सनातन धर्म के पवित्र प्रतीक
सनातन धर्म सृष्टि के प्रारंभ से प्रचलित धर्म है। इस धर्म का न आदि है और न ही अंत। यह धर्म कुछ शास्वत मूल्यों पर आधारित है। उन मूल्यों पर चलने वाला सनातनी होता है। आजकल इसे मुख्यतः हिंदुओं से जोड़ा जाता है परंतु इसके प्रमुख मूल्य भारत भूमि से निकले सभी धर्मों यथा जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि में भी होते हैं। सनातन धर्म के भगवानों, देवी-देवताओं के चित्र या मुर्तियां होती हैं। ये चित्र या मुर्तियां वस्तुतः उनके प्रतीक हैं जो उनके लक्षणों पर आधारित होते हैं। इसी प्रकार से अनेक अन्य वस्तुएं हैं जो कि पवित्र चिह्नों/प्रतीकों के रूप में मानी जाती है।
हम जानते हैं कि प्रत्येक नाम अपने आप में एक प्रतीक है। सभी प्रतीक किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, विचार आदि से संबद्ध होते हैं। किसी भाषा के संकेत उस भाषा का जानकार समझता है। अतः प्रतीक भाषा एवं संस्कृति आधारित होते हैं। प्रतीक व्यक्ति विशेष के लिए देश , काल एवं परिस्थिति के अनुसार अर्थ रखते हैं। उदाहरण के लिए गाय सनातनियों के लिए पवित्र तथा अवध्य है तो अन्यों के लिए वह बीफ का स्रोत है। प्रत्येक संकेत कहां स्थापित है वह उस स्थान का द्योतक होता है। जैसे अगर क्रॉस किसी भवन पर लगा है तो वह चर्च है जबकि जमीन पर लगा क्रॉस कब्र को बताता है।
सनातन एवं उनके शास्त्रों में बार बार इसी बात पर बल दिया गया है कि आप सभी ईश्वर की दृष्टि में समान हैं। सनातन में सभी प्रकार की धार्मिक क्रियाएं यथा हवन, पूजा, आराधना, प्रार्थना, ध्यान, योग, मंत्र, वेदांत, सामाजिक कार्य, आदि मानव मात्र की सहायता एवं भलाई के लिए रखी गईं हैं भले ही आप किसी भी भगवान को माने या न माने।
भगवान के प्रतीकों का अर्थ है कि धार्मिक प्रतीकों जिन्हें की देवताओं की आराधना हेतु प्रयुक्त किया जाता है उनकी व्याख्या करना एवं उन्हें समझकर स्वयं के जीवन में अपनाना। सनातन में एक सर्वोच्च सत्ता ईश्वर की कई स्वरूपों में आराधना की जाती है। ये स्वरूप ईश्वर की विभिन्न शक्तियों, लक्षणों, गुणों आदि पर आधारित होते हैं। उनके रंग-रूप, वस्त्राभूषण, उनकी सिरों की संख्या, उनकी भुजाओं की संख्या, उनके हाथों में ली हुई वस्तुएं, उनके वाहन, उनके आसन, उनके आसपास का वातावरण आदि को अच्छी प्रकार से समझने पर ही हम अपनी छूपी हुई विशे षताओं , क्षमताओं, को पहचानकर एवं अपनी आत्मा को समझकर, उनके साथ जुड़कर अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं। अपने आप पर उपयुक्त नियंत्रण प्राप्त कर, प्रशिक्षित कर, एवं प्राण, मस्तिष्क, शरीर, एवं बुद्धि से संबंधित अभ्यास कर हम अपने आप को पा लेते है।
मंदिरों आदि में प्रतिष्ठित मुर्तियों एवं उकेरे गए चित्रों की कई प्रकार से व्याख्या की जा सकती है। व्याख्या व्यक्ति विशेष की उसमें आस्था, श्रद्धा, विश्वास , धार्मिक परंपरा, एवं मानसिक सोच पर निर्भर करती है। विभिन्न मान्यताओं एवं संप्रदायों वाले व्यक्ति विभिन्न अर्थ निकालते हैं। दो प्रकार की व्याख्याएं हो सकती हैं एक तो सामान्य या पारंपरिक व्याख्या तथा दूसरी अधिक गहन आध्यात्मिक व्याख्या। उनमें से वो व्याख्या व्यक्ति के लिए अधिक उपयुक्त है जो कि स्वयं को आध्यात्मिक प्रगति में सहायक प्रदान करती है तथा एक श्रेष्ठ मानव बनाती है।
व्यक्ति मुर्तियों, चित्रों, की आराधना नहीं करता है, अपितु इनका उपयोग अपने मस्तिष्क की क्षमता को नकारात्मक गुणवत्ता एवं आदतों पर विजय प्राप्त कर उच्च स्तरीय श्रेष्ठ गुणवत्ता को अपने में सृजित करता है।
सनातन के पवित्र प्रतीक शीर्षक से प्रस्तुत की जा रही इस शृंखला में भी देवताओं एवं वस्तुओं से संबंधित प्रतीकों की व्याख्या करने का प्रयास किया जा रहा है। व्याख्या हेतु कई धार्मिक ग्रंथों एवं अन्य स्रोतों के साथ ही स्वयं की समझ का भी उपयोग किया गया है। जैसा कि ऊपर उल्लैख किया गया है व्याख्या से सहमत होना या न होना व्यक्ति की पृष्ठभूमि, बौद्धिक क्षमता, मस्तिष्क के खुलेपन, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि पर निर्भर करता है। अतः कई उस व्याख्या से सहमत या असहमत हो सकते हैं, व्याख्या में कमी होना स्वाभाविक है, उसकी आलोचना भी कर सकते हैं। अभिव्यक्ति करने के लिए सभी स्वतंत्र हैं। फिर भी कई जिज्ञासुओं की ज्ञान पिपासा को शांत करने के दृष्टिकोण से एक साथ एक जगह यह जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है और आशा है कईयों को इससे लाभ प्राप्त होगा।
प्रस्तुतकर्ता: दुष्यन्त अग्रवाल
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