शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

मयुर: सनातन धर्म का एक और प्रतीक Sacred Symbol of Sanatan The Peacock

 मयुर: सनातन धर्म का एक और प्रतीक 


  

प्रस्तुत की जाने वाली छवि: भगवान श्रीकृष्ण एवं मां सरस्वती के चित्र में अक्सर इसका चित्रण होता है। भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में मौरपंख होता ही है जो कि मयुर के महत्व को बताता है। श्रीकृष्ण के चित्र में दर्शाया  जाने वाला मोर एवं मयुर पंख प्राकृतिक सौंदर्य में आनंद से जीवनयापन करने का द्योतक है। यह प्रतीक है कि हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हुए आनंद से जीवननिर्वाह करना चाहिए।

माहात्म्य: सनातन धर्म का एक पवित्र प्रतीक है मयुर जोकि सौंदर्य, पुरुषत्व , गर्व ,गरिमा, आध्यात्मिकता एवं दिव्यता का प्रतीक है। मयुर पुनर्जन्म, विवेक, एवं संरक्षण को प्रदर्शित  करता है। सनातन धर्म में मयुर भी कई चित्रों में दिखाई देता है। ऐसी मान्यता है कि मयुर का सृजन भगवान विष्णु के वाहन गरूड़ के पंखों से हुआ है।

एक कथा के अनुसार श्रापवश  इंद्र के शरीर पर हजारों छाले हो जाने पर वह पंखों पर हजारों नेत्र सदृश्य धब्बों युक्त पक्षी बन गया।

एक अन्य कथा के अनुसार जब इंद्र रावण को युद्ध में पराजित नहीं कर पाया तो वह एक पक्षी के पंखों के पीछे छुप गया। बाद में इंद्र ने उस पक्षी को हजार नेत्र होने का वरदान दिया।

देवीय शक्तियों से संबध: 

कार्तिकेय का वाहन: भगवान शंकर के  बड़े पुत्र कार्तिकेय का वाहन है मयुर। भगवान कार्तिकेय युद्ध एवं विजय के प्रतीक हैं। कार्तिकेय  को अग्नि एवं स्वाहा का पुत्र भी माना जाता है परन्तु वाहन मयूर ही है। 

श्रीगणेश  का वाहन/आसन: श्रीगणेश  को मयुरेश्वर  भी कहा जाता है क्योंकि वे मयुरासन पर बैठे दिखाए जाते हैं।

मां सरस्वती से संबंध: मां सरस्वती के किसी किसी चित्र में मयुर भी दिखाया जाता है जो कि पूर्ण सुंदरता का द्योतक है। पूर्ण सुंदरता विवेक में अंतर्निहित होती है। 

मयुर मां लक्ष्मी का भी प्रतिनिधित्व करता है।

मयुर के पंखों में अनेक नेत्र सदृश्य  आकृतियां होती हैं जो कि दृष्टि, विवेक और अंतर्दृष्टि के द्योतक हैं।

सुंदरता एवं गरिमा का प्रतीक: मयुर सुदंरता एवं गरिमा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे सौंदर्य, लालित्य एवं स्पंदन के प्रतीक हैं।

संरक्षक: मयुर संरक्षक हैं। वे प्रतीक हैं सामर्थ्य , संरक्षण, आपदा के विरूद्ध डटकर खड़े रहने की प्रवृत्ति  का। इसी कारण मयूर युद्ध के देवता कार्तिकेय के वाहन हैं।  

आसुरी शक्तियों से रक्षा करने वााला: मयुर को सांप को मारते हुए दिखाया जाता है जो कि प्रतीक है बुराई से रक्षा करने का। इसीलिए आसुरी शक्तियांे से बचाव के लिए भी मयुर पंखों का उपयोग होता है। मयुर पार्थिव एवं दैवीय संबंध को अभिव्यक्त करते हैं। मयुर के पंखों का कई धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यां में उपयोग होता है।

भारत का राष्ट्रीय पक्षी: मयुर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है जिसको मारना अपराध है।



नाग पंचमी- पूजन एवं कथा Puja Wrat Upwas kathaen sandesh sanatan pratik

  नाग पंचमी- पूजन एवं कथा  


(श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में नाग पंचमी का व्रत किया जाता है। अग्रवालों में इसका विशेष महत्व है। एक दिन पहले सायंकाल भोजन बनाकर रख लिया जाता है क्योंकि उसी को दूसरे दिन प्रयुक्त करना होता है। चने, मूँग, आदि भिगो लिए जाते हैं।)

1 . पूजन विधि- 1. प्रातः शीतल जल से स्नान कर लेना चाहिए।

2. इस दिन वैसे तो साँप की बांबी पर जाकर नाग की पूजा की जाती है परंतु आजकल यह संभव नहीं है इसलिए घर के आंगन में साँप  की बांबी के प्रतीक स्वरूप रेती का छोटा सा टीला बना कर तथा उस पर नाग की मूर्ति रखकर पूजा कर सकते हैं। यदि नाग की मूर्ति नहीं हो तो गीली मिट्टी से कुंडली मार कर बैठे नाग बनालें।

3. पुजा  के प्रारंभ में प्राणायाम, ध्यान एवं गणपति की स्थापना कर पूजन करें।

4. दाहिने  हाथ में कुछ जल, कंकु, अक्षत, पुष्प लेकर निम्नलिखित संकल्प लें-

 - मेरे कुल में विभिन्न उपद्रवों के निवारण एवं रोग रहित आयुवृद्धि हेतु मैं नाग पंचमी व्रत करती हूँ।

                                                                      प्राकृतिक बाम्बी 

   


                                                                   रेत से बनी नाग की बांबी              

  


                                                                      रूई से बनी पुनियाँ          

5. नाग देवता का पूजन भी उसी विधि से किया जाता है जैसे कि सारे पूजन किये जाते हैं। इस पूजा में चूँकि ठंडे का ही प्रावधान है इसलिए प्रतीक स्वरूप  दिया एवं अगरबत्ती  बिना जलाए ही रख दिए जाते हैं। चित्र में दिखाए अनुसार रूई की पुनियां (रूई की पुनी पर कुछ कुछ दूरी पर बीच में कंकू एवं हल्दी लगाकर) बना कर नाग पर चढ़ाई जाती हैं। 

6 पिछले दिन बनाई गई ठंडी भोजन सामग्री का भोग लगाएँ। ठंडा ही भोजन किया जाता है।  सामग्री में दही का प्रयोग अवश्य  करें। 

7 सासूजी/बहिन बेटी के लिए बायना निकाले।

2   नागपंचमी की पौराणिक  कथामहाभारत काल में द्वापर युग की समाप्ति एवं कलियुग के प्रारम्भ के संधिकाल में राजा जनमेजेय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए नागों का संहार करने के लिए एक विशाल यज्ञ करवाया । राजा परीक्षित की मृत्यु सर्पों के राजा तक्षक के डसे जाने से हुई थी । हवन कुंड में लाखों नाग आहुति बन रहे थे । तब आस्तिक ऋषि ने राजा से इस यज्ञ को बंद करने का आग्रह  किया 

3  नागपंचमी की लोक कथा -

एक साहुकार था। उसके सात बेटे और बहुएँ थी। एक बार सातों बहुए खदान से मिट्टी लेने के लिए गईं। खोदते समय उसमें से एक नाग निकला। जब सभी बहुए नाग को मारने लगी तो सबसे छोटी बहु ने उसे मारने नहीं दिया और नाग को अपना भाई बनाते हुए बोली- “मेरे पीहर में बाप, बांबी में साँप।” तब सारी देरानी-जेठानियाँ बोली कि कल इसकी छाने लाने की बारी है, इसे वहीं भेजेगें, वहाँ नाग निकलेगा और उसे डस लेगा। जब दूसरे दिन छोटी बहु छाने लेने गई तो वहाँ नाग बैठा था, वह उसे देखकर जोर से फुफकारा। नाग को देखकर वह बोली- “भाईजी, राम राम।”  नाग बोला, “तुने मुझे भाई बोला है इसलिए वर्ना तो मैं डस लेता।” तो छोटी बहु बोली, “ऐसे कैसे डस  लेता तू तो मेरा धरम भाई है,” और बोली - 

जीवो नाग नागोलियो, जीवो वासुकी नाग, 

जिव मेरो लाड़ लड़ायो, नेवर घाली पाँव।

यह सुनकर नाग ने उसे नेवर देकर जाने दिया। पांव में नेवर पहिन कर छोटी बहु इठलाती हुई घर पहुंची तो उसकी जेठानियाँ उसे जीवित देखकर बोल पड़ी कि नाग ने उसे तो डसा ही नहीं। थोड़ी देर बाद नाग आया और बोला, “मेरी बहिन को भेजो मैं उसे ले जाने आया हूँ।”

 यह देखकर जेठानियाँ ईर्ष्यावश  आपस में चर्चा करने लगी कि देखो इसको तो इसका मुँह बोला धरम भाई नाग लेने आ गया और अपने को तो सगा भाई भी लेने नहीं आया। उन्होंने छोटी को तैयार कर भिजवा दिया। रास्ते में उन दोनों को खून की नदी बहती मिली। तब नाग उसे अपनी पूँछ पकड़ा कर नदी पार कराने लगा तो खून की नदी दूध की हो गई। वह अपने पीहर नाग के घर पहुँच गई। वहाँ नाग की माता एवं अन्य भाई भी रहते थे। वहाँ उसको बहुत लाड़ प्यार मिला। बहुत दिन हो गए, एक दिन नागिन छोटी बहु से बोली कि बेटी मैं काम से बाहर जा रहीं हूँ तू दूध को ठंडा करके भाइयों को पिला देना। छोटी बहु ने दूध को ठंडा किए बिना ही गर्म गर्म दूध ही पिला दिया इससे किसी का फन तो किसी कि जीभ जल गई। एक दिन पड़ोसन से झगड़े में उसने बोल दिया कि मेरखाड़िया-बाड़िया की सौगंध। यह सुनकर भाइयों को लगा कि बहिन अब ऊब गई हैं, उन्होंने माँ से कहा कि इसको बहुत दिन हो गए हैं अब इसे इसके ससुराल भेज दो। जब उसको बहुत सारा धन देकर विदा करने लगे तो ताई-चाची बोली कि बाईजी तुम्हारे भाइयों ने तुम्हे बहुुत लाड-़प्यार दिया पर विदा करते समय तुम्हे छ कोठार की चाबी तो दे दी पर सातवें कोठे की चाभी तो दी ही नहीं। तब उसने नाग भाई से पूछा कि उसने सातवें कोठे की चाबी क्यों नहीं दी तो भाई बोला कि सातवें कोठे की चाबी लेगी तो पछताएगी, पर उसने जिद करके चाबी ले ही ली। उसने सातवां कोठा खोला तो वह चौंक  पड़ी, उसने देखा कि उसमें एक बूढ़ा नाग बैठा था। उसने जोर से फुफकार मारी, छोटी बहु बोली कि बाबाजी राम राम। तब वह बुढ़ा नाग बोला कि तूने मुझे बाबाजी कहा इसलिए छोड़ देता हूँ वर्ना तुझे डस लेता। तो वह बोली मैंने आपको अपना पिता बनाया भला आप मुझे क्यों डस लेतेे। यह कहकर वह बोली -

जीवो नाग नागोलियो, जीवो वासुकी नाग

जिव मेरो लाड़ लड़ायो, नौ करोड़ का हार।

नाग देवता प्रसन्न हो गया और उसने हार निकालकर दे दिया। इस प्रकार बहुत सारा धन, जेवरात, हीरे जवाहरात लेकर वह अपने ससुराल पहुँची तो उसकी इस संपति को देखकर सारी जेठानियाँ बोली कि अपने को तो सगे पीहर से भी कुछ नहीं मिलता इसे तो पीहर नहीं होने के बाद भी इतना कुछ मिल गया। दूसरे दिन छोटी के बच्चे ताइयों के अनाज की बोरियाँ साफ करा रहे थे तो वे व्यंग में बोली की तुम हमारी बोरियाँ मत साफ कराओ, तुम्हारे मामा-नाना तो अजरांगिया-बजरांगियां हैं, वो सुनते होंगे तो चांदी की बोरियां मंगा देंगे। ये बात बच्चों ने अपनी मां से जाकर कही तो नाग भाई ने भी सुनली। उसने अपनी मां से कहकर सोने चांदी की बोरियां मंगवा दी और एक बाई रखवा दी। तीसरे दिन बच्चे उनके यहां झाड़ू निकाल रहे थे तो फिर से ताइयों ने ताना मारा तो नाग भाई ने सोने चांदी की झाड़ू मंगवा दी। यह देखकर ताइयों ने विचार किया कि इनको तो ताना मत मारो, ये तो जैसे सुनते हैं इसका घर धन दौलत से भर देते हैं। अपन इसके लिए राजा को जाकर भिड़ा देते हैं। वे राजा के पास गई और शिकायत करी कि उनकी देरानी के पास नौ करोड़ का हार है वो उसको थोड़े ही शोभा देता है वह तो रानी के गले में ही शोभा देगा। तब राजा ने साहुकार और उसकी बहु को बुलाकर उससे वह हार देने के लिए कहा। बहु ने उसे उदास मन से दे दिया पर साथ ही बोली कि “मेरे गले का मोती का हार, रानी के गले में नाग हो जावे”। यह कह कर वह जाने लगी तभी रानी के गले का हार  नाग हो गया और वह रानी को डसने लगा तो रानी ने राजा से यह कहकर कि बहु ने कुछ जादू टोना कर दिया है, बहु को फिर से बुलवा लिया। राजा ने उसे डाटा कि तूने रानी के साथ यह क्या कर दिया। तो छोटी बोली कि मैंने तो कुछ नहीं किया, मुझे तो मेरे मुंह बोले धरम भाई नाग देवता ने यह हार दिया था। यह सुनकर राजा ने वह हार वापस दे दिया और साथ ही एक हार अपनी तरफ से और दे दिया। यह देखकर जेठानियां और जल भून बैठी कि यह  तो राजा से भी नहीं डरी, तो फिर उन्होंने  उसके पति के कान भरे कि तेरी बहु तो सेठ के यहाँ जाती है और वहां से धन लेकर आती है तू उससे लड़ता क्यों नहीं है। यह सुनकर कान का  कच्चा उसका पति छोटी से झगड़ पड़ा और उसने पूछा सच बता तू इतना धन कहां से लाती है। यह सुनकर छोटी ने अब तक की घटना की सारी कहानी सुना दी। यह सुनकर उसके पति ने सारे गांव में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब कोई अब से नागपंचमी का व्रत करेंगे, नाग देवता की पूजा करेंग ,बाँसी खाएंगे और बायणा निकालेंगे।

हे नाग देवता जैसा बिना पीहर वाली छोटी बहु को दिखाया वैसा ही सभी कहने सुनने वालों को दिखाना।

इसके बाद कोई भी गणेशजी की कहानी कहें। 

4 .अनुकरणीय संदेश  -

  • सर्प की हत्या न करें।
  • किसी को भी आदर सूचक अपनत्व भरे वचनों से संबांधित करने पर वह आपका अपना हो जाता है।
  • किसी की उन्नति देखकर ईर्ष्या  न करें।


गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

चौथ माता की लोक कथा -1 पूजा , व्रत , उपवास , कथाएं , सनातन प्रतीक , Puja ,wrat upwas ,kathayen , sanatan symbols

 


चौथ  माता  की लोक कथा -1 




  एक माँ-बेटे थे। लकड़हारा बेटा कमाकर लाता जिससे दोनों का खर्च आराम से चल जाता था। बेटा जो लकड़ी लाता माँ उसमें से दो लकड़ी रख लेती तथा उन्हें बेचकर चौथ  माता के पूजन और व्रत की सामग्री लाती थी।चौथ के दिन 5 लड्डू बनाती। एक गणेश जी, एक चौथ माता का, एक बायणे का तथा चंद्र दर्शन  के बाद एक खुद खा लेती। एक चौथ के दिन बेटा अपने पड़ौस में गया वहाँ महिलाएँ चौथ माता की पूजा कर रहीं थी। यह देखकर बेटे ने पूछा कि आप सब क्या कर रहीं हैं? महिलाएँ बोली की हम चौथ माता का पूजन कर रहीं तेरी माँ तो हर महिने यह करती है, चूरमा बनाती है, क्या तुझे खाने को नहीं देती है? बेटा घर गया और माँ से लड़ने लगा कि मैं इतनी मेहनत से कमा कर लाता हूँ और तू लड्डू बना कर मजे से खाती है। माँ ने कहा - “बेटा यह व्रत तो मैं तेरी भलाई के लिए ही करती हूँ। तू ही बता भला कोई केवल लड्डू खाने के लिए दिनभर भूखा रहकर रात को चंद्रमा दिखने के बाद क्यों खाएगा।”... पर बेटे को क्रोध के कारण माँ की बात समझ में नहीं आई। उसने माँ को चौथ का व्रत करने के लिए मना किया और रूठ कर घर से जाने लगा। माँ  ने कहा - “बेटा ले ये आखे(अक्षत/पूरे चावल) ले जा, जब भी तुझ पर कोई संकट आए चौथ माता का नाम लेकर छोड़ देना तेरा संकट दूर हो जाएगा।”

  बेटा घर छोड़ कर निकल पड़ा। मार्ग में एक खून की नदी मिली। उसने आखे छोड़े और बोला यदि चौथ माता तू सच्ची है तो मूझे रास्ता दे। नदी में रास्ता बन गया और वह नदी के पार आगया। आगे बाघ आदि वाले जंगल में फंसा। उसने चौथ माता के नाम पर आखे छोड़े। फिर से उसे रास्ता मिल गया। इससे उसको चौथ माता के प्रताप पर विश्वास हो गया। आगे जाकर एक ऐसे राज्य में पहुँचा जहाँ का राजा हर माह एक  मनुष्य की बली देता था। ठिकाने की तलाश  में वह एक वृद्धा माँई के घर पहुँचा। उसने देखा कि वृद्धा मालपूए बनाती जा रही थी और रो भी रही थी। उसने रोने का कारण  पूछा। वृद्धा ने बताया कि आज राजा उसके बेटे की बली चढ़ाने वाला है। यह सुनकर चौथ माता पर विश्वास  के चलते उसने कहा कि मुझे मालपुआ खाने को दे दे मैं तेरे बेटे की जगह चला जाउँगा। मालपूए खाकर वह सो गया। राजा का बुलावा आने पर उसे वृद्धा ने जगा दिया। वह उठकर जाते हुए आखे छोड़ता गया और चौथ माता से विनती करता गया कि हे माता मेरे संकट को टालना। राजा ने बली देने के लिए मिट्टी के घड़े पकाने के लिए आवा तैयार कर रखा था। बेटा आवा में बैठ गया। तीन दिन निकल गए। आवा के पास खेलने वाले बच्चों ने आवा पर कंकर मारा तो आवा के पकने की आवाज आई। बच्चों ने राजा को आवा पकने का समाचार दिया। राजा को आश्चर्य  हुआ कि आवा पकने मेें छः महीने लगते हैं तीन दिन में कैसे पक गया। राजा आवे के स्थान पर गया तो देखा कि वहांँ पर जवारे उगे हुए थे और मिट्टी के घड़ों के स्थान पर सोने-चांदी के कलश  दिखाई दे रहे थे। राजा आश्चर्य  चकित होकर कलश  उतारने लगा इतने मे आवाज आई- हे राजा कलश  धीरे-धीरे उतारना। राजा डर गया कहीं लड़के का भूत तो नहीं है? लड़के ने कहा- “हे राजन डरो मत मैं तो वही लड़का हूं जिसकी तुमने  बली दी थी। मेरी माँ  चौथ माता का व्रत करती थी उसी के प्रताप से मैं बच गया।“

 राजा ने उसकी बात की सच्चाई को परखने के लिए उसे जंजीरों से बँधवा दिया और बोला कि अब छूट कर बता। चौथ माता सच्ची होगी तो यह जंजीर खुल जाएगी और मुझे बाँध लेेगी। लड़के ने चौथ माता का नाम लेकर आखे छोड़ते हुए कहा कि तूने मुझे तीन संकटों से उबारा है अब इस चौथे संकट से भी मुझे निकाल। यह कहते से ही वह बंधन मुक्त हो गया और राजा जंजीर में बंध गया।

  राजा ने अपनी बेटी का विवाह उस लड़के से कर दिया। एक दिन दोनों पति-पत्नी बैठे हुए थे तो बिजली कड़की, जिसे देखकर लड़का बोला कि मेरे गाँव में बिजली चमकी है।  राजकुमारी बोली जब क्या आपका गाँव भी है? हां गाँव भी है और वहाँ माँ भी है? अरे तो फिर आप अपनी माँ  को अकेली छोड़कर यहां क्यों बैठे हैं? बेचारी सासुमाँ  किस हाल में होगी? चलो अपने गाँव चलो।..... राजा ने दोनों को बहुत सारा धन देकर उनको विदा किया।

  गाँव पहुँचने पर वे माँ  से मिले और माँ  के पैर पड़ते हुए बोले- माँ  तेरी चौथ माता की कृपा और प्रताप से ही मैं वापस जीवित लौट सका हूँ।... माँ  ने सारे गाँव  में ढूंढी  पिटवा दी कि साल में 13 नहीं तो 4 नहीं तो कम से कम 2 चौथ माता के व्रत तो अवश्य  करें। बाद में बहु और गाँव की अन्य महिलाएँ भी व्रत करने लगी और चौथ माता के आशीर्वाद से सभी सुखपूर्वक रहने लगे।

  हे चौथ माता, जैसा लड़के का संकट टाला और उसके परिवार को सुख-समृद्धि दी वैसे ही सबके दुखों को दूर करना और सबको सुख शांति देना।

अनुकरणीय संदेश :-

  •  दृढ़ आस्था से की गई आराधना व्यक्ति में आत्मविश्वास उत्पन्न करती है जिससे उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
  •   सुख-समृद्धि प्राप्त होने पर अपने माता-पिता और परिवार को नहीं भूल जाना चाहिए।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी- सिद्धिनायक व्रत- (गणेश चौथ ) Puja ,wrat ,upwas ,kathaen ,sacred symols of sanatan dharm

 भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी- सिद्धिनायक व्रत- (गणेश  चौथ ) 


(भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को यह व्रत किया जाता है। वस्तुतः इसे हम गणेश  चौथ  के नाम से अधिक जानते हैं। इस तिथि को चंद्र दर्शन  वर्जित है, चंद्र  दर्शन हो जाने पर मिथ्या कलंक लगने की संभावना रहती है। इसलिए इस चौथ पर चंद्र  दर्शन नहीं किए जाते जबकि अन्य चौथ पर चंद्रदर्षन कर ही व्रत खोला जाता है। )

मध्यान्ह में सिद्धिविनायक का ध्यान कर श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक पूजन करें।

1 पूजा से पूर्व नित्यानुसार स्नान, स्वयं के मस्तक पर तिलक करवा लें, लच्छा बांध लें एवं पूर्व या उत्तर  दिशा  में मुँह कर निम्नानुसार आचमन, प्राणायाम एवं ध्यान करें।

2 सर्वप्रथम शुभ मुहुर्त में दीपक एवं अगरबत्ती  प्रज्ज्वलित करलें।

3 पवित्रीकरण- ॐ अपवित्रः पवित्रों वा सर्वावस्थां गतोअपि वा। ॐ पुंडरीकाक्षः पुनातु, ॐ पुंडरीकाक्षः पुनातु, ॐ पुंडरीकाक्षः पुनातु का  उच्चारण करते हुए स्वयं एवं पूजन सामग्री पर पवित्र जल का छिड़काव करदें।

4 पवित्रीधारण- यदि उपलब्ध हो तो कुशकी रिंग बनाकर दाहिने हाथ की अनामिका में पहन लें।

5 आचमन -  ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः। इन मंत्रोंको बोलकर कर्पुरसे सुवासित आचमन करें। आचमन के लिए हर बार इसी सुवासित जल का उपयोग करें।

6 ॐ हृषिकेशाय नमः का उच्चारण करते हुए हाथ धोलें।

7 प्राणायाम - गायत्रीमंत्र “ओम भुर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोद्यात” का वाचन करते हुए 5 बार अनुलोम विलोम प्राणायाम करलें।

8 रक्षाद्वीप प्रज्वलन - अक्षतों पर घी का दीप रखकर प्रज्वलित करें। अगरबत्ती जला लें। 

9 शांति पाठ करें। ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षः शांतिः पृथिवी शान्तिरापः शांतिरोषधयः शांति। वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः शांतिब्र्रह्म शांति सर्व शांतिः शांतिरेव शांति सा मा शांतिरेधि ॐ

10 गणपति की स्थापना एवं पूजा करें।

11 यदि पहलें से पूजित प्रतिमा नहीं है तो बाएं हाथ में अक्षत लेकर दाहिने हाथ से कुछ  अक्षत लेकर नई प्रतिमा या सुपारी पर छोड़ते हुए निम्न मंत्र का वाचन करते हुए प्राणप्रतिष्ठा करें-

ॐ मनो जूतिर्जुषता माज्यस वृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ समिमं दधातु। विश्वेदेवास इह मादयन्तामो प्रतिष्ठ।। ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठंतु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च।। अस्यै देवत्व मर्चायै मामहेति च कश्चन।।  

12 गणपति-गौरी पूजन- हाथमें अक्षत लेकर गणेश जी का ध्यान करें।             ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः उच्चारण करते हुए अक्षत चढ़ादें।

 गणपतिके दाहिनी ओर भगवती गौरीका आहवान करें। उनपर अक्षत अर्पित करें।

12.1 आसनम् समर्पियामी कहते हुए आसनके पास अक्षत छोड़दें। आचमन समर्पियामी कहते हुए आचमन अर्पित करें।

12.2 स्नानम् समर्पियामी कहते हुए शुद्धजल से स्नान कराएँ।

12.3 पंचामृत स्नानम् समर्पियामी कहते हुए पंचामृतसे स्नान कराएँ।

12.4 शुद्धोदक स्नानम समर्पियामी कहते हुए शुद्धजल से स्नान कराएँ।

12.5 वस्त्रं समर्पियामी कहते हुए रोली लच्छा चढ़ाएँ। 

12.6 यज्ञोपवीत समर्पियामी कहते हुए जनेउ चढ़ाएँ एवं आचमन कराएँ।

12.7 उपवस्त्रं समर्पियामी कहते हुए यदि कोई वस्त्र हो तो या लच्छा चढ़ाएँ एवं आचमन कराएँ।

12.8 चंदनानुलेपं समर्पियामी कहते हुए चंदन चढ़ाएँ।

12.9 अक्षतं समर्पियामी कहते हुए अक्षत चढ़ाएँ।

7.12.10 पुष्पं समर्पियामी कहते पुष्प एवं माला तथा श्री गणेष के इक्कीस नाम लेकर इक्कीस प्रकार के पŸो समर्पित करें।

1. ॐ सुमुखाय नमः - शमी पत्र  2. ॐ गणाधीषाय नमः  - भंगरैया का पत्ता  3. ॐ उमापुत्राय नमः - बिल्व पत्र 4. ॐ गजमुखाय नमः - दूर्वादल 5, ॐ लंबोदराय नमः - बेर का पत्ता  6. ॐ हरसूनवे नमः - धतूरे का पत्ता   7. ॐ शूर्पकर्णाय नमः - तुलसी दल  8. ॐ वक्रतुंडाय नमः - सेम का पत्ता   9. ॐ गुहाग्रजाय नमः - अपामार्ग का पत्ता  10. ॐएक दंताय नमः - वनभंटा का पत्ता  11. ॐ हेरंबाय नमः - सिंदूर का पत्ता या चूर्ण  12. ॐ चतुर्होत्रे नमः - तेजपात 13. ॐ सर्वेषराय नमः - अगस्त्य का पत्ता  14. ॐ विकटाय नमः - कनेर का पत्ता 15. ॐ हेमतुंडाय नमः - कदली पत्र  16. ॐ विनायकाय नमः - आक का पत्ता 17. ॐ कपिलाय नमः - अर्जुन का पत्ता 18. ॐ वटवे नमः - देवदार का पत्ता 19. ॐ भालचंद्राय नमः - मरूआ का पत्ता  20. ॐ सुराग्रजाय नमः - गांधारी पत्र 21. ॐ सिद्धिविनायकाय नमः - केतकी पत्र।

यह संभव है कि हम न तो इन सभी प्रकार के पत्तों  को पहचानते हैं और न ही ये आसानी से उपलब्ध हो सकते हैं। अतः जो पत्ते  उपलब्ध न हो सकें उनके स्थान पर बिल्व पत्र को समर्पित कर दें।

12.11 इसी प्रकार संबंधित वस्तु का नाम.......समर्पियामी के साथ लेते हुए अबीरं, धूपं, दीपं चढ़ाएँ। दीप के बाद हाथ धो लें।

.12.12 नैवेद्यं समर्पियामी कहते हुए गुड़ एवं मोदक(लड्डू) चढ़ाएँ एवं आचमन कराएँ।

12.13 ऋतुफलं, तांबुलम्, द्रव्य दक्षिणाम् समर्पियामी।(ये सब वस्तुएं चढ़ाएं)

12.13. आरती, कर्पुर आरती एवं शीतला आरती करें।

12 .14 पुष्पांजलि करें। 

12 .15 पूजन में जाने अनजाने रही किसी भी त्रुटि, कमी  हेतु  क्षमा याचना करें। 


तिथियों की माता चतुर्थी की उत्पत्ति की पौराणिक कथा Puja ,wrat ,upwas ,kathaen , sanatan symbols

 तिथियों की माता चतुर्थी की उत्पत्ति  की पौराणिक कथा (संक्षेप में मुद्गल पुराण से)  




लोकपितामह ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना के लिए अपने हृदय में श्रीगणेश  का ध्यान किया। उसी समय उनके शरीर से प्रकृति स्वरूपा तिथियों की जननी देवी प्रकट हुई। देवी ने श्रीब्रह्मा से कहा, “आप मेंरे पिता हैं आज्ञा करें मैं क्या करूँ?  कृपया मुझे रहने के लिए स्थान एवं भोजन प्रदान करें।” श्रीब्रह्मा ने मंत्र वक्रतुंडाय हुम् देते हुए कहा तुम अद्भुत सृष्टि की रचना करो। देवी ने श्रीगणेश जी को प्रसन्न करने के लिए हजारों वर्ष तक तप किया। तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीगणेश जी ने देवी से वर मांगने हेतु कहा। देवी ने कहा, “मुझे आपकी भक्ति, स्नेह, सदैव निकटता तथा सृष्टि सृजन की सामर्थ्य  प्राप्त हो।” श्रीगणेश जी ने स्वीकृति में ओम का उच्चारण करते हुए कहा “तुम समस्त तिथियों की माता होंगी, तुम्हारा नाम चतुर्थी होगा, तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय रहोगी, तुम्हारा बायां भाग कृष्ण एवं दाहिना भाग शुक्ल होगा।” यह कह श्रीगणेश  अन्तर्धान हो गए। चौथ  माता द्वारा गणपति का ध्यान करते हुए सृष्टि की रचना करना प्रारंभ करते से ही, सहसा उनका वाम अंग कृष्ण एवं दायां भाग शुक्ल हो गया। उनके मुख से प्रतिपदा, नासिका से द्वितीया, वक्ष से तृतीया, अंगुली से पंचमी, हृदय से षष्टी, नेत्र से सप्तमी, बाहु से अष्टमी, उदर से नवमी, कान से दशमी, कंठ से एकादशी , पैर से द्वादशी , स्तन से त्रयोदशी , अंहकार से चतुर्दशी , मन से पूर्णिमा, और जीभ से अमावस्या तिथि प्रकट हुई। शुक्ल चतुर्थी ने श्रीगणेश जी की आराधना की उससे प्रसन्न होकर उन्होंने कहा," शिव एवं अन्य देवगण तथा मेरे भक्त जन तुम्हारा व्रत करेंगे। उन्हें मैं सबकुछ प्रदान करूंगा। तुम्हारा नाम वरदा होगा।” बाद में उन्होंने कृष्ण चतुर्थी को भी वर देते हुए कहा कि चंद्रोदय होने पर तुमने मुझे प्राप्त किया है तुम मुझे सदैव प्रिय रहोगी, इस दिन निराहार रहकर चंद्रोदय पर दर्शन  करने वालों को तुम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सब प्रदान करोगी। मेरी कृपा से तुम सर्वदा मनुष्य को आनंद प्रदान करने वाली होगी। चंद्रोदय होने पर मेरा पूजन एवं चंद्र दर्शन  कर ब्राह्मण को भोजन करा स्वयं भोजन करे। श्रावण में लड्डू, भाद्रपद में दही, आष्विन में निराहार, कार्तिक में दुध, मार्गशीर्ष में जलाहार, पौष में गौमूत्र, माघ में श्वेत तिल, फाल्गुन में शर्करा, चैत्र में पंचगव्य, वैशाख में कमलगट्टा, ज्येष्ठ में गोघृत और आषाढ़ में मधु का भोजन करना चाहिए।

चौथ  का व्रत समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने, धन-धान्य और आरोग्य प्रदान करने,  समस्त आपदाएँ को नष्ट करने, तथा श्रीगणेश  की कृपा से परमार्थ सिद्धि करने वाला होता है। अतः यदि संभव हो तो मास की दोनों चतुर्थी नहीं तो कम से कम भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चौथ बहुला, कार्तिक कृष्ण पक्ष की चौथ  करका (करवा), तथा माघकृष्ण पक्ष की चौथ  तिलका(माही चौथ ) व्रत करना चाहिए। रविवार या मंगलवार को पड़ने वाली चतुर्थी का अमित माहत्म्य है। जिस तिथि को चतुर्थी का चंद्रोदय हो रहा हो उसी दिन व्रत करना चाहिए।


श्रीगणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा (शिवपुराण से संक्षेप में) Puja , wrat , upwas , kathaen, sanatan symbols

 श्रीगणेश  चतुर्थी की पौराणिक कथा (शिवपुराण से संक्षेप में)- 


श्वेतकल्प में पार्वतीनंदन का मस्तक शिवजी ने त्रिशूल से अलग कर दिया तो संपूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया और प्रलय का दृश्य  उपस्थित हो गया। तब जगदंबा को प्रसन्न करने के लिए गज का मस्तक लगाकर पार्वती पुत्र को पुनर्जीवित कर दिया गया। ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश  ने उस बालक को सभी गणों का सर्वाध्यक्ष घोषित कर दिया। इस प्रकार वे गणेश  या गणपति हो गए। 

श्रीमहादेव ने गजानन को वर दिया “विघ्ननाश  के कार्य में तेरा नाम सर्वश्रेष्ठ होगा। तू सबका पूज्य है, अतः अब मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा। गणेश्वर ! तू भाद्रपदमास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथी को चन्द्रमा का शुभोदय होने  पर उत्पन्न हुआ है। जिस समय गिरिजा के सुन्दर चित्त  से तेरा रूप  प्रकट हुआ, उस समय रात्रि का प्रथम प्रहर बीत रहा था। इसलिए उसी दिन से आरम्भ करके उसी तिथि में प्रसन्नता के साथ(प्रतिमास) तेरा उत्तम व्रत करना चाहिए। वह व्रत परम शोभन तथा संपूर्ण सिद्धियों का प्रदाता होगा।”

“ जो मनुष्य नाना प्रकार के उपचारों से भक्तिपूर्वक तेरी पूजा करेंगे, उनके विघ्नों का सदा के लिए नाश  हो जाएगा और उनकी कार्यसिद्धि होती रहेगी। सभी वर्ण के मनुष्यों को, विशेषकर स्त्रियों को यह पूजा अवश्य  करनी चाहिए तथा अभ्युदय की कामना करने वाले राजाओं के लिए भी यह व्रत आवश्यक कर्तव्य  है। व्रती मनुष्य जिस-जिस वस्तु की कामना करता है, उसे वह वस्तु अवश्य  प्राप्त हो जाती है। अतः जिसे किसी वस्तु की अभिलाषा हो, उसे तेरी सेवा अवश्य  करनी चाहिए।”

गणेश  पुराण में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भी मध्यान्ह काल में श्रीगणपति पूजन का माहात्म्य बताया गया है। चूँकि श्रीगणेश  का प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्यान्हकाल में हुआ था अतः यह तिथि अत्यंत फलदायिनी है एवं इस दिन मध्यान्ह में गणेषजी की मूर्ति की उपासना की जानी चाहिए।


बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

चौथ का व्रत की विधि puja ,wrat ,upwas , kathaen , sanatan pratik

 चौथ का व्रत 

  (वर्ष भर में चार चौथ  सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसी मान्यता है कि चौथ के व्रत से मनोकामना पूर्ण होती है तथा परिवार में सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। कई महिलाएं बारह महिनों कीचौथ पर व्रत किया करती है। विशेष चौथ सहित अन्य मासिक चौथ के लिए कहानियाँ आगे इसी ब्लॉग में पूर्व में दी गईं  हैं। ।चौथ का व्रत श्रीगणेशजी से संबंधित है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चौथ का व्रत के पीछे निम्नलिखित पौराणिक विवरण मिलता है जिसे संक्षेप में दिया जा रहा है।)

चौथ माता की स्थापना 


 


                                                                 चौथ माता की  मूर्ति                                                                                                                                   

             


                                                               चौथ  माता की चौकी 

  चौथ माता की पूजन विधि -

  • पूजा दिन में या सांयकाल कभी भी की जा सकती है।
  • सर्वप्रथम किसी स्वच्छ स्थान पर माता की चैकी को स्थापित करें।ं
  • साफ चौकी पर कंकू से स्वस्तिक बना लें। उस पर गेंहूं की ढेरी बना लें।
  • ढेरी पर एक लौटे में जल लेकर कलश रखिए। कलश के चारों ओर लच्छा बांध लीजिए एवं कंकू की पांच बिंदियां लगा लें। उस पर नारियल रखने की आवश्यकता नहीं है। उसके सामने चौथ माता की मूर्ति को विराजित कीजिए।
  • फिर जैसे सभी पूजा की जाती है वैसे पूजा कर लीजिए। चूरमें के लड्डू/गुड़ का हलवा/बेसन के लड्डू/मावे की मिठाई आदि किसी भी मिठाई का नैवेद्य लगा दें। बायना निकालें।
  • पूजा के पश्चात कथा कर लीजिए।
  • रात्रि को चंद्र दर्शन के उपरांत चंद्रमा को गेंहू की ढेरी पर रखे कलश से अर्क दिया जाता है।
  • उसके पश्चात भोजन करें।   


पवित्र पंच पल्लव: पीपल(अश्वत्थ), पाकड़, आम, वट(बरगद ), गुलर Sacred Five Leaves and their Importance in Sanatan Dharm

 पवित्र पंच पल्लव: पीपल(अष्वत्थ), पाकड़, आम, वट, गुलर 


 माहात्म्य: पूजन क्रिया में कलश  की स्थापना की जाती है उस कलश  में पीपल, पाकड़, आम, वट एवं अशोक वृक्ष के एक एक पत्ते  को नारियल के नीचे कलश  के मुुंह पर लगाने का प्रावधान है। इन वृक्षों को पवित्र माना जाता है। उक्त सभी वृक्ष औषधीय गुणों युक्त होते हैं एवं आक्सीजन के अच्छे स्रोत होने के साथ पर्यावरण के लिए भी बहुत ही उपयोगी होते हैं संभवतः इसीलिए सनातन में इन्हें किसी न किसी देवता एवं धार्मिक क्रिया से जोड़ा गया एवं पूज्य माना गया है।

पीपल (अश्वत्थ ): यह सतयुग का प्रतीक वृक्ष है। पीपल में भगवान विष्णु प्राण की प्रधानता है। भगवान कृष्ण ने अश्वत्थ  के लिए कहा था कि वृक्षों में वे अश्वत्थ हैं। पीपल को  वृक्षराज भी कहा जाता है। पीपल के वृक्ष में देवताओं एवं पीतरों का वास माना जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से पीपल सर्वाधिक आक्सीजन प्रदान करता है अतः वह पूज्य है। पीपल संबंधी मंत्र का जाप करने से शत्रुओं का नाश  होता है, सौभाग्य, सम्पदा, धन एवं जन की उपलब्धि होती है। यज्ञ में पीपल की समिधा का होना  आवषश्यक  माना गया है। शनिवारीय अमावस्या को पीपल के पूजन का विशेष  महत्व है। पीपल को ब्रह्मस्थान माना गया है। परमधान जाने से पूर्व श्रीकृष्ण ने पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाया था। भगवान बुद्ध को बोधगया में पीपलवृक्ष के नीचे बैठकर ही सम्बोधि की प्राप्ति हुई थी। अतः इसे बोधि वृक्ष भी कहा जाता है।  वास्तु शास्त्री इसको  घर में लगाने से मना करते हैं क्योंकि इसके बीज बहुत छोटे होते हैं और भवन की दीवारों में पड़ी दरार में घुसकर उग आते हैं , इससे भवन को नुकसान पहुँचता है। 

पाकड़: पाकड़ को द्वापर युग का प्रतीक माना गया है। पाकड़ के वृक्ष की छायां घणी एवं फैली हुई होती है। इसकी लकड़ी यज्ञ एवं हवन के लिए उत्तम  मानी जाती है।

आम: आम द्वापर युग का प्रतीक है। आम को फलों का राजा माना जाता है। जो कि अत्यंत स्वादिष्ट एवं आनंददाय होता है। यह आनंद, शृंगार, का प्रतीक है। इसकी लकड़ी भी हवन में काम ली जाती है। आम के बौर, जड़, गुठली, तेल औषधीय गुण रखते हैं। आम के पत्तों  से घर के प्रवेश द्वार एवं अन्य द्वारों पर वंदनवार बनाकर लगाई  जाती है जो कि अत्यंत शुभ मानी जाती है।

वट/बड़ (बरगद): वट वृक्ष कलियुग का प्रतीक है। इसे प्रलय का साक्षी माना जाता है। वटवृक्ष में पार्थिव शिव प्राण की प्रधानता है। यह अपनी जड़ों से अन्य वृक्षों को भी समाप्त कर देता है अतः उसे वट कहा जाता है। यह वृक्ष घना छायादार एवं अत्यंत विस्तार लिए होता है, अतः इसका उपयोग कथावाचन आदि हेेतु किया जाता रहा। कथा के उपरांत प्रसाद वितरण हेतु इसके पत्तों का उपयोग किया जाता रहा होगा। यक्ष, कुबेर, यम तथा शिव से इस वृक्ष का घनिष्ट संबंध है। यक्षों का आवास होने से इसे यक्षावास भी कहा जाता है। सत्यवान-सावित्री की कथा से भी यह जुड़ा हुआ है। कई धार्मिक लौकिक कथाओं में बरगद का उल्लेख होता है  वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो इसकी जड़ें दूर दूर तक फैलकर मीट्टी को बांधेरखकर मृदाक्षरण को रोकती है। वायु को प्रदूषणमुक्त करने में सहायक है। वटवृक्ष के समस्त अवयव औषधीय दृष्टि से उपयोगी हैं। बरगद की प्रकृति शीतल है अतः ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में भी सहायक हो सकती है। प्रयागराज का अक्षयवट, वाराणसी का अक्षयवट, गया का बोधिवृक्ष, उज्जैन का सिद्धवट आदि कुछ महत्वपूण वटवृक्ष हैं।

वट-सावित्री-व्रत एक महत्वपूर्ण व्रत है जो कि सामान्यतः ज्येष्ठ मास में दक्षिण भारत में अमावस्या को एवं उत्तर भारत में पूर्णिमा को किया जाता है। वास्तु शास्त्री इसको भी  घर में लगाने से मना करते हैं क्योंकि इसके बीज बहुत छोटे होते हैं और भवन की दीवारों में पड़ी दरार में घुसकर उग आते हैं , इससे भवन को नुकसान पहुँचता है। 

गुलर: गुलर एक औषधीय पौधा है अतः इसको भी पवित्र माना गया है। इसका पत्ता  भी कलश  में लगाया जाता है।

पंचपल्लव में अशो क, जामुन के पत्तों  का उपयोग भी किया जा सकता है।

पलाश(टेसू): पलाश  में स्वयंभू ब्रह्म का वास है। इस वृक्ष का भी प्रत्येक अवयव उपयोगी है। पत्तों  से पत्तल दोने बनाए जाते हैं, तने से गोंद प्राप्त होता है, फूलों से औषधीय रंग प्राप्त होता है, प्राचीन समय से ही इस रंग का उपयोग वस्त्रों को भगवा रंगने में किया जाता रहा है। इसीलिए भगवा रंग सनातन की पहचान बन गई। यह रंग रोगाणुओं के नाश  का भी कारण होता है। इसके कई औषधीय उपयोग हैं। अतः यह भी पूज्य है। इसकी लकड़ी भी हवन के लिए आवश्यक  मानी गई है। 


रुद्राक्ष : अत्यंत महत्वपूर्ण सनातनी वस्तु , Rudraksh : importance in Sanatan dharm

 रुद्राक्ष 


माहात्म्य: पुराणों एवं आयुर्वेद में रुद्राक्ष की बहुत महिमा है। यह भगवान शिव को अत्यधिक प्रिय है। यह परम पावन है। शिवपूजन में रुद्राक्ष का महत्व उसी प्रकार से है जैसे श्रीविष्णु पूजन में तुलसी का महत्व है। इसका उपयोग बहुत अधिक होता है।  शायद ही कोई , संत ,  साधू इसको धारण न करता हो। पहनने की माला, जाप की माला , कलाई में, गले में पहनने के रूप में आदि में इसका उपयोग होता है। 

रुद्राक्ष की उत्पत्ति : एक समय भगवान शिव दीर्घावधि तक तपस्यारत रहे। तपस्या की अवधि में उनका मन क्षुब्ध हो उठा, लीलावश  उन्होंने दोनों नेत्र खोले, इससे उनके नेत्रों से कुछ अश्रुबूंदे मथुरा, काशी , लंका, आदि जगह पर गिरी उससे रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए। रुद्र(शिव) के अक्षों(नेत्रों) से उत्पन्न होने के कारण उन वृक्षों को रूद्राक्ष की संज्ञा दी गई। 

चार रंगों के रुद्राक्ष: रुद्राक्ष चार रंगों के प्राप्त होते है- श्वेत, लाल, पीला एवं काला। इन्हें क्रमशः  ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य  एवं शुद्र द्वारा पहनने का प्रावधान किया गया है।

आकार के आधार पर रुद्राक्ष - आंवले(छोटा आंवला )  के बराबर रुद्राक्ष श्रेष्ठ श्रेणी का, बेर के बराबर वाला मध्यम श्रेणी का, तथा चने के बराबर रुद्राक्ष निम्न श्रेणी का माना जाता है।

रुद्राक्ष पहनने के फल के अनुसार उसका वर्गीकरण - रुद्राक्ष जैसे जैसे छोटा होता जाता है वैसे वैसे वह अधिक फल देने वाला होता जाता है।

रुद्राक्ष में धागा पिरोने का प्राकृतिक छेद: यदि रुद्राक्ष में प्राकृतिक रूप से छेद हो तो वह उत्तम श्रेणी का होता है।

आकार भेद से रुद्राक्ष के प्रकार - रुद्राक्ष में धारियां होती हैं जिससे उसके खंड बनते  हैं। धारियों की संख्या के आधार पर यह चौदह प्रकार का होता है। उसी अनुरूप रुद्राक्ष धारण करने वाले को फल प्राप्त होता है। नीचे रुद्राक्ष के प्रकार. उसके लाभ तथा धारण करने के मंत्र साथ साथ दिए गए हैं।

1. एकमुखी रुद्राक्ष: मोक्षद, ओम् ह्रीं नमः  2. द्विमुखी (दो धारियां )  रुद्राक्ष: पापहर, ओम् नमः   3. त्रिमुखी(तीन  धारियां )  रुद्राक्ष: विद्या-नैपुण्य, ओम् क्लीं नमः   4. चतुर्मुखी(चार  धारियां )  रुद्राक्ष: साधन-सिद्धपद, ओम् ह्रीं नमः   5. पंचमुखी(पांच  धारियां )  रुद्राक्ष: पुरुषार्थदायक, ओम् ह्रीं नमः    6. षणमुखी(छः  धारियां )  रुद्राक्ष: सकलकामनापुरक एवं मरणोपरांत मोक्षदायक, ओम् ह्रीं हुं नमः   7. सप्तमुखी(सात  धारियां )  रुद्राक्ष: ब्रह्महत्यानाषक एवं पापषामक, ओम् हुं नमः   8. अष्टमुखी(आठ  धारियां )  रुद्राक्ष: द्रव्यदायक, ओम् हुं नमः   9. नवमुखी(नौ  धारियां )  रुद्राक्ष: दीर्घायुष्यप्रद, ओम् ह्रीं हुं नमः   10. दशमुखी(दस  धारियां )  रुद्राक्ष: शत्रुनाशक, ओम् ह्रीं नमः   11. एकादशमुखी(ग्यारह  धारियां )  रुद्राक्ष: सर्वसिद्धिदायक, ओम् ह्रीं हुं नमः  12. द्वादश मुखी(बारह  धारियां )  रुद्राक्ष: पुण्यद, ओम् क्रौं क्षौं रौं नमः  13. त्रयोदशीमुखी(तेरह  धारियां )  रुद्राक्ष: ऐश्वर्यदायक , ओम् ह्रीं नमः  14. चतुर्दषमुखी(चौदह  धारियां )  रुद्राक्ष: सौभाग्यवर्धक एवं संपूर्ण पापहारी, ओम् नमः

एकमुखी, एकादशमुखी एवं चतुर्दश मुखी रुद्राक्ष को साक्षात शिव रूप बताया गया है।

आयुर्वेद में रुद्राक्ष: शीतला, रक्तचाप, टीबी, वातरक्त, हृदय रोग आदि में इसका उपयोग होता है। इसका विभिन्न प्रकार से उपयोग किया जाता है। ऐसी मान्यता है इसको धारण करने से, इसकी माला पहनने से भी लाभ मिलता है।            


चंद्रमा एक सनातन प्रतीक , An Important Symbol of Sanatan : Moon The interpretation

 चंद्रमा      



अन्य नाम: चंद्रदेव, सोम, शशि , चांद

माहात्म्य: सनानत धर्म में चंद्रमा को बहुत अधिक महत्व प्राप्त है। ये कई त्यौहारों का आधार हैं। कई अवसरों पर इनकी पूजा की जाती है। सोम के रूप में यह एक महत्वपूर्ण देवता है जो कि रात्रि, वनस्पति, पौधों के अधिपति हैं। नवग्रहों में से एक महत्वपूर्ण ग्रह है। भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित होते हैं। ज्योतिष, हिंदु पंचांग, त्यौहार, व्रत आदि का एक मूल आधार चंद्रमा  हैं। इन्हे  मानव मन को प्रभावित करने वाला माना गया है। इन्हें लक्ष्मी का भाई माना गया है। चंद्रमा पर अमृत मिलता है जोकि अमरता प्रदाता है। चंद्रमा पर ही पितरों का निवास माना जाता है। सप्ताह का एक दिवस का नाम इसी के नाम पर सोमवार रखा गया है। शिव पुराण के अनुसार शिवजी ने सप्ताह के वारों का नामकरण किया। पहले क्रम में सूर्य ग्रह के वार को रविवार तथा द्वितीय दिवस को अपनी मायशक्ति का वार बनाया अर्थात संपत्ति  प्रदान करने वाला है जिसे सोमवार कहा गया। इनकी पूजा अर्चना से संपत्ति  की प्राप्ति होती है।  

चंद्रकलाओं की पौराणिक कथा: चंद्रमा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र हैं। दक्ष प्रजापति  की 27 कन्याओं से इनका विवाह हुआ था। इन पत्नियों में चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र से अधिक प्रेम करते  थे । दूसरी पुत्रियों ने दक्ष से शिकायत की। दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग का श्राप दिया। श्राप के प्रभाव के कारण उनकी आकृति घटने लगी। चंद्रमा ने शिवजी से प्रार्थना की। शिवजी ने वरदान दिया कि कृष्णपक्ष के 15 दिवस में चंद्रमा क्षीण होता जाएगा एवं अमावस्या को पूर्ण रूप ये अदृश्य  हो जाएगा तथा  शुक्ल पक्ष के 15 दिवस में वह बढ़ता जाएगा एवं पूर्णिमा के दिन पूर्णचंद्र हो जाएगा। इन्हें ही चंद्रकलाएं कहा जाता है। भगवान शिव ने श्राप के प्रभाव को कम करने एवं चंद्रमा को अमर कर देने के लिए उसे क्षीण अवस्था में अपने मस्तक पर धारण कर लिया।

चंद्रमा और नक्षत्र: चंद्रमा वर्ष भर में अंतरिक्ष में स्थित 27 नक्षत्रों के सामने से होकर गुजरता है। ये नक्षत्र अंतरिक्ष में अत्यंत दूर स्थित तारा समूह हैं। समूह के तारे एक विशेष आकृति में व्यवस्थित होते हैं जिनका कि पौराणिक पात्रों, जीवों, वस्तुओं पर नामकरण किया गया है। चंद्रमा लगभग 27.3 दिनों में एक चक्कर पूर्ण करता है। इस प्रकार चंद्रमा का नक्षत्रों से संबंध है इसलिए यह ज्योतिष शास्त्र के अंतर्गत बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

चंद्रमा, व्रत, उपवास एवं त्यौहार: लगभग सभी सनातनी त्यौहार चंद्रमा की स्थिति पर आधारित होते हैं। चंद्रमा के घटने बढ़ने की स्थिति को दो पक्ष में विभाजित किया गया है। बढ़ती हुई अवस्था को शुक्ल पक्ष(एकम से पुर्णिमा तक 15 दिवस) एवं घटती हुई अवस्था को कृष्ण पक्ष(पूर्णिमा के अगले दिन से अमावस्या तक 15 दिवस) कहा जाता है। शुक्ल पक्ष को शुभ कार्यों के लिए अच्छा माना जाता है। घटने एवं बढ़ने की अवधि को तीस दिवस में विभाजित किया गया है और प्रत्येक दिवस को एक तिथि निर्धारित है। एक पक्ष में पंद्रह तिथियां होती हैं। मुख्य तिथियों पूर्णिमा(पूर्ण चंद्र), अमावस्या (चंद्रमा नहीं दिखता), चौथ , अष्ठमी, ग्यारस आदि प्रमुख हैं। हर तिथि के साथ कोई न कोई त्यौहार, व्रत, उपवास, जुड़ा है। दीपावली, होली, रक्षाबंधन, नवरात्रि, शरदपूर्णिमा, करवा चौथ, गणेश  चतुर्थी ,महाशिवरात्रि, राम नवमी, कृष्ण जन्माष्ठमी  आदि कुछ महत्वपूर्ण त्यौहार हैं जो चंद्रमा की गति एवं स्थिति के आधार पर निर्धारित तिथियों पर आते हैं। चूंकि त्यौहारों का आयोजन तिथि के आधार पर होता है और तिथि का प्रारंभ एवं अंत चंद्रमा की गति एवं उसकी सापेक्ष स्थिति पर निर्भर करता है अतः कई पर विभिन्न मत होने के कारण कोई कोई त्यौहार दो दो बार होता है जिससे भ्रम की स्थिति बनती है। लेकिन चूंकी त्यौहार तिथि के अनुसार ही निर्धारित होते हैं अतः उनके लिए कोई अंग्रेजी केलेंडर की तिथि निर्धारित किया जाना संभव नहीं है।

चांदनी: चंद्रमा से प्राप्त होने वाला प्रकाश  चांदनी कहलाता है। उसमें  शीतलता होती है जो बहुत प्रिय लगती है। वस्तुतः सूर्य एक आग का गोला है जो स्वयं प्रकाश  उत्पन्न करता है। सूर्य का प्रकाश  जब चंद्रमा पर गिरता है और उससे पराविर्तित होकर वह पृथ्वी पर आता है तो उसमें ऊष्णता उत्पन्न करने वाली किरणों  की कमी होती है इससे वह शीतलता प्रदान करता है। शरद पूर्णिमा की रात को दूध या उसकी खीर चांदनी में रखी जाती है और ऐसी मान्यता है कि वह दूध न केवल शीतलता प्रदान करता है अपितु आँखों के लिए भी लाभप्रद होता है।  

चंद्रकलाओं का खगौलीय कारण: चंद्रमा के आधे भाग पर सूर्य का प्रकाश  निरंतर गिरता है। लेकिन पृथ्वी, सूर्य एवं चंद्रमा की सापेक्ष स्थिति के कारण चंद्रमा का चमकीला भाग कम या अधिक दिखाई देता है। जो कि प्रति दिन घटता या बढ़ता जाता है। इसे ब्रह्मा के श्राप से जोड़ा गया। 

सूर्य एवं चंद्र ग्रहण: जब कभी पृथ्वी, चंद्रमा एवं सूर्य एक सीध में आ जाते हैं तो ग्रहण होता है। जब पूर्णिमा के दिन पृथ्वी, चंद्रमा एवं सूर्य के बीच आ जाती है तो पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर गिरती है जिससे चन्द्रमा का वह भाग आँखों के सामने नहीं रहता , इसे ही  चंद्र ग्रहण कहते हैं । जब अमावस्या के दिन पृथ्वी एवं सूर्य के बीच चंद्रमा आ जाता है तो चंद्रमा की छाया पृथ्वी  पर गिरती है और सूर्य का वह भाग अस्थाई रूप से ओझल हो जाता है , जिससे सूर्य ग्रहण होता है। पुराणों में इसकी कथा अलग है जिसमें यह बताया गया है कि राहु एवं केतु के कारण ग्रहण होते हैं। समुद्र मंथन में अमृत निकला जिसे स्वरभानु नामक दानव  ने देवताओं की पंक्ति में बैठकर पी लिया। चंद्रमा एवं सूर्य ने उसे पहचानकर भगवान विष्णु को बता दिया। विष्णुजी ने सुदर्शन  चक्र से उस दानव का सिर धड़ से अलग कर दिया। परंतु चूंकि वह अमृत पान कर चुका था इसलिए उसके दोनों भाग अमर हो गए। सिर को राहु और धड़ को केतु नाम दिया गया। राहु और केतु सूर्य एवं चंद्र को दुश्मन  मानने लगे। अतः जब राहु सूर्य को निगलने लगता है तो सूर्यग्रहण होता है। तथा जब केतु चंद्रमा को निगलता है तो चंद्रग्रहण होता है परंतु दानव पूर्ण शरीर में नहीं होता है अतः सूर्य और चंद्रमा उनमें से पुनः बाहर आ जाते हैं। राहु एवं केतु 180 डिग्री पर स्थित हैं वे सदैव इसी स्थिति में चलायमान हैं। वस्तुतः ये दोनों ग्रह कोई ठोस खगौलीय पिंड न होकर काल्पनिक ग्रह हैं। राहु एवं केतु वस्तुतः छाया ग्रह हैं। जब पृथ्वी की छाया पूर्णिमा को चंद्रमा पर गिरती है तो चंद्रग्रहण होता है इसी छाया को केतु कहते हैं। इसी प्रकार जब चंद्रमा की छाया अमावस्या को सूर्य पर गिरती है तो सूर्यग्रहण होता है इसी छाया को राहु कहते हैं। इन छायाओं को पुराणों में कथाओं से समझाया गया।

चंद्रमा की उत्पत्ति  पुराणों एवं आधुनिक विज्ञान के आधार पर: भगवान शिव (ब्रह्म) एवं शक्ति (ऊर्जा) के आनंद तांडव नृत्य के दौरान शिवजी के नेत्रों से निकली ऊर्जा सूर्य एवं पार्वती की देह से निकली शीतल ऊर्जा से चंद्रमा बने। अर्थात सृष्टि के प्रारंभ में  ब्रह्मांडीय उद्वेलन से जो उथल पथल हुआ उसी से  चंद्रमा एवं सूर्य का भी निर्माण हुआ। स्पष्ट है पौराणिक कथाएं भी इसी ओर संकेत करती हैं।

एक कथा और है, समुद्र मंथन से निकले विष को शिवजी ने पी लिया एवं उसकी गर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए शीतल चंद्र को मस्तक पर धारण कर लिया। यह कथा भी यही संकेत करती है कि सूर्य, चंद्र, पृथ्वी आदि सभी खगोलीय पिंडों का अस्तित्व ब्रह्मांडीय अंतःक्रिया का ही परिणाम है।



   


सनातन होने के प्रतीक तिलक की व्याख्या Interpretation of Tilak a symbol related to Hindu

 तिलक  


तिलक: सनातन धर्मावलंबियों में तिलक एक विशिष्ट पहचान है, स्त्री, पुरूष, बड़े, छोटे सभी तिलक लगाते हैं। कोई भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पहले व्यक्ति के मस्तक पर भोहों के मध्य रोली, चंदन, सिंदूर आदि से तिलक लगाया जाता है। दूसरों को तिलक लगाने के लिए अनामिका एवं अंगुठे का प्रयोग करते हैं। स्वयं के तिलक लगाने के लिए बीच वाली अंगुली का प्रयोग करते हैं तथा पितरों के लिए तर्जनी का उपयोग किया जाता है। तिलक कई आकृतियों में लगाए जाते हैं। वैष्णव, शैव आदि प्रसिद्ध तिलक हैं। लंबा, वृत्ताकार बिंदी आदि के रूप में तिलक लगाया जाता है।

वैष्णव तिलक - यह खड़ा तिलक होता है जो कि वैणव पंथ को मानने वाले लगाते हैं। जो केवल भगवान विष्णु को मानते हैं वे वैष्णव कहलाते हैं। 

शैव तिलक - इसमें तीन आड़ी लकीरें और मध्य में खड़ी रेखा या बिंदी लगाई जाती है यह शैव  पंथ को मानने वाले सनातनी लगाते हैं।

आम सनातनी के लिए आजकल वैष्णव एवं शैव का विभाजन लगभग समाप्त हो गया है। वे भगवान विष्णु एवं शिवजी दोनों को पूजते हैं।

तिलक क्यों लगाते हैं - तिलक मस्तक पर दोनों भोहों के मध्य से होते हुए लगाया जाता है। योग शास्त्र के अनुसार तिलक वाले स्थान के ठीक पीछे आज्ञा चक्र होता है जो कि इड़ा, पिंगला, और सुषुन्मा नाड़ी का संगम स्थल होता है। तिलक में प्रयुक्त रौली, चंदन, सिंदूर आदि का सकारात्मक प्रभाव आज्ञा चक्र पर होता है, यह हमारा चेतना केंद्र भी माना जाता है, इसमें  प्रयुक्त सामग्री से आज्ञा चक्र पर प्रभाव के फलस्वरूप शीतलता, तरावट एवं शांति का अनुभव होता है। चंदन से शीतलता मिलती है, सही रौली हल्दी से बनी होती है, हल्दी में औषधीय गुण होते हैं उसका अपना प्रभाव होता है।


पंचानन शिव के चित्र की व्याख्या interpretation of image of Panchanan Shiv

 पंचानन शिव 


नाम का माहात्म्य: नाम का शाब्दिक अर्थ है पांच मुख वाले शिव। ये पांच मुख शिवजी के प्रथम पांच अवतारों को अभिव्यक्त करते हैं। ये पांच अवतार ब्रह्मा द्वारा  सृष्टि की रचना की आकांक्षा को पूर्ण करने के लिए की गई आराधना पर हुए थे।  एक कल्प में एक अवतार हुआ। इस प्रकार पांच कल्प में पांच अवतार हुए। ये हैं - 1.सद्योजात 2.वामदेव 3. तत्पुरुष 4. अघोर 5. ईशान ।

सद्योजात: यह प्रथम अवतार माना जाता है। यह साक्षात ब्रह्म अवतार था। वे श्वेत वर्ण के थे। इनके चार शिष्य सु नदं, नंदन, विनंद, और विश्वनंद। इस अवतार ने ब्रह्मा को सृष्टिरचना की शक्ति प्रदान की। शिष्यों ने शिवजी के योगशास्त्र को संसार के समक्ष स्पष्ट किया। यह रूप प्राण, उपस्थ, गंध, और पृथ्वी के ईश्वर  हैं।  

वामदेव: यह द्वितीय अवतार है। ये लाल वर्ण के थे। इनके आभूषण , नेत्र आदि सबकुछ लाल था। इनके भी चार शिष्य थे। उनके नाम विरज, विवाह, विशोक, एवं विश्वभान  थे। शिष्यों ने योग की स्थापना की। इन्हें रसना, पायु, रस एवं जल का स्वामी माना जाता है। यह स्वरूप अहंकार का अधिष्ठान है जो कि सदा अनेक प्रकार का कार्य करता रहता है। 

तत्पुरूष: यह तृतीय अवतार है। ये पीत वर्ण के थे। सब कुछ पीला था। उनके भी चार शिष्य थे।(इनके नाम ज्ञात नहीं हो सकें हैं ) वे योगमार्ग के प्रवर्तक हुए। यह स्वरूप त्वक्, पाणि, और स्पर्शगुणविशिष्ट वायु का स्वामी है। यह स्वरूप गुणों के आश्रयरूप तथा भोग्य सर्वज्ञ में अधिष्ठित है।

अघोर: यह चतुर्थ अवतार है। उनका वर्ण एवं अन्य सबकुछ काले थे।उनके भी चार शिष्य कृष्ण, कृष्णशिख, कृष्णास्य, एवं कृष्णकंठधृक् थे। सृष्टि की रचना के लिए इन्होंने घोर नामक योगका प्रचार किया।  इन्हें शरीर, रस, रूप, और अग्नि का स्वामी माना जाता है। यह धर्म के लिए अंगों सहित बुद्धितत्व का विस्तार करके अंदर विराजमान रहता है।

ईशान: यह पंचम अवतार है। उनका रंग स्फटिक के समान उज्वल था। समस्त प्रकार के आभूषण धारण किए हुए थे। उन्होंने भी चार शिशु  उत्पन्न किए उनके नाम थे जटी, मुण्डी, शिखंडी एवं अर्धमुंड। सदधर्मपालन  योग का प्रचार प्रसार किया। इस स्वरूप को कर्ण, वाणी और सर्वव्यापी आकाश  का अधीश्वर माना जाता है। यह साक्षात प्रकृति के भोक्ता क्षेत्रज्ञ में निवास करता है।

(शिवजी के विभिन्न अवतारों के नाम अलग अलग ग्रंथों में अलग अलग मिलते हैं. उनमे एकरूपता नहीं है . )

टिप्पणी: उक्त विवरण पर गहराई से विचार करने पर प्रतीत होता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति  एवं सृष्टि के विकासक्रम को  अवतारों के माध्यम से समझाया गया है। पांच कल्पों का अर्थ करोड़ों वर्ष बाद जीव उत्पन्न हुआ। श्वेत, लाल, पीला, काला एवं उज्वल वर्ण ब्रह्म के विकास क्रम की ओर संकेत करता है।     


मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

त्रिशूल एवं सुदर्शन चक्र की व्याख्या Interpretation of Trishul and Sudarshan Chakra

 त्रिशूल एवं सुदर्शन  चक्र  


त्रिशूल
  

त्रिशूल क्या है?:त्रिशूल का अर्थ है त्रि + शूल , त्रि का अर्थ तीन एवं शूल का अर्थ कांटा होता है। एक लंबी छड़ के एक सिरे पर तीन नुकीले चाकू/ काँटों  जैसी रचना होती है जिसे त्रिशूल कहते हैं। 

माहात्म्य: त्रिशूल का सर्वाधिक प्रयोग भगवान शिव एवं मां दूर्गा के द्वारा होता है। यह नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने के अस्त्र का प्रतीक है। तीन शूल ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के प्रतीक हैं। ये भगवान के तीन स्वरूपों सृजनकर्ता, पालनकर्ता एवं विघटनकर्ता का भी प्रतीक है। यह मनुष्य की विभिन्न व्याधियों के लिए उत्तरदायी व्याप्त तीन कारणों वात, पित्त  एवं कफ को संतुलित रखने का भी प्रतीक है। यह भक्त को आश्वस्त करता है कि निश्चिन्त रहो ईश्वर  तुम्हारी रक्षा कर रहा है। 

सुदर्शन  चक्र 




भगवान विष्णु के हाथ में तर्जनी अंगुली में निरंतर घूर्णन करता एक पहिए जैसा अस्त्र है जिसकी परिधि पर बारह दांतें होतेे हैं। उसके केंद्र को वज्र कहा जाता है।

सुदर्शन चक्र ब्रह्मा द्वारा विष्णु को प्रदान किया गया था। बारह दांतें बारह माह को बताते हैं तथा जिस प्रकार समय निरंतर आगे बढ़ता रहता है तथा वर्ष निरंतर व्यतीत होते रहते हैं वैसे ही चक्र भी घूर्णन करता रहता है और यह समय की निरंतरता का प्रतीक है। ऐसी भी मान्यता है कि इसका निर्माण विश्वकर्मा द्वारा किया गया था। 

सुदर्शन  चक्र से संबद्ध कहानियां: इसके साथ अनेक कथाएं जुड़ी हुई हैं। विष्णुजी द्वारा मगरमच्छ द्वारा पानी में हाथी का पैर पकड़ लेने पर मगरमच्छ  का सिर काटकर हाथी को बचाना, महाभारत में  शिशुपाल द्वारा श्रीकृष्ण के लिए  सौ अपशब्द बोलने पर श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल का वध, समुद्र मंथन के दौरान अमृत छीन कर भाग रहे असुर राहू का मोहिनी रूप धारी विष्णुजी द्वारा सिर काट लेना आदि कई कथाएं सुदर्शन  चक्र से जुड़ी हैं।



  


सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

तुलसी : एक पावन एवं विश्व कल्याणी वनस्पति , Tulasi किसका प्रतीक है? घर में तुलसी विवाह

 तुलसी  एवं घर में तुलसी विवाह 


                                 तुलसी विवाह

अन्य नाम: वृंदा, सुगंधा, अमृता, वैष्णवी, पावनी, विष्णुप्रिया, माधवी

तुलसी के प्रकार: तुलसी के बारह प्रकार हैं।  सामान्यतः मुख्यतः  तीन प्रकार की  है। 1. राम(श्वेत ) तुलसी, इसका तना हरा होता है। 2. श्याम(कृष्ण) तुलसी, इसका तना गहरा बैंगनी होता है तथा पत्ते भी बैंगनी आभा लिए होते हैं। 3. वन तुलसी, यह वन में अपने आप उग आती है।

माहात्म्य: तुलसी की उत्पत्ति की अनेक कथाएं हैं।  

कथा 1 . यह  कथा शिव पुराण में है जो इस प्रकार से है। दानवराज शंखचुड़ ने ब्रह्माजी की  कठोर तपस्या कर वर प्राप्त किया कि वह देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने उसे बदरीवन में तपस्या कर रही तुलसी से विवाह करने हेतु प्रेरित किया। वह वहां पहुंचा और उसने तुलसी से कहा कि वह दनु पुत्र दानव है, वह पूर्वकाल में श्रीकृष्ण का सखा सुदामा था। तुलसी उससे प्रभावित हो गई। ब्रह्मा के कहने पर उसने तुलसी से गंधर्व विवाह कर लिया। शंखचुड़ ने देवताओं को तंग कर दिया। देवताओं ने रुद्र से प्रार्थना की। कई युद्ध किए गए। परंतु शंखचूड बस में नहीं आ रहा था। शंखचूड़ के पास श्रीहरि द्वारा दिया गया  उग्र कवच रहने तक एवं पतिव्रता पत्नी तुलसी का सतीत्व अखण्डित रहने तक  उस  पर वृद्धावस्था एवं मृत्यु अपना प्रभाव नहीं डाल सकती  थी । शिवजी की प्रेरणा से विष्णु ने वृद्ध ब्राह्मण बनकर शंखचूड़ से दान में कवच मांग लिया एवं बाद में शंखचूड़ का छद्मरूप धारण कर तुलसी का शीलहरण कर लिया। तुलसी का सतीत्व एवं कवच के न रहने से  शिवजी के त्रिशूल से उसका वध हुआ। शंखचूड़ की हड्डियों से शंख जाति का प्रादुर्भाव हुआ। शिवजी के वर से वे तुलसी का पौधा हो गई। उन्हें सदा श्रीहरि के साथ रहने का वर मिला। 

 कथा 2  - समुद्र मंथन में अमृतकलश निकला।  इससे देवताओं के परिश्रम के सफल होने से उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली। अश्रु बुँदे जहाँ गिरी वहां तुलसी के पौधे उग आये। 

कथा 3 . राक्षस कुल में असुर कालनेमि पुत्री का नाम वृंदा था। वृंदा के पति का वध भगवान शिव ने किया । वृंदा सती हो गई। वृंदा की राख से तुलसी का पौधा बना। तुलसी भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी। तुलसी को भगवान विष्णु के बराबर होने का वरदान मिला। 

कथा ४.  तुलसी ने  गंगा तट पर तपस्यारत गणेशजी को देखा। वे उनपर मोहित  हो गईं। उन्होंने गणेश जी के समक्ष उनसे विवाह की ईच्छा व्यक्त की। गणेशजी ने ब्रह्मचर्य का कहकर अस्वीकार कर दिया। क्रोध में आकर तुलसी ने गणेशजी को दो विवाह होने का श्राप दे दिया।   

 जिस घर में तुलसी का पौधा होता है वह तीर्थरूप होता हैं। पद्मपुराण में उल्लेख  है कि तुलसी की गंध जहाँ जहाँ जाती है वहां की वायु तत्काल शुद्ध हो जाती है। पद्मोत्तर पुराण के अनुसार जिस घर के द्वार पर तुलसी का बगीचा रहता है वह घर तीर्थ के समान पवित्र हो जाता है। इससे वहां पर यमदूत अर्थात तरह तरह की प्राणघातक व्याधियां नहीं आ सकती। तुलसी का पौधा घर में नकारात्मकता को दूर रख कर सकरात्मक ऊर्जा का संचार करता है।    

पूजन में उपयोग: भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होने से उसे पूजन में विष्णु के स्वरूपों पर अवश्य  चढ़ाया जाता है। तुलसी की मंजरी भी चढ़ाई जाती है। 

भगवान को अर्पित किए  जाने वाले पुष्प, भोग , आभूषणों आदि सभी से  भी बड़ा है तुलसीपत्र। एक कथा है इसकी। श्रीकृष्ण के धर्मपत्नी सत्यभामा ने उनको तराजू के एक पलड़े में बैठाकर दूसरे पलड़े में अपने गहने आदि सब रख दिए  परन्तु जिस पलड़े में कृष्ण बैठे थे वह उठा ही नहीं। तब श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मणी ने गहनों के ऊपर एक तुलसी पत्र रख दिया, तराजू संतुलित हो गई।   

 सभी प्रकार के  तुलसी को घर के आंगन में लगाया जाता है और दैनिकरूप उसमें जल चढ़ाया जाता है एवं दीपक लगाया जाता है। सनातनी  घरों में तुलसी का क्यारा अवश्य  होता है।

तुलसी के औषधीय  उपयोग: एंटीबैक्टीरियल , एंटीफंगल और एंटीवायरल गुण पाए जाते हैं। तुलसी पत्र रोगप्रतिरोधक प्रणाली को प्रबल बनाती है। 

तुलसी में  पंचामृत में तुलसी पत्र भी रखा जाता है। तुलसीदल युक्त जल में संक्रमण से बचाव के गुण होते हैं इसीलिए शुद्ध जल में तुलसी पत्र रखकर वह सुगंधित जल चरणामृत के रूप में मंदिरों में भक्त ग्रहण करते हैं। 

आयुर्वेद में तुलसी को सर्वोत्तम औषधियों में माना जाता है। तुलसी का उपयोग औषधी के रूप में बहुत होता है। त्रिभुवनकीर्ति रस नामक औषधी में तुलसी ही होती है। खांसी के सिरप में भी उपयोग होता  कुष्ठरोग, शक्ति, रतौंधी, जुकाम, नामर्दी, वातरोग, मलेरिया,  हल्का ज्वर, इन्फ्लुएंजा , किडनी की पथरी दूर करने , सिरदर्द, मधुमेह , पेटदर्द ,  पीलिया , आदि में उपयोग होता है।

होमिओपेथिक दवाइयों में भी तुलसी का उपयोग होता है। श्याम तुलसी सौंदर्यवर्धक मानी जाती है। चेहरे की काली झाइयां , मुहांसे दूर करने में भी सहायक है। 

तुलसी विद्युत अवरोधक है: इस मान्यता के कारण ही तुलसी की लकड़ी से बनी माला, मजरा, पायजेब, करधनी पहनने का चलन रहा है।

पर्यावरणीय गुण: तुलसी की गंध किटाणुओं को नासिका में प्रवेश  करने से रोकती है। यह एक प्राकृतिक वायु शोधक पौधा है। यह पौधा दिन और रात दोनों समय ऑक्सीजन बनाता है। कार्बन डाई ऑक्साइड और सल्फर डाई ऑक्साइड जैसी विषाक्त गैसों का अवशोषण कर वातावरण को शुद्ध करता है। यह वायुमें उपस्थित अति सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। 

उक्त समस्त कारणों से ही तुलसी को परम पावन और जगत कल्याणी कहा जाता है। 

तुलसी को न तोड़ना अक्षम्य है: संक्रांति, चतुर्दशी , द्वादशी , पातपर्वों, शुक्रवार, मंगलवार, अपरान्हकाल, सूर्य एवं चंद्रग्रहण, जननाशौच(सूतक ), मरणाशौच(मारक /सूतक ) के दिनों में तुलसी का तोड़ना वर्जित है।

तुलसी के व्रत-अनुष्ठान: तुलसी विवाह - भगवान के श्रीविग्रह शालग्राम के साथ तुलसी का विधिवत विवाह कराया जाता है। वैसे तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक कभी भी शुभ मुहूर्त में किया जा सकता है ,  लेकिन अधिकाशं भक्त इसे देवउठनी एकादशी को करते हैं। कई लोग तुलसी विवाह अपनी पुत्री के विवाह के समान भव्यता के साथ करते हैं।  बड़े भौज तक आयोजित करते हैं। घर में तुलसी विवाह की संक्षेप में विधि आगे दी जा रही है।  तुलसी विवाह का पर्व गहरी आस्था , प्रेम ,  त्याग ,  प्रकृति के प्रति गहरी निष्ठां, आदर , एवं श्रद्धा का प्रतीक है। 

तुलसीवास - कार्तिक शुक्ल पक्ष में नवमी को यह वास किया जाता है।

लक्षतुलसीदलार्पण व्रत - कार्तिक या माघ मास में तुलसीदल से प्रारंभ कर माघ या वैशाख में उद्यापन किया जाता है। कुल सौ दिवस में प्रत्येक दिन विष्णुसहस्रनाम के साथ एक एक पत्र अर्पित कर कुल एक लाख तुलसीदल अर्पित किए जाते हैं।

श्राद्ध - ऐसी मान्यता है कि तुलसी वन में श्राद्ध करने से पितरों को शांति तथा तृप्ति प्राप्त होती है। 

घर में तुलसी विवाह की विधि संक्षेप में 

पूजन सामग्री : शालिग्राम या विष्णु या कृष्ण की मूर्ति , तुलसी का पौधा , नारियल , कपूर , धूप , अगरबत्ती ,चन्दन , सुहाग की सामग्री (चूड़ी, सिंदू , मेहंदी , बिंदी, काजल  आदि ) 

विवाह विधि :तुलसी विवाह में तुलसी का विवाह शालिग्राम या विष्णुजी के अवतार श्रीकृष्ण के साथ सामान्यतः शायंकाल शुभघड़ी  में किया जाता है। कन्यादान करने वाले घर वालों को नए वस्त्र पहनकर उस दिन उपवास रखना चाहिए। कन्यादान के बाद उपवास खोल सकते हैं। तुलसी के गमले को आँगन में रखकर उसमें एक गन्ना गाढ़कर उसपर चुनरी औढ़ाकर मंडप का रूप दे दें। गमले में श्रीविग्रह शालिग्राम को विराजित करें हुए उनपर एवं  तुलसी पर हल्दी चढ़ाएं( हल्दी की रस्म ) . तुलसी के पौधे पर लाल वस्त्र या चुनरी ओढ़ाएं। सुहाग की सामग्री अर्पित करें।  फलफूल चढ़ाएं। कन्यादान करने वाला पुरुष शालिग्रामजी  को दोनों हाथ में श्रद्धापूर्वक उठाकर तुलसी के पौधे की क्लॉकवाइज दिशा में सात परिक्रमा लगाएं (फेरों की रस्म )  फेरों की अवधि  में परिवार के सदस्य सिंदूरी रंग में रंगे  हुए अक्षत (पूर्ण चावल )   शालिग्राम  एवं तुलसाजी पर चढ़ाते जाएं। अब माता तुलसी और शालिग्राम प्रभु की कर्पूर प्रज्वलित कर आरती करें । जयकारें लगाएं। भोग लगाएं । प्रसाद वितरण करें।

अंत में एक टिप्पणी : जबतक तुलसी पवित्र  थी अर्थात उसका ध्यान रखा जा रहा था एवं उसका औषधीय उपयोग हो रहा था तब तक तीनों व्याधियां शंखचूड़ से दूर थीं।  त्रिशूल स्वरुप तीनों व्याधियों ने उसे समाप्त कर दिया क्योंकि औषधि नहीं रही थी।   



शंख Shankh , The Conch shell

 शंख 


माहात्म्य: सनातन धर्म में शंख को अत्यंत शुभ माना जाता है। शालग्राम एवं तुलसी के संदर्भ में शंखचूड़ का उल्लैख आया है । उसी शंखचूड़ की अस्थियों को शंख के रूप में विकसित होने का वरदान मिला था। राधिका के श्राप से सुदामा ने ही शंखचूड़ के रूप में जन्म लिया था। 

शंख की उत्पत्ति  क्रम संक्षेप में: दंभ नामक दानव के शंखचूड़ नामक पुत्र हुआ। शंखचूड़ ने देवताओं कोे पराजित किया, देवताओं ने शिवजी से विनती की, शिवजी के साथ शंखचूड़ का युद्ध होता है,  शंखचूड़ के  वध के लिए उसकी पत्नी तुलसी का शील भंग होना तथा उसका कृष्ण कवच का उतरना आवश्यक  था। ब्राह्मण रूप धर कर विष्णुजी ने शंखचूड़ का कवच उतरवा लिया, विष्णुजी द्वारा शंखचूड़ का भेष  धरकर तुलसी का शील भंग किया गया। कवच विहीन एवं पत्नी के सतीत्व के भंग होने पर कमजोर हो गए शंखचूड़ को  शिवजी ने त्रिशूल से  जलाकर भस्म कर दिया, उसकी अस्थियों से ही बने शंख, जो कि विष्णुजी को अत्यंत प्रिय हैं।

शंख: सनातन धर्म में यह एक अत्यंत पवित्र और शुभ फल देने वाला माना जाता है। शंख भगवान विष्णु द्वारा अपने चार हाथों में धारण किए  जाने वाले चार आयुध शंख , चक्र ,  गदा ,  और पद्म में से एक है।   भगवान विष्णु  इसे दाहिने हाथ में धारण करते हैं। इसे धर्म और विजय का प्रतीक माना जाता है। यह सृष्टि की आदि ध्वनि और जल तत्व का प्रतिक भी माना जाता है।  

शंख जल: शंख द्वारा चढ़ाया गया जल शंकर के अलावा सभी देवताओं के लिए प्रशस्त माना गया है। विष्णुजी एवं लक्ष्मीजी को यह जल अत्यंत प्रिय है। यह जल शंकरजी को नहीं चढ़ाया जाता है।

शंखनाद: शंख को फूंक मारकर बजाने से उत्पन्न ध्वनि को शंखनाद कहते हैं। शंखनाद सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है तथा नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। यह मन को एकाग्र करने एवं साधना में सहायता करता है। आरती के दौरान यह ईश्वर  से आध्यात्मिक रूप से जुड़ने में सहायक होता है। यह बूरे लोगों चेतावनी देने एवं भक्तों को उनकी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त  करने के लिए भी शंखनाद किया जाता है।

पांचजन्य: श्रीकृष्ण शंख को पांचजन्य शंख कहा जाता है। श्रीकृष्ण इसे महाभारत युद्ध में बजाते थे।  संदीपन ऋषि ने श्रीकृष्ण से  गुरु दक्षिणा में समुद्र में डूबे अपने पुत्र को लाने के लिए कहा। समुद्र में शंखासुर को मारकर ऋषि के पुत्र को लाया गया। पांचजन्य शंखासुर के वध के उपरांत उसके खोल से प्राप्त हुआ था। इसकी ध्वनि अत्यंत शक्तिशाली थी। यह ध्वनि सैंकड़ों सिंहों की दहाड़ के समान शक्तिशाली  मानी जाती थी।  यह शक्तिशाली  ध्वनि पांडवों में उत्साह और कौरवों में भय उत्पन्न करती थी। यह शंख  विजय और धर्म की स्थापना का प्रतीक  है। 

शंख का औषधीय उपयोग: शंख भस्म पाचन क्रिया को अच्छा बनाने, गैस और एसिडिटी को शांत करने में काम आती है। चूंकि इसमें कैल्शियम  होता है अतः यह अस्थियों को मजबूत करने के लिए इस भस्म का प्रयोग  किया जाता  है।   

                           




शालग्राम Shalgram क्या हैं , ये किसके प्रतीक हैं What is Shalgram, whose symbol is Shalgram

 

शालग्राम 


शालग्राम 

अन्य नाम - लक्ष्मीनारायण आदि विष्णु के नाम

माहात्म्य: शंखचूड़ की पतिव्रता स़्त्री तुलसी का श्रीविष्णु ने छद्म रूप धारण कर शील हरण किया। तुलसी को पता लग गया और उन्होंने  क्रुद्ध होकर विष्णु को श्राप दिया कि चूँकि  तुम पाषाण-सदृश्य  कठोर, दयारहित और दुष्ट हो, अतः अब तुम पाषाण रूप हो जाओ। वह विलाप करने लगी। इतने में भगवान शिव वहां पहुंचे और तुलसी से कहा कि जिस मनोरथ को लेकर तुमने तपस्या की थी यह घटना उसीका फल है। तुम अपना यह शरीर त्याग कर लक्ष्मी का दिव्य रूप धारण कर भगवान विष्णु के साथ बैकुंठ में विहार करो। तुम्हारे द्वारा त्यागा गया शरीर पुण्यरूपा गंडकी नदी के नाम से प्रसिद्ध होगा। तुम्हारे शापवश  श्रीहरि पाषाण बनकर गंडकी नदी के किनारे स्थित रहेंगे। उस पाषाण को कीड़े काटकर टुकड़े करेंगे जिससे उसमें चक्र बन जाएंगे। वे शालग्राम कहलाएंगे। वह अत्यंत पुण्य प्रदान करने वाले होंगे।

शालग्राम, शंख एवं तुलसी का साथ: पूजन के अंतर्गत शालग्राम पर तुलसीपत्र चढ़ाया जाता है। शिवजी ने बताया कि शालग्रामरूपी विष्णु एवं तुलसीरूपी लक्ष्मी का साथ बहुत पुण्यों को प्रदान करने वाला होगा। जो शालग्राम से तुलसी पत्र को पृथक करेगा उसे जन्मांतर में स्त्री वियोग का दुख उठाना होगा। इसी प्रकार शंख से तुलसी को पृथक करने वाला भी पत्नी विहिन होकर सात जन्मों तक रोगी बना रहेगा। जोे शालग्राम, तुलसी एवं शंख को एक रखकर उनकी रक्षा करेगा वह श्रीहरि को प्यारा होगा। 


स्वस्तिक की व्याख्या Interpretation of Symbol Swastik

 


स्वस्तिक 

माहात्म्य: स्वस्तिक अत्यंत पवित्र एवं पावन प्रतीक है। स्वस्तिक सौभाग्य, कल्याण, मंगल, शुभता, शांति, निरंतरता, गणेशजी एवं ब्रह्मांड का प्रतीक है। यह ब्रह्मांडीय स्थिति को दर्शाता  है। यह हिंदु, बौद्ध एवं जैन धर्मों में पावन प्रतीक के रूप में पुजनीय है। यह सिंधु घाटी सभ्यता में भी प्रचलित था। यह संपूर्ण विश्व  में किसी न किसी रूप में प्रचलित है। प्राचीन युरोप में भी इसको मान्यता प्राप्त थी। पूजन में इसका अत्यधिक महत्व है। किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व स्वस्तिक का चित्रांकन किया जाता है।

स्वस्तिक का अर्थ: यह एक संस्कृत शब्द है। यह सु + अस्ति, जिसका अर्थ है शुभ या कल्याण।

स्वस्तिक का प्रतीकात्मक अर्थ: स्वस्तिक को भगवान विष्णु, सूर्य, सृष्टि चक्र, ध्रुव तारें के चारों ओर भ्रमण करते सप्तऋषि मंडल की चार अवस्थाओं और संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है। चूंकि किसी भी शुभ कार्य का प्रारंभ गणेश  पूजन से होता है इसलिए कुछ विद्वान इसे गणेशजी से जोड़ते हैं। 

एक अर्थ और बताया जाता है, इसके केंद्र को ब्रह्म और उससे चार लंबवत रेखाओं को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक माना जाता है।

स्वस्तिक का प्रयोग: इसको किसी भी शुभ कार्य जैसे गृह प्रवेश , विवाह, तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को प्रारंभ करने से पूर्व रोली आदि से चित्रित किया जाता है।

स्वस्तिक एवं सप्तऋषि मंडल: सप्तऋषि मंडल उत्तर  दिशा  में स्थित ध्रुव  तारे के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। यह अलग अलग समय की चार स्थितियों को दर्शाता  है। चार भिन्न स्थितियों से जो आकृति बनती है वह स्वस्तिक की होती है। ध्रुव तारा स्थिर है जो स्थिरता का प्रतीक है और उसके चारों ओर सप्तऋषि मंडल चक्कर लगाता है जो कि गतिशीलता का प्रतीक है, इस प्रकार स्वस्तिक ब्रह्मांड की स्थिरता एवं गतिशीलता दोनों का प्रतीक है।



राधा कृष्ण का चित्र की व्याख्या Interpretation of Image of Radha Krishn

 


 राधा कृष्ण  

नाम का माहात्म्य: महाभारत के प्रमुख पात्र एवं श्रीमद्भागवदगीता  के उपदेशक  श्रीकृष्ण का नाम सदैव राधा के साथ लिया जाता है। यह सर्वाधिक चर्चित एवं प्रसिद्ध प्रेमी युगल नाम है तथा इन पर ही सबसे अधिक भजन आदि बने हैं। वस्तुतः इस युगल का आत्यधिक गूढ़ रहस्य है। 

प्रस्तुत की जाने वाली छवि: सामान्यतः चित्र में श्रीकृष्ण एवं राधाजी को एक दूसरे के साथ प्रणय मुद्रा में दिखाया जाता है। श्रीकृष्ण को आसमानी रंग में एवं राधाजी को गौरे रंग में दिखाया जाता है। श्रीकृष्ण के हाथ में मुरली होती है और राधाजी मुग्ध मुद्रा में उनके साथ खड़ी दिखाई देती हैं।  श्रीकृष्ण के सिर पर मोर पंख युक्त मुकुट होता है। वे अक्सर पीली धोती में ही होते हैं। उनके पीछे गाय होती। एक मयुर भी होता है। 

श्रीकृष्ण: श्रीकृष्ण सत्-चित-आनंद के प्रतीक हैं । उन्हें सच्चिदानंद कहा जाता है। वे आनंद, परमानंद, पूर्णता, श्रेष्ठता के अवतार हैं। वे भगवान विष्णु (पीतांबरधारी) के मनुष्य अवतार हैं। 

श्रीकृष्ण का नीला रंग: नीला रंग अर्थात आकाश  एवं अनंत विस्तार। सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ हैं। वे प्रत्येक जीव में हैं, वे किसी एक शरीर, मस्तिष्क या बुद्धि या पदार्थ के साथ बंधे हुए नहीं हैं। श्रीकृष्ण एक ग्वाले (गायों के झुंड का नियंत्रक) के रूप में प्रतीक हैं इंद्रियों या संवेगों (गायों का झुंड प्रतीक है समस्त इंद्रियों का ) के पूर्ण नियंत्रक होने के।

राधाजी: वे प्रतीक हैं ईश्वर  के प्रति तीव्र, निरपेक्ष प्रेम, प्यास, मन की गहराई से चाह की। वे प्रतीक हैं भौतिक जगत के सभी क्रियाकलापों में संलग्न रहते हुए निरंतर मन से ईश्वर  को स्मरण करते हुए उसमें रम जाने की। 

मुरली: मुरली शरीर है जो अंतःमन से हो या बाह्य रूप में हो, वह आत्मा के गीत एवं अद्भूत संगीत को सृजित करता है। आत्मा का यह संगीत जीवंत हो उठता है जब श्रीकृष्ण अर्थात ईश्वर स्वयं मुरली के छिद्रों पर अंगुुलिया चलाता है।  

गाय: गाय मां के रूप में प्रदान की गई सेवा का प्रतीक है। वह पंच गव्य प्रदान करती है। वह दूध, दही, मक्खन, गौमुत्र (औषधी) एवं गोबर (खाद) आदि प्रदान करती है। दूध से मिठाई आदि कई अन्य खाद्य सामग्री प्राप्त होती है। 

मयुर एवं मोर पंख: मोर एवं मयुर पंख प्राकृतिक सौंदर्य में आनंद से जीवनयापन करने का द्योतक है। यह प्रतीक है कि हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हुए आनंद से जीवननिर्वाह करना चाहिए।

राधाजी एवं श्रीकृष्ण की प्रणय लीला: यह प्रतीक हैं एक भक्त (राधाजी) का जो कि ईश्वर (आत्मा) के प्रति पूर्ण समर्पित प्रेम के साथ स्वयं की इच्छाओं का दमन कर देता है। यह प्रणय लीला नश्वर प्रकृति (राधाजी) एवं अविनाशी  ईश्वर (आत्मा) की पारस्परिक क्रीड़ा का प्रतीक है।   


interpretation of Ram Darbar image राम दरबार चित्र की व्याख्या , राम ,सीता , लक्ष्मण , हनुमान का चित्र

  राम दरबार 

नाम का माहात्म्य: रामायण के प्रमुख चार चरित्र हैं जिन्हें राम दरबार के चित्र में दर्शाया  जाता है। इस चित्र को राम दरबार कहा जाता है।

प्रस्तुत की जाने वाली छवि: सामान्यतः चित्र में श्रीराम, सीताजी, लक्ष्मणजी एवं हनुमान जी को मुख्य रूप से दर्शाया जाता है। श्रीराम को नीले रंग, एवं अन्य को गौरवर्ण में दिखाया जाता है। रामजी की धोती पीले रंग की (पीतांबरधारी श्री विष्णु के अवतार होने का प्रतीक) और सीताजी  लाल साड़ी (लक्ष्मी का अवतार होने का प्रतीक) में होती हैं। रामजी एवं लक्ष्मणजी के हाथ में धनुष होते हैं। उनकी पीठ पर तरकश  होते है। सभी खड़ी हुई सौम्य एवं प्रसन्न मुद्रा में होते हैं। हनुमान जी को श्री राम के चरणों में हाथ जोड़ कर विनम्र मुद्रा में बैठा हुआ दर्शाया जाता है। इनकी इस मुद्रा का नाम हनुमान बैठक पड़ा।

आसन: सिंहासन, प्रतीक है शासक का। 

श्रीराम: वे आत्मा के प्रतीक हैं। धनुष एवं तीर प्रतीक हैं, यौद्धा होने के तथा सदैव क्रियाशील रहने की तत्परता के। सदा वर्तमान में हैं परंतु निर्लिप्त हैं। वे एक आदर्श  मनुष्य की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं, एक ऐसे पुत्र जो आज्ञाकारी है, स्नेह का प्रतीक भाई हैं, प्रतिबद्धता के प्रतीक पति हैं, विश्वसनीय सहयोगी के प्रतीक मित्र हैं, गुरु के प्रति समर्पित अनुशासित हैं, और एक राजा की तरह निष्पक्षता, करुणा एवं दृढता़ के प्रतीक हैं।

श्रीराम का नीला रंग: नीला रंग अर्थात आकाश  एवं अनंत विस्तार। वैसे वह उनके श्याम रंग का द्योतक है।

सीताजी: ऐसी बुद्धि जो कि राम अर्थात आत्मा के प्रति समर्पित हैं जिसकी अपनी कोई  इच्छाएं  नहीं हैं।

लक्ष्मणजी: वे ऐसे शरीर का प्रतीक हैं जो कि स्वस्थ एवं सुदृढ है और कार्य करने के लिए सदैव तत्पर रहता है।

हनुमानजी: वे मस्तिष्क का प्रतीक हैं। ऐसा मस्तिष्क जो कि शांत है, संतुलित है, निःस्वार्थी एवं पवित्र है। पूर्णतः प्रशिक्षित, अनुशासनबद्ध, विनम्र एवं अंहकारमुक्त हैं। उनकी बैठने की मुद्रा तत्काल क्रिया करने के लिए तत्परता को दर्शाती  हैै। 

राम दरबार: उक्त सभी को अगर समग्रता से देखें तो राम दरबार प्रतीक है स्वयं की सच्चे व्यक्तित्व का, आत्मा का, स्थिर जागरूकता का, आत्मा को स्मृति में बनाए रखना ही जीवन का लक्ष्य और प्रयोजन होना चाहिए।


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सनातन धर्म के पवित्र प्रतीक

सनातन धर्म सृष्टि के प्रारंभ से प्रचलित धर्म है। इस धर्म का न आदि है और न ही अंत। यह धर्म कुछ शाश्वत  मूल्यों पर आधारित है। उन मूल्यों पर चलने वाला सनातनी होता है। आजकल इसे मुख्यतः हिंदुओं से जोड़ा जाता है परंतु इसके प्रमुख मूल्य भारत भूमि से निकले सभी धर्मों यथा जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि में भी होते हैं। सनातन धर्म के भगवानों, देवी-देवताओं के चित्र या मुर्तियां होती हैं। ये चित्र या मुर्तियां वस्तुतः उनके प्रतीक हैं जो उनके लक्षणों पर आधारित होते हैं। इसी प्रकार से अनेक अन्य वस्तुएं हैं जो कि पवित्र चिह्नों/प्रतीकों के रूप में मानी जाती है।

हम जानते हैं कि प्रत्येक नाम अपने आप में एक प्रतीक है। सभी प्रतीक किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, विचार आदि से संबद्ध होते हैं। किसी भाषा के संकेत उस भाषा का जानकार समझता है। अतः प्रतीक भाषा एवं संस्कृति आधारित होते हैं। प्रतीक व्यक्ति विषेष के लिए देष, काल एवं परिस्थिति के अनुसार अर्थ रखते हैं। उदाहरण के लिए गाय सनातनियों के लिए पवित्र तथा अवध्य है तो अन्यों के लिए वह बीफ का स्रोत है। प्रत्येक संकेत कहां स्थापित है वह उस स्थान का द्योतक होता है। जैसे अगर क्राॅस किसी भवन पर लगा है तो वह चर्च है जबकि जमीन पर लगा क्राॅस कब्र को बताता है। 

सनातन एवं उनके शास्त्रों में बार बार इसी बात पर बल दिया गया है कि आप सभी ईश्वर  की दृष्टि में समान हैं। सनातन में सभी प्रकार की धार्मिक क्रियाएं यथा हवन, पूजा, आराधना, प्रार्थना, ध्यान, योग, मंत्र, वेदांत, सामाजिक कार्य, आदि मानव मात्र की सहायता एवं भलाई के लिए रखी गईं हैं भले ही आप किसी भी भगवान को माने या न माने।

भगवान के प्रतीकों का अर्थ है कि धार्मिक प्रतीकों जिन्हें की देवताओं की आराधना हेतु प्रयुक्त किया जाता है उनकी व्याख्या करना एवं उन्हें समझकर स्वयं के जीवन में अपनाना। सनातन में एक सर्वोच्च सत्ता  ईश्वर  की कई स्वरूपों में आराधना की जाती है। ये स्वरूप ईश्वर  की विभिन्न शक्तियों, लक्षणों, गुणों आदि पर आधारित होते हैं। उनके रंग-रूप, वस्त्राभूषण, उनकी सिरों की संख्या, उनकी भुजाओं की संख्या, उनके हाथों में ली हुई वस्तुएं, उनके वाहन, उनके आसन, उनके आसपास का वातावरण आदि को अच्छी प्रकार से समझने पर ही हम अपनी छूपी हुई षताओं विशेषताओं , क्षमताओं, को पहचानकर एवं अपनी आत्मा को समझकर, उनके साथ जुड़कर अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं। अपने आप पर उपयुक्त नियंत्रण प्राप्त कर, प्रशिक्षित कर, एवं प्राण, मस्तिष्क, शरीर, एवं बुद्धि से संबंधित अभ्यास कर हम अपने आप को पा लेते है।

मंदिरों आदि में प्रतिष्ठित मुर्तियों एवं उकेरे गए चित्रों की कई प्रकार से व्याख्या की जा सकती है। व्याख्या  व्यक्ति विशेष  की उसमें आस्था, श्रद्धा, विश्वास , धार्मिक परंपरा, एवं मानसिक सोच पर निर्भर करती है। विभिन्न मान्यताओं एवं संप्रदायों वाले व्यक्ति विभिन्न अर्थ निकालते हैं। दो प्रकार की व्याख्याएं हो सकती हैं एक तो सामान्य या पारंपरिक व्याख्या तथा दूसरी अधिक गहन आध्यात्मिक व्याख्या। उनमें से वो व्याख्या व्यक्ति के लिए अधिक उपयुक्त है जो कि स्वयं को आध्यात्मिक प्रगति में सहायक प्रदान करती है तथा एक श्रेष्ठ मानव बनाती है।

व्यक्ति मुर्तियों, चित्रों, की आराधना नहीं करता है, अपितु इनका उपयोग अपने मस्तिष्क की क्षमता को नकारात्मक गुणवत्ता   एवं आदतों पर विजय प्राप्त कर उच्च स्तरीय श्रेष्ठ गुणवत्ता  को अपने में सृजित करता है।

सनातन के पवित्र प्रतीक शीर्षक से प्रस्तुत की जा रही इस शृंखला में भी देवताओं एवं वस्तुओं से संबंधित प्रतीकों की व्याख्या करने का प्रयास किया जा रहा है। व्याख्या हेतु कई धार्मिक ग्रंथों  एवं अन्य स्रोतों के साथ ही स्वयं की समझ का भी उपयोग किया गया है। जैसा कि ऊपर उल्लैख किया गया है व्याख्या से सहमत होना या न होना व्यक्ति की पृष्ठभूमि, बौद्धिक क्षमता, मस्तिष्क के खुलेपन, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि पर निर्भर करता है। मैं विज्ञान का विद्द्यार्थी रहा हूँ,  ईश्वर में भी मेरी पूरी आस्था है परन्तु अंधविश्वासों से दूर रहने का या उनकी  वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्याख्या करने का प्रयास करता हूँ।  अतः कई प्रस्तुत  व्याख्या से सहमत या असहमत हो सकते हैं, व्याख्या में कमी होना स्वाभाविक है, भाषागत त्रुटियां अवश्यसंभावी है , उसकी आलोचना भी कर सकते हैं। अपनी अभिव्यक्ति करने के लिए सभी स्वतंत्र हैं। फिर भी कई जिज्ञासुओं की ज्ञान पिपासा को शांत करने के दृष्टिकोण से इस शृंखला के माध्यम  से एक साथ एक जगह यह जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है और आशा  है कइयों  को इससे लाभ प्राप्त होगा।

धन्यवाद्  

निवेदक प्रस्तुतकर्ता : दुष्यन्त अग्रवाल 

                           


ब्रह्माजी की छवि की व्याख्या Interpretation of symbolic image Of Brahma

 


ब्रह्माजी

ब्रह्माजी के अन्य नाम: प्रजापति, हिरण्यगर्भ, स्वयंभू, विधाता, चतुरानन

ब्रह्माजी की छवि: सामान्यतः ब्रह्माजी को कमल पर बैठी हुई चार सिर एवं चार हाथ वाली  अवस्था में दर्शाया  जाता है। एक सिर पीछे की ओर होता है जो चित्र में दिखाई नहीं देता है।

चार सिर: चार सिर चार वेदों के प्रतीक माने जाते हैं। वे चार दिशाओं को भी अभिव्यक्त करते हैं।

चार हाथ: ऐसी मान्यता है कि चार हाथ मानव स्वभाव के चार पहलुओं को दर्शाते  हैं - मन, बुद्वि, अहंकार, और चेतना।

कमलासन: जिस प्रकार कमल प्रस्फुटित होता है उसी प्रकार ब्रह्म का विकास भी हुआ है। भगवान विष्णु की नाभि से कमल पर विराजित ब्रह्मा प्रकट होते हैं। अर्थात कोई केंद्रीय तत्व ऐसा है जिससे समस्त सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ है। कमल नाल को गर्भ नाल के प्रतीक के रूप में मानते हुए उसके माध्यम से शिशु  को मां से जोड़ने का प्रतीक भी माना जाता है।

श्वेत हंस रूपी वाहन: हंस का श्वेत रंग निश्चलता  का प्रतीक है। श्वेत  हंस निश्चल  एवं पवित्र भाव से लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गतिमान होने का प्रतीक है।

एक हाथ में कमल: कमल सृष्टि के निर्माण का द्योतक है। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता हैं। कमल प्रकृति एवं जीवन का द्योतक भी है।

एक हाथ में पुस्तक: वेदों की प्रतीक पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है यह इस बात को दर्शाती  है कि ब्रह्माजी अथाह ज्ञान के स्रोत हैं।

एक हाथ में कमंडल: उनके एक हाथ में कमंडल का होना जोगी होने का द्योतक है। स्वयं सृष्टि के रचयिता हैं परंतु स्वयं के पास कुछ नहीं है। कमंडल में जल इस बात को बताता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना जल से हुई है।

एक हाथ में माला: ऐसा माना जाता है कि माला समय की गणना को बताती है। 

श्वेत लंबी दाढ़ी: श्वेत दाढ़ी जीवन में अर्जित दीर्घ एवं व्यापक अनुभव को दर्शाती  है। यह तपस्वी ऋषि के समान दीर्घ अनुभव का द्योतक है। यह जीवन में अनुभव से अर्जित असीमित ज्ञान का प्रतीक है। अर्थात भगवान ब्रह्माजी असीमित ज्ञान के भंडार हैं।