शनिवार, 17 जनवरी 2026

खड़ाऊ एक अत्यंत पावन प्रतीक KHADAU A Sacred Symbol of Hindu Dharma

   


खड़ाऊ एक अत्यंत पावन प्रतीक
  

अन्य नाम: पादुका

खड़ाऊ का अर्थ: लकड़ी से निर्मित चप्पल को खड़ाऊ कहते हैं। चपटी लकड़ी की पट्टी पर पांव के अंगुठे और अंगुलियों के मध्य में पकड़ने के लिए एक नॉब जैसी आकृति लगी होती है। 

खड़ाऊ की लकड़ीः ये नीम, शीशम, पलास, आम, बबूल जैसे पेड़ों की लकड़ी से बनाई जाती हैं।

खड़ाऊ का माहात्म्य: भारतीय साधुओं सनातन, जैन, बौद्ध धर्म के संत एवं साधुओं द्वारा पैरों में पहनने के लिए खड़ाऊ का उपयोग किया जाता है। वस्तुतः खड़ाऊ का उपयोग वैदिक काल में ऋषि मुनि  किया करते थे। धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।

सांस्कृतिक महत्व: रामायण में भगवान राम के वनवास के पश्चात भरत ने उनके खड़ाऊ को सिंहासन पर रखकर शासन किया था जो कि इसके महत्व को अभिव्यक्त करता है।

धार्मिक महत्व: अहिंसा के चलते साधु संतों द्वारा चमड़े का उपयोग किया जाना वर्जित था। अतः वे लकड़ी से निर्मित खड़ाऊ का उपयोग किया करते थे। संतों द्वारा तप तपस्या से अर्जित विद्युत शक्ति पृथ्वी में न चली जाए इसलिए लकड़ी की खड़ाऊ विद्युत प्रवाह को अवरोधित करती है एवं अर्जित शक्ति मानव तन में संचित होती रहती है।

स्वास्थ्य संबंधी महत्व: यजुर्वेद में उल्लेख मिलता है कि खड़ाऊ पहनने से कई रोगों से हमारी रक्षा होती है। खड़ाऊ पहनने से तलवे की मांसपेशियां शक्तिशाली बनती हैं। शरीर में रक्त प्रवाह सही रहता है। मानव तन में सकारात्मक ऊर्जा का सृजन होता है। शरीर का संतुलन सही रहने से रीढ़ की हड्डी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रक्त संचार के सही रहने से मानसिक थकान दूर होती है। ऐसी भी मान्यता है कि अंगुठे एवं अंगुलियों के मध्य खड़ाऊ को पकड़ने से मन पर नियंत्रण होने से क्रोध पर भी नियंत्रण रहता है।

वर्तमान स्थिति:  आज भी कई संत खड़ाऊ का उपयोग करते हैं। कुछ लोग एथनिक वियर के रूप में फैशन के लिए भी पहनते हैं।

  





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