ध्वजा
अन्य नाम: झंडा, झंडी, पताका
ध्वजा: हिंदु धर्म में ध्वजा एक कपड़ा नहीं अपितु एक पवित्र प्रतीक है जो कि आध्यात्मिक महत्व रखता है। यह प्रतीक होता है विजय, देवत्व, समर्पण, पवित्र स्थान, सांस्कृतिक विरासत का। सनातन धर्म एवं बोद्ध धर्म के संतों, साधुओं, सन्यासियों द्वारा इसका उपयोग किया जाता है। मंदिरों के शिखर या किसी स्थान पर इसका लगा होना उस स्थान पर पवित्र देवस्थान की उपस्थिति को दर्षाता है। प्राचीन सेनाओं के रथों पर यह ध्वज लगे होते थे।
हिंदु धर्म ध्वजा की संरचना: यह सामान्यतः भगवा रंग की होती है। मंदिरों के शिखर पर सामान्यतः लहराती ध्वजा त्रिभुजाकार होती है। दो भागों में लहराती ध्वजा का उपयोग बहुत होता है। दक्षिण में तिरंगी भी होती है। कई मंदिरों में लाल , सफ़ेद रंग की ध्वजाएं भी होती हैं।
ध्वजा का माहात्म्य:
- देवत्व एवं संरक्षण का प्रतीक: किसी भी मंदिर के शिखर पर लहराती ध्वजा उस पवित्र स्थान में देवीय शक्ति की उपस्थित की द्योतक होती है। वह पवित्र स्थान के आभा मंडल को दर्शाती है जो कि भक्तों को ईश्वर प्राप्ति हेतु मार्गदर्षित करती हैं। वह इस बात के लिए आश्वस्त करती हैं कि आप नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित हैं। मान्यता है कि मंद बयार में लहराती ध्वजा मंदिर एवं भक्तों के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है ताकि वे होने वाली हानियों से बचे रहें और सदेव सुखी रहें।
- विजय एवं आनंद की द्योतक: सनातन धर्म में ध्वजा नकारात्मक शक्तियों पर विजय से अर्जित आनंद का प्रतीक है। ब्रह्मांड में सामंजस्य, समरसता, एकता, तारतम्य बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध देवीय शक्तियों से संबंद्ध होती है ध्वजा। शिखर पर लहराती ध्वजा भक्तों को अपनी आध्यात्मिक यात्रा को संरक्षित रखने के लिए न केवल प्रेरित करती है अपितु वह उनकी आस्था, प्रतिबद्धता एपं संकल्प को निरंतर स्मरण कराती रहती है। इससे भक्त आध्यात्मिक यात्रा में आने वाली बाधाओं को पार कर अपने चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकें।
- त्याग, भक्ति एवं समर्पण की अभिव्यक्ति: मंदिर के शिखर पर ध्वजा चढ़ाना भक्ति एवं समर्पण का पवित्र कृत्य माना जाता है। भौतिक लाभों को त्याग कर निस्वार्थ सेवा एवं भक्ति का प्रतीक है। यह भगवान के प्रति पूर्णतः समर्पित होकर अपने जीवन को आध्यात्मिक सिद्धांतों से जुड़ जाने की ईच्छा को प्रतिबिंबित करता है। भक्त द्वारा चढ़ाई गई ध्वजा का लहराना भक्त की प्रार्थना को भगवान के द्वारा स्वीकार कर लिए जाने एवं आशिर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
- ध्वजा प्रतीक है पवित्र स्थल एवं समय का: ध्वजा द्योतक होती है उस स्थान की पवित्रता का जहां देवत्व एवं सांसारिकत्व परस्पर मिलता है। यह केंद्रीय बिंदु होता है धार्मिक क्रियाओं, उत्सव, त्यौहारों, आध्यात्मिक ऊर्जाओं के मिलन से बनने वाले वृहदाकार आभामंडल एवं मंगलकारी अवसर का। ध्वजा समय का द्योतक भी होती है, उसकी परछाई, रंग आदि के बदलने से इसका अनुमान लगाया जाता है।
- सांस्कृतिक एवं प्रतीकात्मक परंपराओं का प्रतिबिंब: ध्वजा का रंग, आकृति आदि धर्म, संप्रदाय, परंपराओं, संस्कृतियों के अनुसार भिन्न भिन्न होते हैं। हर ध्वजा का एक अद्वितीय प्रतीकात्मक अर्थ होता है। यह आराध्य देवीय शक्ति एवं सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व करती है। दक्षिण भारत के तिरंगी ध्वजाओं से उत्तर भारत की भगवा ध्वजाएं आध्यात्मिकता की शक्तिशाली प्रतीक होती हैं।
- ज्ञान, शुद्धता, शास्वत और अनंतता का प्रतीक: यह ज्ञान के प्रकाश , मन की शुद्धता, सनातन परंपरा के शास्वत एवं अंनत होने का प्रतीक है।
भगवा रंग ही क्यों: प्राचीन काल से प्रकृति में भगवा रंग विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होता रहा है पलाश , सेमल आदि वृक्षों के फूलों से यह रंग प्राप्त होता है। उस रंग में किटाणु रोधी गुण पाए जाते हैं। नारंगी रंग में ऊर्जा की प्रचुरता होती है जो व्यक्ति में शौर्य की भावना उत्पन्न करती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार केसरिया रंग सूर्यास्त और अग्नि का रंग है।
श्री माधव सदाषिवराव गोलवलकर जी के वचन(रा स्व स के द्वितीय पूज्य प्रमुख ): भगवाध्वज अनादिकाल से हमारे धर्म, संस्कृति, परंपराओं, और आदर्शों का प्रतीक रहा है। यह यज्ञ की पवित्र अग्नि के रंग को, जो आदर्शवाद की अग्निशिखा में आत्मबलिदान करने का संदेश देती है तथा विश्व में सभी और अंधकार दूर कर प्रकाश फैलाने वाले उदयोन्मुख तेजस्वी सूर्य के नारंगी रंग को अपने में मूर्तिमान करता है।
राष्ट्रीय स्वयं संघ भगवा ध्वज को अपना गुरु मानता है।