शालग्राम
शालग्राम
अन्य नाम - लक्ष्मीनारायण आदि विष्णु के नाम
माहात्म्य: शंखचूड़ की पतिव्रता स़्त्री तुलसी का श्रीविष्णु ने छद्म रूप धारण कर शील हरण किया। तुलसी को पता लग गया और उन्होंने क्रुद्ध होकर विष्णु को श्राप दिया कि चूँकि तुम पाषाण-सदृश्य कठोर, दयारहित और दुष्ट हो, अतः अब तुम पाषाण रूप हो जाओ। वह विलाप करने लगी। इतने में भगवान शिव वहां पहुंचे और तुलसी से कहा कि जिस मनोरथ को लेकर तुमने तपस्या की थी यह घटना उसीका फल है। तुम अपना यह शरीर त्याग कर लक्ष्मी का दिव्य रूप धारण कर भगवान विष्णु के साथ बैकुंठ में विहार करो। तुम्हारे द्वारा त्यागा गया शरीर पुण्यरूपा गंडकी नदी के नाम से प्रसिद्ध होगा। तुम्हारे शापवश श्रीहरि पाषाण बनकर गंडकी नदी के किनारे स्थित रहेंगे। उस पाषाण को कीड़े काटकर टुकड़े करेंगे जिससे उसमें चक्र बन जाएंगे। वे शालग्राम कहलाएंगे। वह अत्यंत पुण्य प्रदान करने वाले होंगे।
शालग्राम, शंख एवं तुलसी का साथ: पूजन के अंतर्गत शालग्राम पर तुलसीपत्र चढ़ाया जाता है। शिवजी ने बताया कि शालग्रामरूपी विष्णु एवं तुलसीरूपी लक्ष्मी का साथ बहुत पुण्यों को प्रदान करने वाला होगा। जो शालग्राम से तुलसी पत्र को पृथक करेगा उसे जन्मांतर में स्त्री वियोग का दुख उठाना होगा। इसी प्रकार शंख से तुलसी को पृथक करने वाला भी पत्नी विहिन होकर सात जन्मों तक रोगी बना रहेगा। जोे शालग्राम, तुलसी एवं शंख को एक रखकर उनकी रक्षा करेगा वह श्रीहरि को प्यारा होगा।
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