शनिवार, 17 जनवरी 2026

कमंडल एक पावन प्रतीक Sacred symbol of Sanatan Kamandal



 कमंडल   

अन्य नाम: कमंडलू, कमंडलम

कमंडल की आकृति: यह सामान्यतः अंडाकार या गोलाकार आकृति का खोखला पात्र होता है जिसके मुंह पर हैंडल लगा होता है। प्राचीन समय में और आज भी यह सूखी लौकी(तुंबा), नारियल की खोल, मिट्टी या धातु से बनाया जाता है। आजकल धातु से निर्मित कमंडल ही अधिक प्रचलन में हैं।

कमंडल का माहात्म्य: साधु संन्यासियों द्वारा कमंडल का उपयोग किया जाता है। सनातन संत, जैन साधू एवं बौद्ध साधू आज भी इसका उपयोग करते हैं। कई देवी देवताओं के हाथ में भी कमंडल दर्शाया  जाता है। सामान्यतः यह पीने के जल को रखने में प्रयुक्त होता है। परंतु देवी देवताओं के हाथ में इसका होना आध्यात्मिक अर्थ रखता है। यह पवित्रता, सादगी, आत्मसंयम, ज्ञान के भंडार आदि का प्रतीक है। पौराणिक कथाओें में भगवान शिव एवं ब्रह्मा के हाथ में कमंडल पवित्र नदियों के उद्गम का प्रतीक माना गया है। कमंडल की रिक्तता और शुद्धिकरण की प्रक्रिया मानव के अंतर्मन के बुरे विचारों यथा लोभ, क्रोध और सांसारिक ईच्छाओं के त्याग, सांसारिक मोह से विरक्ति का प्रतीक है। देवी ब्रह्मचारिणी के हाथ में कमंडल उनकी देवीय शक्ति का प्रतीक है। शिवजी के हाथ में दर्शाया  गया कमंडल ब्रह्मांडीय ऊर्जा एवं सृष्टि सृजन को दर्शाता  है। 

पूजन, अनुष्ठान एवं परंपराओं में कमंडल:

पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों में  कमंडल के जल से अभिषेक और शुद्धिकरण किया जाता है। बौद्ध धर्म में कमंडल रखना जीवन के अमृत का प्रतीक है। जैन साधु जल एवं भोजन सामग्री रखने के लिए कमंडल का उपयोग करतेे हैं। कमंडल केवल जल या अन्य सामग्री रखने का प्रतीक मात्र नहीं अपितु एक गहरा आध्यात्मिक प्रतीक है जो कि मन की पवित्रता और आध्यात्म के पथ पर अग्रसर रहने हेतु प्रेरित करता है।


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