सोमवार, 5 जनवरी 2026

संकष्ट चतुर्थी/माही चौथ (तिल चौथ ) एवं उसकी लोक कथा

 


 


संकष्ट चतुर्थी/माही चौथ (तिल चौथ ) एवं उसकी लोक कथा

(माही चौथ /तिल चौथ  माघ मास के कृष्ण पक्ष में आती है। )

1 पूजन विधिः

   जैसे प्रत्येकचौथ  की पूजा होती है वैसे ही करना है। केवल आज के दिन तिलकुट्टे का उपयोग और होता है।

2 माही चौथ की लोक कथा:-

एक साहूकार-साहूकारनी थे। उनके संतान नहीं होती थी। एक दिन साहूकारनी ने पड़ोसन को माही चौथ का व्रत करते देखा। उससे उसका माहात्म्य पूछकर उसने कहा कि यदि मेरे गर्भ ठहर गया तो मैं सवा सेर का तिल कुट्टा और चौथ माता का व्रत करूँगी। जब गर्भ ठहर गया तो बोली कि मेरे पुत्र होगा तो ढाई सेर का तिल कुट्टा और चौथ माता का व्रत करूँगी, पुत्र भी हो गया तो बोली कि बेटे का विवाह हो जाएगा तो सवा मन का तिल कुट्टा और चौथ माता का व्रत करूँगी। चौथ माता ने सोचा कि ये तो अपनी बात को टालती जा रही है उसका पालन नहीं कर रही है ऐसी महिला को तो सीख देना चाहिए अन्यथा यह तो लोगों को ऐसे ही मुर्ख बनाती रहेगी। जब विवाह वाले दिन तीन फेरे पूरे हो गए तो चौथ माता ने अपने प्रभाव से दूल्हे रूपी बेटे को उठा कर एक बड़े पीपल के पेड़ पर बैठा दिया। कई दिन तक दूल्हे की खोज होती रही पर नहीं मिला। जब गणगौर आई तो युवतियाँ पीपल के पेड़ के नीचे दूब लेने के लिए जाती। पीपल पर बैठा हुआ दुल्हा एक युवती से हमेशा  एक ही बात बोलता - आ मेरी अधब्याहेड़ी। यह बात सुनकर वो डर के कारण दुबली होने लग गई। उसकी माँ एक दिन उससे बोली कि मैं तुझे इतना खाने को देती हूँ फिर भी तू क्यों सूखे जा रही है। इस पर उसने उसकी माँ से बताया कि एक दूल्हे की पोशाक में पीपल पर बैठा युवक मुझसे कहता है कि आ मेरी अधब्याहेड़ी। सबकुछ सुनकर उसकी माँ ने खुद जाकर देखा। उसने कहा अरे ये तो तेरा दूल्हा ही है। माँ ने उससे पूछा कि जमाईसा आप वहाँ क्यों बैठे हैं? उसने बताया कि मैं तो चौथ माता के रहन पड़ा हुआ हूँ। मेरी माँ ने चौथ माता का व्रत और तिल कुट्टा करने का बोला था पर किया नहीं। इस लिए चौथ माता मुझे उठा लाई और यहाँ पीपल पर बैठा दिया। युवती की माँ साहूकारनी के पास गई और सारी बात बताई। तो साहूकारनी बोली कि हे चौथ माता मैं ढाई मन का तिलकुट्टा करूँगी। तब चौथ माता ने प्रसन्न होकर दूल्हे को फेरे में लाकर बैठा दिया और धूमधाम से विवाह हो गया। फिर इस बार साहूकारनी ने गलती नहीं की और पूर्ण श्रद्धा भाव से चौथ माता का व्रत और तिलकुट्टा किया। 

  हे चौथ माता जैसे साहूकारनी के बेटे बहु को मिलाया उसी प्रकार सबके बेटे बहु को मिलाए रखना।

अनुकरणीय संदेश -

  • अपने वचनों पर कायम रहें।

3 गणेश जी की कथा:--

एक देवरानी जेठानी थी। देवरानी धनवान और जेठानी बहुत गरीब थी। जेठानी देवरानी के घर पर काम करती थी। वहाँ पर जिस कपड़े से वह आटा छानती थी उसे अपने घर ले जाकर उसे पानी में धोकर वह पानी अपने पति को पीने के लिए दे देती। एक दिन देवरानी के बच्चों ने ताईजी को यह करते हुए देख लिया। उन बच्चों ने घर जाकर सारी बात माँ से बता दी। यह सुनकर देवरानी को बहुत गुस्सा आया। अगले दिन जब जेठानी आई तो उसने उसे कहा कि तुम आटा छानने का कपड़ा यहीं छोड़कर तथा हाथ धोकर फिर घर जाओगी। उस दिन जेठानी ने ऐसा ही किया। जब घर पर पहुँची तो उसके पति ने आटे का घोल खाने को माँगा। उसने सारी बात बताते हुए कहा कि आज वह कुछ भी खाने को नहीं दे सकती है तो उसके पति ने गुस्से में आकर उसे लकड़ी के पटिए से जोर से मारा। जेठानी गणेशजी की भक्त थी। गणेशजी को याद करते हुए वह पीड़ा से कराहती हुई सो गई। सपने में गणेशजी ने आकर पूछा तो उसने सारी घटना बता दी। गणेशजी ने सारी बात सुनकर कहा कि मैं कई जगह पर तिलकुट्टा खाकर आ रहा हूँ निमटने की ईच्छा हो रही है। जेठानी ने बहुत सारी जगह पड़ी है कहीं भी निमट लो। गणेशजी ने घर भर में जगह जगह निमटने का काम कर लिया। फिर पूछा कि पोंछू कहाँ पर। जेठानी ने कहा कि मेरे सिर के बालों से पौंछ लो। गणेश जी पौंछ कर चले गए। जब नींद खुली तो उसने देखा कि सारे घर में जगह जगह हीरे जवाहरात बिखरे पड़े हैं। सिर में भी हीरे जड़े हुए थे। हीरे जवाहरात समेटने में समय लगने से देवरानी के यहाँ जाने में  देर हो गई तो देवरानी ने बच्चों को देखने के लिए भेजा। बच्चों ने ताईजी के यहाँ का नजारा जाकर अपनी माँ से बता दिया। यह जानकर देवरानी दौड़ी-दौड़ी जेठानी के घर गई। वहाँ इतनी दौलत देखकर उसकी आँखे फटी की फटी रह गई। उसने जेठानी से पूछा तो उसने सबकुछ सच सच बता दिया। वो भी जल्दी से घर गई। पति को सारी बात बताकर पटिए से मारने के लिए कहा। पति ने कहा पैसे की भूखी क्यों फालतू में मार खाना चाहती हो। वो नहीं मानी तो उसके पति ने उसकी पटिए से अच्छे से पिटाई कर दी। वह सारा घर खाली करके गणेश जी का नाम लेती हुई सो गई। सपने में गणेश जी आए उन्होंने सारी बात वैसे ही की जैसी कि जेठानी के साथ की थी और चले गए। देवरानी उठी तो उसने देखा कि सारे घर मे गंदगी ही गंदगी पड़ी है और बालों में भी गंदगी लगी हुई है। बहुत दुर्गंध आ रही थी। वह गणेशजी से बोली कि तुमने मेरे साथ कपट किया है। गणेशजी आ गए और उन्होंने कहा कि तू तो धन-दौलत की भूखी मार खाई है और उसनेे धर्म की रक्षा में मार खाई है। तब देवरानी बोली की तुम यह सब समेट लो। तब गणेशजी बोले कि तू अगर अपनी दौलत का आधा भाग अपनी जेठानी को दे दे और उससे नौकरानी का काम लेने के लिए क्षमा माँग ले तो मैं सब समेट लूँगा। जब उसने यह वचन दिया तब गणेशजी ने अपनी माया को समेट लिया। 

  हे गणेशजी महाराज जैसे तूमने जेठानी को दिया वैसा सबको देना और देवरानी जैसा किसी को मत देना।

अनुकरणीय संदेश -

  • अपने से बड़े संबंधी को घर में नौकर की तरह नहीं रखें।
  • दूसरे की नकल नहीं करें।
  • धन अर्जित करने के लिए हाय पैसा हाय पैसा न करें।
  • धर्म पर चलने वाले को सदा ही अच्छे फल मिलते हैं भले ही उसमें देर हो जाए।    


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