मारने के लिए कहा। पति ने कहा पैसे की भूखी क्यों फालतू में मार खाना चाहती हो। वो नहीं मानी तो उसके पति ने उसकी पटिए से अच्छे से पिटाई कर दी। वह सारा घर खाली करके गणेश जी का नाम लेती हुई सो गई। सपने में गणेश जी आए उन्होंने सारी बात वैसे ही की जैसी कि जेठानी के साथ की थी और चले गए। देवरानी उठी तो उसने देखा कि सारे घर मे गंदगी ही गंदगी पड़ी है और बालों में भी गंदगी लगी हुई है। बहुत दुर्गंध आ रही थी। वह गणेशजी से बोली कि तुमने मेरे साथ कपट किया है। गणेशजी आ गए और उन्होंने कहा कि तू तो धन-दौलत की भूखी मार खाई है और उसनेे धर्म की रक्षा में मार खाई है। तब देवरानी बोली की तुम यह सब समेट लो। तब गणेशजी बोले कि तू अगर अपनी दौलत का आधा भाग अपनी जेठानी को दे दे और उससे नौकरानी का काम लेने के लिए क्षमा माँग ले तो मैं सब समेट लूँगा। जब उसने यह वचन दिया तब गणेशजी ने अपनी माया को समेट लिया। 

  हे गणेशजी महाराज जैसे तूमने जेठानी को दिया वैसा सबको देना और देवरानी जैसा किसी को मत देना।

अनुकरणीय संदेश -

  • अपने से बड़े संबंधी को घर में नौकर की तरह नहीं रखें।
  • दूसरे की नकल नहीं करें।
  • धन अर्जित करने के लिए हाय पैसा हाय पैसा न करें।
  • धर्म पर चलने वाले को सदा ही अच्छे फल मिलते हैं भले ही उसमें देर हो जाए।    


रविवार, 4 जनवरी 2026

हवन/यज्ञ कुंड एक पावन प्रतीक A sacred symbol of Hindu dharma : Havan /Yagya

 


हवन/यज्ञ कुंड  

हवन/यज्ञ का माहात्म्य:  यज्ञ या हवन सनातन धर्म के महत्वपूर्ण स्रोत वेदों की देन है। वेदों में यज्ञ अत्यंत आवश्यक  पूजन कर्म है। ऐसी मान्यता है कि कोई भी अनुष्ठान या पूजन हवन के बिना पूर्णता को प्राप्त नहीं होता है। वेदों में कई प्रकार के यज्ञों का महत्व वर्णित है। पर्यावरण शुद्धि, सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि एवं कल्याण हेतु यज्ञ किया जाता है। हमारे दैनिक जीवन में भी कई प्रकार के हवन करने का विधान है। हवन करने के लिए विशेष  प्रकार की विभिन्न पदार्थों से निर्मित आकृति होती है जिसमें अग्नि प्रज्वलित की जाती है जिसे हवन कुंड कहते हैं। यज्ञ व्यक्तिगत एवं विशाल पैमाने पर सामुहिक भी किए जाते हैं। यज्ञ सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण अंग हैं जिनका उद्देश्य  जीवन के विभिन्न पक्षों जैसे देव, पितृ, ऋषि, भूत, मनुष्य आदि में संतुलन और कर्तव्यपूर्ति करना है।

वेदों में यज्ञः  वेदों में मुख्य रूप से पांच प्रकार के यज्ञ बताए गए हैं जिन्हें पंच महायज्ञ कहते हैं। ये हैं ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वयज्ञ , नृयज्ञ। ये यज्ञ नित्यकर्म  के अंग हैं। इनके अतिरिक्त अग्निहोत्र, सोम, अश्वमेध , राजसूय और वाजपेय यज्ञ भी हैं। 

हवन कुंड के प्रकार:  हवन कुंड कई आधारों पर वर्गीकृत किए गए हैं। 

१ . आकृति के अनुसार: त्रिकोणीय, वर्गाकार, षटकोणीय, अष्टकोणीय, वृत्ताकार, अर्द्धचंद्रकार, कमलाकार, योनि आकार आदि।

२ . यज्ञ के उद्देश्य  के अनुसार: जनकल्याण, सुख-शांति , मन की शांति, मारक कार्य, शत्रु विजय, कार्य सिद्धि, संतान प्राप्ति, शक्ति संतुलन, ग्रह शांति, तांत्रिक अनुष्ठान, सौम्य कार्य, पितृ कार्य, श्राद्धकर्म , ग्रह प्रवेश , विवाह संस्कार, आदि।

३ . वेदी केे अनुसारः  वेदों के अध्ययन के उपरांत वेद विद्वानों को उनके अध्ययन स्तर के अनुरूप उपाधि दी जाती है। एक वेद के ज्ञाता एक वेदी, दो वेदों के ज्ञाता द्विवेदी, तीन वेदों के ज्ञाता त्रिवेदी एवं चारों वेदों के विद्वान चतुर्वेदी के नाम से जाने जाते हैं। संभवतः उनके अध्ययन के पूर्ण होने पर जो यज्ञ किया जाता है उस हेतु निर्मित वेदी को एक वेदी, द्विवेदीय, त्रिदेवीय एवं चतुर्वेदीय हवन कुंड कहा जाता है।

एक संभावना और भी है कि वेदी निर्माण के स्तर के अनुसार यह नाम दिए गए हों। एक स्तर(तल/मंजिल), दो स्तर, तीन स्तर एवं चार स्तर की वेदी को ये नाम दिए जाते हों। 

४ . एक वेदीय (एक तल) - दैनिक भोजन हेतु, द्विवेदीय (द्वि तल) -साधारण दैनिक हवन, त्रिवेदीय (त्रि तल) - सत,रज ,तम की आकांक्षा  , चतुर्वेदीय (चार तल) - धर्म,अर्थ, काम एवं मोक्ष हेतु।

५ . कुंड निर्माण सामग्री के आधार पर: हवन कुंड किस सामग्री से निर्मित है इसका भी महत्व होता है। अलग अलग प्रयोजन के लिए हवन कुंड अलग अलग सामग्री से बनाया जाता है। हवन कुंड स्वर्ण, ताम्र , लोह, मृदा, पीतल, आदि से बनाया जाता है। आजकल सामान्यतः ईंटों और रेत से हवन कुंड बनाते हैं।  पूर्व निर्मित हवन कुंड ताम्बे के बने हुए होते हैं। 

हवन सामग्रीः हवन हेतु आहुति दी जाती है। ये सामग्री होती है - समिधा, अनाज जैसे जौ, चावल, काला सफेद तिल, प्रयुक्त किए जाते हैं। सुगंधित जड़ी बूटियां प्रयुक्त की जाती हैं। पुष्टता एवं मधुरता हेतु गुड़, मिश्री, शहद, पंचमेवा, आदि प्रयुक्त किए जाते हैं। गाय का घी, लोबान, कपूर आदि  का उपयोग होता है। विशेष यज्ञों में केले, अनार, गुदेदार फलों की आहुति दी जाती है।

समिधा: हवन में अग्नि को समर्पित की जाने वाली लकड़ी को समिधा कहा जाता है। समिधा की लकड़ी सूखी, शुद्ध और पवित्र होना चाहिए। समिधा हेतु सामान्यतः आम की लकड़ी प्रयुक्त की जाती है। पलाश , मदार, पीपल, गूलर, शमी, बिल्व, बरगद की लकड़ी  का भी उपयोग होता है। परंतु कई विद्वान हवन कुंड में किन्हीं भी पांच प्रकार की लकड़ी को प्रयुक्त करना अधिक शास्त्र सम्मत मानते हैं। सड़ी-गली, कीड़े लगी, गीली, सूली हुई, श्मशान  के वृक्ष, परिंदों के घोंसले वाले वृक्ष से ली गई लकड़ी का उपयोग उचित नहीं माना जाता है। नदी के किनारे  और जंगल से प्राप्त लकड़ी को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

आहुति एवं पूर्णाहुति: हवन में अग्नि को सामग्री समर्पित करने को आहुति कहते हैं। यज्ञ की समाप्ति के पूर्व मुख्य यज्ञ कर्ता के साथ उपस्थित सभी श्रद्धालु भी आहुति समर्पित कर सकतेे हैं। इस आहुति को पूर्णाहुति कहा जाता है। इसमें मुख्यतः नारियल का गोला, सुखेमेवे आदि होते हैं।

आहुति के मंत्र: यज्ञ के उद्देश्य  के अनुरूप मंत्र बोलते हैं। मंत्र के अंत में स्वाहाः बोलते हुए आहुति अग्नि को समर्पित की जाती है। विशेषकर अग्निदेव मंत्र, गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र बोले जाते हैं। विभिन्न देवताओं से संबंधित मंत्रों के उच्चारण के साथ आहुति दी जाती है।

पूर्णाहुति के मंत्र: ओम पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णपुदच्यते। 

पूणस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।। स्वाहा।।








गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

हंस: एक पवित्र सनातन प्रतीक


हंस: एक पवित्र सनातन प्रतीक  

छवि: सनातन धर्म के देवताओं के साथ हंस को दिखाया जाता है। कभी अकेले  बैठी हुआ मुद्रा में कभी किसी देवता के आसन या वाहन के रूप में इसे प्रदर्शित  किया जाता है।

माहात्म्य: हंस मां सरस्वती, ब्रह्मा एवं गायत्री  का वाहन है। यह उस आत्मा या जीवनदायी प्राण का प्रतीक है जो नीर क्षीर को परस्पर पृथक कर सकने की बुद्धि वाला होता है। यह प्रतीक है उनका जो आवश्यक बातों को अनावश्यक बातों से पृथक करने की क्षमता रखता है। हंस आत्मा का प्रतीक है। हंस का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। शरीर से हंस का उड़ जाना संसार त्याग कर आत्मा का मोक्ष हेतु गमन का प्रतीक है।

पवित्रता एवं विवेक का प्रतीक: हंस को सभी पक्षियों में सबसे बुद्धिमान  एवं पवित्र माना जाता है। दूध एवं जल के मिश्रण में से दूध को ही ग्रहण करने की क्षमता उसके आध्यात्मिक विवेक को बताती है।

जीवन शक्ति: हंस में दो ध्वनियां निकलती है। ये ध्वनियां श्वास को अंदर बाहर होने की हैं। एक (पूरक) जो कि प्राण को भीतर लेने पर और दूसरी (रेचक) जो प्राण को बाहर निकालने पर होती है। यह अपने आप में प्राण का, जीवन शक्ति का प्रतीक है। यह सोहम से संबंद्ध है। सोहम प्रतिनिधित्व करता है व्यक्ति एवं ईश्वर के योग का, जुड़ाव का। अतः योगिक क्रिया प्राणायाम का प्रतीक है हंस।

शास्वत प्रेम: हंस को एक आदर्श  प्रतीक माना जाता है पवित्र प्रेम का।

देवताओं का वाहन: हंस वाहन है मां सरस्वती, ब्रह्मा, गायत्री, और विश्वकर्मा  का।

आध्यात्मिक विवेक: ऐसी मान्यता है कि हंस कंकड़ों के ढेर में से मोती चुग लेता है। यह इस बात का प्रतीक है कि विश्व  में प्रचूर मात्रा में व्याप्त विभिन्न व्यर्थ की जानकारी में से ईश्वर  को पाने के लिए उपयुक्त ज्ञान का ही चयन करना चाहिए। दूध एवं पानी के मिश्रण में दूध को पृथक करने की क्षमता इस बात का द्योतक है कि आपमें सभी वस्तुओं में से सत्य एवं मर्म को समझने की क्षमता होना चाहिए। बुराई में से अच्छाई को विभक्त कर देना ही आध्यात्मिक विवेक है।

योगियों की परमहंस उपाधि: परमहंस की उपाधि दी जाती है उन संतों को जो कि योग की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं।