मंगलवार, 29 सितंबर 2026

शैय्या दान /पददान/पिंडदान / श्राद्धकर्म /तर्पण /धूप /shraddh karm/ tarpan /dhoop/shuach/aasauch/sutak/paatak

 शैय्या दान /पददान/पिंडदान / श्राद्धकर्म /तर्पण /धूप/शौच /आशौच /सूतक /पातक  

25.1 शैया दान एवं पददान(पगदान)
(
निम्नलिखित विवरण गरूड़ पुराण गीताप्रेस गोरखपुर के अनुसार दिया गया है।)
शैया दान: सभी प्रकार की सामग्री एक सुपात्र ब्राह्मण को दान देने का प्रावधान किया हुआ है। एक शैया एक ही ब्राह्मण को दी जानी चाहिए। एक से अधिक ब्राह्मणों को देने पर वे उसका विक्रय कर धन राशि  आपस में बाँट लेते हैं। इस प्रकार शैया दान की वस्तुओं का विक्रय दाता के ही अधःपतन का कारण बनती है।
स्वयं द्वारा जीविता अवस्था में अपनी सामर्थ्य अनुसार शैया दान करना उत्तम माना जाता है। शैया दान के बाद वृषोत्सर्ग (बैल का दान )करने का प्रावधान किया गया है। परंतु आज के युग में उसका कोई उपयोग नहीं रह गया हैं। इसलिए कई आवारा सांड गलियों में विचरण करते मिल जाएंगे। पुराने समय में इनका खेती आदि में उपयोग होता था अतः उस दान का महत्व था।
(
मेंरी व्यक्तिगत टिप्पणी: शैयादान में दी गई वस्तुएं सामान्यतः पुनः विक्रय कर दी जाती है. चुंकि दान का महत्व है अतः जीवितावस्था में ही उपयुक्त संस्था आदि को दान किया जाना चाहिए ताकि कुछ सीमा तक उसका सदुपयोग निश्चित हो। )
पद दान: यह शैया दान के बाद विभिन्न अवसरों पर किया जाता है।
गरूड़ पुराण के अनुसार शैया दान के बाद पुत्र द्वारा पद दान में सुपात्र व्यक्ति को दी जाने वाली सामग्री जीवात्मा के उपयोग में आती है और उसके कंटकपूर्ण मार्ग को निरापद बनाती है।
पद दान की सामग्री: निम्नांकित सात वस्तुएं पद कहलाती हैं।
1.
छत्र (छाता) 2. उपानह (जूते) 3. वस्त्र 4. मुद्रिका (अंगूठी) 5. कमंडल (जल पात्र) 6. आसन तथा 7. पंचपात्र (पांच बर्तन)।
उक्त सात वस्तुओं के साथ निम्नांकित छः वस्तुएं मिलने से पद को पूर्णता प्राप्त होती है।
1.
दंड(लाठी) 2. ताम्रपात्र 3. आमान्न(कच्चा अन्न) 4. भोजन 5.अर्ध्यपात्र 6. यज्ञोपवित
(
टिप्पणी: तेरह दिन तक प्रति दिन पददान की पुत्र को अपनी सामर्थ्य एवं ईच्छा अनुसार ही व्यवस्था करना चाहिए। क्रियाकर्म के तेरह दिवस में प्रतिदिन यह दान करने का प्रावधान है तथा तेरहवें दिन सभी तेरह ब्राह्मणों को यह दान किया जाता है। अब यहां विरोधाभास दिख रहा है, एक ओर पद दान शैया दान के बाद करने का कहा गया है दूसरी ओर तेरह दिन तक पद दान देना, कुछ समझ में नहीं आता, हो सकता है कि तेरह दिन तक अभ्यागत को पद दान के प्रतीकात्मक रूप से भोजन कराया जाता है। परंतु तेरह दिन तक पद दान का अनावश्यक अंधानुकरण करते हुए अपनी सामर्थ्य से बाहर जाकर कर्ज करने से न तो परिवार सुखी होता है और जीवात्मा भी अपने प्रियजनों के कष्ट को देखकर सुखी नहीं रह सकती है। )
25.2
श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और आशौच  (सूतक एवं पातक)
सनातन धर्म में श्राद्ध का अत्यधिक महत्व है और वह सामान्यतः एक अनिवार्य कर्तव्य है। श्राद्ध एवं तर्पण के संबंध में बहुत अधिक मीमांसा की गई है। कई विद्वान इसे आवश्यक क्रिया मानते हैं तो कई इसे एक बेकार का कर्मकांड मानतेे हैं। वेदों के विद्वान विशेषकर आर्य समाज इसे ब्राह्मणों द्वारा प्रारंभ की गई पोपलीला कहते हैं तो पुराणों को महत्व देने वाले इसे सनातन धर्मावंलबियों का अत्यंत विशिष्ट कर्तव्य मानते हैं। वेद एवं पुराणों के संयुक्त रूप से कुछ आधुनिक अध्येता इन दोनों में कुछ वैज्ञानिकता को देखकर इसकी व्याख्या करते हैं। हम इस लेख में बिना किसी पूर्वाग्रह एवं टिप्पणी के इन तीनों ही के विचारों को संक्षिप्त में जानने का प्रयास कर रहे हैं इसे किसी की आस्था पर प्रहार न समझा जाए। यहां वेद, पुराण, वेद विज्ञानी पं.मधुसुदन ओझा जी, श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार जो कुछ भी विचार व्यक्त किए गए हैं उन्हें अत्यंत संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
25.2.1.
पुराणों, ब्राह्मणों  एवं मान्यताओं के अनुसार -
(
श्राद्ध पक्ष के संबंध में अनेक विद्वानों के ग्रंथ उपलब्ध हैं। इस संबंध में मतैक्य नहीं है और विचारों में अत्यधिक विविधता पाई जाती है। फिर भी यहां प्रमुख रूप से प्रचलित मान्यताओं एवं परंपराओं को ही बहुत ही संक्षेप में दिया जा रहा है।)
ऐसी मान्यता है कि श्राद्धपक्ष में यमराज पितरों को मुक्त कर देते हैं ताकि वे अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें।
भाद्रपद में ही श्राद्धपक्ष क्यों ?
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पृथ्वी लोक में देवता उत्तरी गोलार्द्ध में विचरण करते हैं और दक्षिण गोलार्द्ध भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चंद्र लोक के साथ साथ पृथ्वी के निकट से गुजरता है। मान्यता के अनुसार इस मास की प्रतीक्षा पूर्वज पूरे वर्ष करते रहते हैं। वे चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्युतिथि पर अपने घर के द्वार पर पहुंच जाते हैं और वहां अपना सम्मान पाकर  अपनी नई पीढ़ी को आशीर्वाद देकर चले जाते हैं। (श्राद्ध मीमांसा के अनुसार)
पुराणों के अनुसार पितरों को भोजन एवं अपनी श्रद्धा पहुंचाने का एकमात्र साधन श्राद्ध है। मान्यता है कि पितर क्रुद्ध हो जाएं तो जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी भी मान्यता है कि कुंडली में पितृदोष होने पर संतान प्राप्ति नहीं होती। अतः मनुष्य को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
पुराणों के अनुसार पितर कौन हैं?
मृतक के एक वर्ष में समस्त क्रियाकर्म पूर्ण हो जाने पर वह पितर की श्रेणी में आ जाता है। पितरों में माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी सहित समस्त मृत पूर्वज आते हैं। मृत गुरु और आचार्य भी पितर की श्रेणी में आते हैं।
श्राद्ध करना क्यों आवश्यक है?
यदि मृतक का विधिपूर्वक श्राद्ध एवं तर्पण न किया जाए तो उसकी आत्मा पृथ्वी लोक पर ही भटकती रहती है।
श्राद्ध क्या है?
पुराणों के अनुसार पितरों के लिए श्रद्धा से किया जाने वाला कर्म श्राद्ध है। पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज श्राद्धकर्म के तीन घटक हैं। यही कर्म श्राद्ध है। श्राद्ध में श्रद्धाभाव से मंत्रों के साथ दी गई दान-दक्षिणा ही श्राद्ध है।
श्राद्ध का कारण
पुराणों के अनुसार भाद्रपद मास में यमराज सभी जीवों को मुक्त कर देते हैं ताकि वे अपने स्वजनों से तर्पण ग्रहण कर सकें। तीन पूर्वज पिता, दादा और परदादा को तीन देवता क्रमशः वसु, रुद्र और आदित्य के समान माना गया है।
कौओं का महत्व
कौओं को मृत पूर्वजों का प्रतीक माना गया है। अतः श्राद्ध का प्रथम अंश उन्हीं को दिया जाता है ताकि वे रुष्ट न हों। लेकिन श्राद्ध मीमांसा (पं भीमसेन, सन् 1918) के अनुसार शास्त्रों में कौओं का श्राद्ध कर्म हेतु कहीं उल्लेख नहीं मिलता है।
श्राद्ध पितरों को कैसे पहुंचता है?
पूर्वज के नाम तथा गोत्र का उच्चारण करते हुए मंत्रों के माध्यम से जो भोजन उनको समर्पित किया जाता है वह उन्हें प्राप्त होता है।
श्राद्ध कब किया जाना चाहिए?
श्राद्धपक्ष में पड़ने वाली मृत्यु की तिथि को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए श्राद्ध करना चाहिए।
अकाल मृत्यु को प्राप्त पूर्वजों का श्राद्ध चतुर्दशी के दिन, साधु-संन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी के दिन, और जिनकी मृत्यु की तिथि अज्ञात हो उनका अमावस्या (सर्वपितृश्राद्ध)के दिन श्राद्ध किया जाना चाहिए।
श्राद्ध कैसे किया जाना चाहिए?
अ. तर्पण(पितृयज्ञ)

जल में दूध, तुलसी पत्र, गंगा जल, और सफेद चंदन मिला लेते हैं।। उसमें काले तिल, जौ, कुशा एवं सफेद पुष्प लेते हैं। दाहिने कंधे पर जनेउ रखकर (जनेउ नहीं हो तो गमछा रखते हैं) दाहिने हाथ में तीन कुशा मध्य में से मोड़कर उनकी जड़ और अग्रभाग को अंगुलियों एवं अंगुठे के मध्य पकड़ कर, दक्षिण दिशा में मुख करके बाएं घुटने के बल बैठ कर, एक पात्र में उक्त मिश्रण वाले जल को लेकर अंगुठे की विपरित दिशा से इस प्रकार से डालते हैं कि वह कुशा के सहारे अंगुठे के पास से पात्र में गिरे। ध्यान रहे अंगुठे कि दिशा भी दक्षिण दिशा में रखनी होती है। पितर की गोत्र और उनका नाम लेकर कहते हैं कि हे .... गोत्रीय श्री........ आप तृप्त हों। ऐसा तीन बार करते हैं। श्रद्धापूर्वक पितरों को जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। धूप देने से पहले तर्पण करना आवश्यक माना गया है। एक बड़े पात्र में उक्त मिश्रण लेकर हाथों की अंजली  बनाकर उस जल को तीन बार उसी पात्र में छोड़ने की क्रिया कर भी तर्पण कर सकते हैं। केवल धूप देने से श्राद्ध कर्म को पूर्ण नहीं माना जाता है।(तर्पण की यह विधि केवल पितरों के लिए है देवता , ऋषि ,दिव्य मनुष्य,यम आदि के लिए अलग अलग विधि है।) तर्पण का सम्बन्ध तृप्ति से है हर आत्मा जल से ही तृप्त होती है अतः श्राद्ध में भी तर्पण का सर्वाधिक महत्व है। तर्पण को पितृयज्ञ माना गया है। 
ब. धूप देना
सामान्यतः सर्वप्रथम भोजन में निर्मित केवल मिष्ठान की धूप दी जाती है। चावल की खीर भोजन का अनिवार्य अंग है। कुछ पंडित केवल गुड़/शक्कर और घी से धूप देने का चलन बताते हैं। धूप देेते समय पहली आहुति अग्नि को ओम अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा मंत्र के माध्यम से दी जानी चाहिए। यहां अग्नि पितरों को दी गई आहूति का वाहक बनती है। दूसरी आहुति सोम को ओम सोमाय पितृमते स्वधा मंत्र के साथ दी जानी चाहिए।(स्वधा = पितर हेतु ओषधीय प्रभाव युक्त श्रेष्ठ तरीके से बनाया गया पोष्टिक भोजन) धूप में केवल दो आहूति देने का ही प्रावधान है। अग्नि एवं सोम की आहूति से पितर पूर्णतः तृप्त हो जाते है। दाहिने हाथ की मध्य की दोनों अंगुलियों के प्रथम पर्व पर कव्य सामग्री लेकर आहूति दी जानी चाहिए।
तर्पण एवं धूप के बाद श्राद्ध हेतु निर्मित भोजन का पितरों का स्मरण करते हुए पहले गाय, कुत्ता और कौओं का भाग निकालकर फिर एक, पांच या ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्य एवं ईच्छा अनुसार दान-दक्षिणा देकर विदा करने के बाद श्राद्धकर्ता को परिजनों के साथ भोजन करना चाहिए।
 
आजकल यह क्रिया पितर की तस्वीर को चौकी पर रखकर उसके समक्ष भी करते हैं। परंतु यह कोई अनिवार्य नहीं है। धूप  के समक्ष समस्त परिजन धोक लगाते हैं। विद्वानों के अनुसार श्राद्ध की धूप सबसे बडे़ अथवा सबसे छोटे पूत्र की ही मान्य है। लेकिन आजकल सभी पुत्रों का या परिजनों का परिस्थितिवश एक जगह एकत्र होना संभव नहीं होता है। ऐसी परिस्थिति में पितर के प्रति श्रद्धा केे कारण अन्य पुत्र भी अपने निवास पर श्राद्ध करतेे हैं। इस स्थिति में कुछ विद्वानों का कहना है कि सभी स्थानों पर भोजन का मेन्यू एक ही रखना चाहिए। यदि पुत्र न हो तो पुत्री भी श्राद्ध कर सकती है। यदि पुत्री भी न हो तो पत्नी श्राद्धकर्म कर सकती है। पत्नी भी न हो तो छोटा भाई श्राद्ध कर सकता है।
श्राद्ध का फल
मान्यता है कि पूर्ण श्रद्धा के साथ श्राद्ध करने से पितृऋण/ पितृदोष से मुक्ति मिलती है।
पिंडदान
चावल, गाय का दूध, घी, शक्कर एवं शहद के मिश्रण को गूंथकर बनाई गई आकृति को पिंड कहते हैं। इन पिंडों को दक्षिणाभिमुख होकर आचमन कर अपने जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर श्रद्धाभाव से अर्पित करना पिंडदान कहलाता है।
पिंडदान एवं तर्पण के स्थान
ऐसी मान्यता है कि बद्रीनाथ, हरिद्वार, जबलपुर एवं मंडला में पिंडदान एवं तर्पण किया जाना चाहिए।
गया (बिहार) में किए गए पिंडदान एवं तर्पण को सर्वाधिक महत्व प्राप्त है क्योंकि गया को विष्णु का नगर माना गया है। ऐसी मान्यता है कि गया में उक्त क्रियाकर्म संपन्न हो जाने के बाद पूर्वजों के श्राद्ध को करना अनिवार्य नहीं होता है क्योंकि वे मोक्ष को प्राप्त कर लते हैं। परंतु कुछ विद्वान इससे भिन्न मत रखते हैं। उनका कहना यह है कि कोई कार्य को श्रेष्ठतम तरीके से कर लिया जाता है तो वह कार्य बाद में नहीं किया जाता है क्या? कुछ विद्वानों का मत है कि गया श्राद्ध के पश्चात ही बद्रीनाथजी में श्राद्ध किया जाना चाहिए।
25.2.2.
वेदों के अनुसार - (आर्य समाज के विचार)
पंचमहायज्ञ: संपूर्ण जीव जगत के हितार्थ मानव को शुभकर्म करना चाहिए। जिस एक कर्म को विशेष महत्व प्रदान किया गया है - वह है यज्ञ ।
यज्ञ क्या है ?
अपनी स्वयं की आत्मा के उत्थान से लेकर व्यक्ति विशेष या सार्वजनिक लोकहित में निष्ठापूर्वक निष्कामभाव तथा आसक्ति को त्यागकर समत्व की भावना से किया गया प्रत्येक कर्म ही यज्ञ है।
पंचमहायज्ञ व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व की उन्नति के आधार हैं। ये यज्ञ हैं -
1.
ब्रह्मयज्ञ: आत्मिक उन्नति के लिए  2. देवयज्ञ: पारिवारिक एवं सामुदायिक उन्नति के लिए  3. पितृयज्ञ: सामाजिक उन्नति के लिए  4. अतिथियज्ञ: राष्ट्रीय उन्नति के लिए  5. बलिवैष्वदेव यज्ञ
श्राद्ध कर्म पितृयज्ञ के अंतर्गत आता है। पितृ का अर्थ है - माता-पिता दोनों। दादा-दादी, परदादा-दादी के लिए भी पितृ शब्द प्रयुक्त किया जाता है। पितृ का बहुवचन पितर है। इस प्रकार देखा जाए तो पिता एवं पितर समानार्थक हैं।
श्राद्ध: विद्वानरूप देव, ऋषि, और पितरों की उनके अंत समय तक श्रद्धापूर्वक सेवा करना ही श्राद्ध है।
तर्पण: विद्वानरूप देव, ऋषि, और पितरों को उनके अंत समय तक सुख प्रदान करने के लिए किया जाने वाला कर्म ही तर्पण है।
वेद विद्वानों के अनुसार मृतक की आत्मा तो शरीर को पहले त्याग चुकी होती है तो फिर दाह संस्कार आदि में किसी त्रुटि से आत्मा के पीड़ित होने का प्रश्न  ही उत्पन्न नहीं होता। पूर्वज कभी भी अपनी संतानों से क्रुद्ध नहीं होते। पितृदोष आदि कोरी कपोल कल्पना है। अतः मृत्यु के पश्चात किए जाने वाले क्रियाकर्म यथा तीसरा, दसवां, बारहवां, गरूड़ पुराण पाठ, शैया दान, ब्राह्मण भोज, छःमाही, बरसी, आदि का कोई औचित्य नहीं है। लेकिन कई बार मृतक भी जवित अवस्था में कभी अपने विचार व्यक्त कर चुका होता है कि उसे सद्गति प्राप्त हो इस दृष्टि से उसके मरने के बाद उक्त क्रियाकर्म किए जाएं। अतः पुत्रों द्वारा पितृऋण से मुक्ति एवं पितरों की ईच्छा की पूर्ति के निमित्त उक्त सारी क्रियाएं की जाती हैं। पितृऋण से तो पितरों के जीवित रहते श्रद्वापूर्वक की गई सेवा से मुक्त हुआ जा सकता है, मृत्यु के बाद श्राद्ध या तर्पण करने का कोई औचित्य नहीं है यह केवल अंधविश्वा है। सच्चा श्राद्ध तो अग्रजों के जीवित रहते हुए पूर्ण समर्पण भाव से उनकी सेवा-सुश्रुआ करना ही है।(श्राद्ध एवं तर्पण का वैदिक स्वरूप, संपादक डाॅ मदन मोहन जावलिया, सन् 2017 के अनुसार)

25.2.3.
पं.मधुसूदन ओझा के अनुसार (आशौचपंजिका द्वितीय संस्करण, सन् 1952)
पं.मधुसूदन ओझा एक आधुनिक वेदविज्ञानी एवं पुराणों के अध्येता हुए हैं। उन्होंने बहुत गहराई एवं व्यापकता के साथ इनका अध्ययन किया है। उन्होंने अपनी दृष्टि से विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की है। उसी में से उक्त विषय से संबंधित संक्षिप्त अंश को प्रस्तुत किया जा रहा है।
एक शुक्रमय पिंड में पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज/अग्नि, वायु एवं आकाश ) एवं चेतना धातु होती है जिसे शुक्र कहते हैं। शुक्र में सात कोष होते हैं। सात कोष में क्रमश: 28,21,15,10,6,3,एवं 1 कलाएं होती हैं। इस तरह एक मूल पुरुष के शुक्र में 84 कलाओं का सोमद्रव्य होता है। इन 84 कलाओं के 28-28 कला के तीन भाग होते हैं। प्रथम भाग स्वयं मूलपुरुष का तथा शेष दो भाग पूर्वजों से आते हैं। मूल पुरुष उक्त प्रत्येक पीढ़ी से प्राप्त कलाओं में से 28 कलाओं को अपने में रखकर शेष 56 कलाओं को शुक्र के माध्यम से माता के शरीर में स्थापित कर देता है। अतः उससे प्राप्त पुत्र को छःकोशिय संतान कहा जाता है। संतान को प्राप्त उक्त 56 कलाओं में पुत्र के 16 वर्ष आयु प्राप्त करने के अंतराल में  28 नक्षत्रों पर चंद्रमा के संचार से 28 कलाएं प्राप्त होती हैं इस प्रकार 84 कला हो जाती हैं और संतान का शुक्र परिपक्व हो जाता है तब वह संतानोत्पत्ति हेतु सक्षम माना जाता है।
श्राद्ध:  मूल पुरुष का कलाओं के माध्यम से अपने से पूर्व की 6 पीढ़ियों एवं अपने बाद की 6 पीढ़ियों से संबंध बना रहता है। पुत्र उत्पत्ति से पूर्व उसे अपने पूर्वजों से 56 कलाएं ऋण स्वरूप प्राप्त होती हैं अतः वह पितृऋण वाला बन जाता है। उसकी 28 कलाओं में उसकी स्वयं की तो केवल 7 ही हैं शेष तो पूर्व के 6 पीढ़ियों के पूर्वजों की है। अतः उन पूर्वजों की तृप्ति के लिए वह श्राद्ध द्वारा भोजन प्रतिवर्ष कराता है तथा तर्पण आदि भी करता है। जब वह देह त्याग करता है तो पूर्वजों की 21 कलाओं को वह अपने पूर्वजों को लौटा देता है जिससे उनसे उसका संबंध समाप्त हो जाता है। वह अपनी कलाओं और पूर्वजों की कलाओं को अपने पुत्र को दे चुका होता है इसलिए पुत्र उनके ऋणी बन जाते हैं और वे श्राद्ध करते हैं। 84 कलाओं का संबंध सात पीढ़ियों में ही रहता है।
आशौच: इससे तात्पर्य अशुद्धि/अपवित्रता से है। अपवित्रता तीन प्रकार की हो सकती है - स्पर्षाशोच, कर्माशौच एवं मंगलाशौच। यहां केवल जन्मकाल एवं मृत्युकाल के आशौच पर ही चर्चा करेंगे। शरीर में दो प्रकार के धातु होते है। चरक, सुश्रुत के अनुसार प्रथम प्रकार के वे हैं जो शरीर को पुष्ट करते हैं तथा द्वितीय प्रकार के वे हैं जो शरीर को हानि पहुंचाते हैं और शरीर से बाहर आ जाते हैं। शरीर के द्वारा त्याग दिए गए बाहर आने वाले धातु अपवित्रता के कारक हैं। स्त्री रज भी शरीर से बाहर आता है अतः वह आशौच का कारक है। शरीर के लिए हानिप्रद उसके द्वारा त्यागा गया द्रव्य उसके बाहर आकर आशौच को पैदा करता है।
सूतक- जन्मकाल का आशौच:
 
पुत्र का संबंध माता के साथ एक नाड़ी(नाल) के द्वारा बना रहता है, परंतु जब शिशु की नाड़ी को काटकर पृथक कर दिया जाता है तो सूती अर्थात माता  एवं शिशु दोनों ही एक दूसरे के शरीर से पृथक हो जाते हैं अर्थात एक दूसरे को त्याग देते हैं इस लिए वे आशौच के जनक हो जाते हैं। पैदा होने से पूर्व गर्भस्थ शिशु के भौतिक द्रव्यों के साथ साथ चेतना का भी माता से संबंध रहता है। नाड़ीछेदन के परिणामस्वरूप माता एवं शिशु की पंच धातुओं (पृथ्वी, जल, तेज/अग्नि, वायु एवं आकाश ) एवं चेतना का पृथक होना ही आशौच है। यह  आशौच  पीढ़ियों में कलाओं के वितरण एवं संबंध के कारण संबंधियों में भी संक्रात होता है। उन पीढ़ियों में इसे ही सामान्य बोलचाल में सूतक कहा जाता है। माता को संस्कृत में सूती कहा जाता है संभवतः इसी लिए इस  आशौच  को सूतक कहा जाता है। सामान्यतः इसकी अवधि 10 से 14 दिन तक होती है या सूरज पूजन तक मानी जाती है।
पातक-मरणकाल का आशौच  :
व्यक्ति के मरने पर उसका शरीर चिता में जल जाता है या मिट्टी में मिल जाता है इस प्रकार जिन पंच धातुओं से शरीर बना वह नहीं रहता एवं उसकी आत्मा अर्थात चेतना उसको छोड़ देती है इस प्रकार मृत्युकाल में मृतक के धातुपंचक का चेतना से संबंध विच्छेद हो जाता है, यहां भी चेतना का धातुपंचक से पृथक होना  आशौच  का कारक होता है और वह भी सूतक की तरह संबंधियों में संक्रात होता है जिसे पातक कहा जाता है परंतु अनभिज्ञता के कारण सामान्यतः लोग इसे भी सूतक ही कहते हैं। मृत्यु को पात भी कहा जाता है इसलिए इस  आशौच  को पातक कहा जाता है।
सूतक/पातक अवधि के दौरान वर्जित कार्य
सामान्यतः इसकी अवधि 10 से 13 दिन तक होती है। इस अवधि में सूतक के अधीन आने वाले परिजन पवित्र/धार्मिक अनुष्ठानों, सामाजिक कार्यों में संलग्नता, मंदिर, आदि से दूर रहते हैं।
उक्त दोनों  आशौच  का केवल सात पीढ़ियों तक ही घटते हुए क्रम में सर्वाधिक प्रभाव रहता है। उसके बाद नगण्य प्रभाव माना जाता है अतः  आशौच  (सूतक/पातक) को मानना छोड़ दिया जाता है।
सूतक/पातक से निवृत्ति 
निर्धारित अवधि पूर्ण होने पर शुद्धिकरण की प्रक्रिया की जाती है। स्नान, विभिन्न प्रकार की पूजा, हवन, दान आदि किए जाते हैं।
25.2.4
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार
अंत में सनातन धर्म के सबसे अधिक मान्य पवित्र ग्रंथ के अनुसार कई विद्वान श्राद्ध कर्म को अनुचित मानते हैं। उसके आधार पर उसका निषेध करते हैं।
गीताजी के अध्याय 9 के श्लोक 25 के अनुसार देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मेरे को ही प्राप्त होतेे हैं, इसीलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता।
(
उक्त सामग्री गीताप्रेस गोरखपुर के प्रकाशन गरूड़ पुराण, श्राद्ध मीमांसा, श्राद्ध एवं तर्पण का वैदिक स्वरूप, एवं 1918 में प्रकाशित  आशौच  पंजिका,नित्य कर्म पूजा प्रकाश, तथा अन्य पुस्तकों में दी गई विषयवस्तु एवं दैनिक जीवन में प्रचलित उक्त विषयों से संबंधित मान्यताओं एवं चलन पर आधारित है। उक्त सारी सामग्री केवल जानकारी के निमित्त  दी गई है, इस क्षेत्र में व्याप्त विविधता और मतभिन्नता के चलते अपनी आस्था, श्रद्धा, विश्वास और परंपरा के अनुसार निर्णय लिया जाना चाहिए।)