स्वस्तिक
माहात्म्य: स्वस्तिक अत्यंत पवित्र एवं पावन प्रतीक है। स्वस्तिक सौभाग्य, कल्याण, मंगल, शुभता, शांति, निरंतरता, गणेशजी एवं ब्रह्मांड का प्रतीक है। यह ब्रह्मांडीय स्थिति को दर्शाता है। यह हिंदु, बौद्ध एवं जैन धर्मों में पावन प्रतीक के रूप में पुजनीय है। यह सिंधु घाटी सभ्यता में भी प्रचलित था। यह संपूर्ण विश्व में किसी न किसी रूप में प्रचलित है। प्राचीन युरोप में भी इसको मान्यता प्राप्त थी। पूजन में इसका अत्यधिक महत्व है। किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व स्वस्तिक का चित्रांकन किया जाता है।
स्वस्तिक का अर्थ: यह एक संस्कृत शब्द है। यह सु + अस्ति, जिसका अर्थ है शुभ या कल्याण।
स्वस्तिक का प्रतीकात्मक अर्थ: स्वस्तिक को भगवान विष्णु, सूर्य, सृष्टि चक्र, ध्रुव तारें के चारों ओर भ्रमण करते सप्तऋषि मंडल की चार अवस्थाओं और संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है। चूंकि किसी भी शुभ कार्य का प्रारंभ गणेश पूजन से होता है इसलिए कुछ विद्वान इसे गणेशजी से जोड़ते हैं।
एक अर्थ और बताया जाता है, इसके केंद्र को ब्रह्म और उससे चार लंबवत रेखाओं को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक माना जाता है।
स्वस्तिक का प्रयोग: इसको किसी भी शुभ कार्य जैसे गृह प्रवेश , विवाह, तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को प्रारंभ करने से पूर्व रोली आदि से चित्रित किया जाता है।
स्वस्तिक एवं सप्तऋषि मंडल: सप्तऋषि मंडल उत्तर दिशा में स्थित ध्रुव तारे के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। यह अलग अलग समय की चार स्थितियों को दर्शाता है। चार भिन्न स्थितियों से जो आकृति बनती है वह स्वस्तिक की होती है। ध्रुव तारा स्थिर है जो स्थिरता का प्रतीक है और उसके चारों ओर सप्तऋषि मंडल चक्कर लगाता है जो कि गतिशीलता का प्रतीक है, इस प्रकार स्वस्तिक ब्रह्मांड की स्थिरता एवं गतिशीलता दोनों का प्रतीक है।
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