शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

नाग पंचमी- पूजन एवं कथा Puja Wrat Upwas kathaen sandesh sanatan pratik

  नाग पंचमी- पूजन एवं कथा  


(श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में नाग पंचमी का व्रत किया जाता है। अग्रवालों में इसका विशेष महत्व है। एक दिन पहले सायंकाल भोजन बनाकर रख लिया जाता है क्योंकि उसी को दूसरे दिन प्रयुक्त करना होता है। चने, मूँग, आदि भिगो लिए जाते हैं।)

1 . पूजन विधि- 1. प्रातः शीतल जल से स्नान कर लेना चाहिए।

2. इस दिन वैसे तो साँप की बांबी पर जाकर नाग की पूजा की जाती है परंतु आजकल यह संभव नहीं है इसलिए घर के आंगन में साँप  की बांबी के प्रतीक स्वरूप रेती का छोटा सा टीला बना कर तथा उस पर नाग की मूर्ति रखकर पूजा कर सकते हैं। यदि नाग की मूर्ति नहीं हो तो गीली मिट्टी से कुंडली मार कर बैठे नाग बनालें।

3. पुजा  के प्रारंभ में प्राणायाम, ध्यान एवं गणपति की स्थापना कर पूजन करें।

4. दाहिने  हाथ में कुछ जल, कंकु, अक्षत, पुष्प लेकर निम्नलिखित संकल्प लें-

 - मेरे कुल में विभिन्न उपद्रवों के निवारण एवं रोग रहित आयुवृद्धि हेतु मैं नाग पंचमी व्रत करती हूँ।

                                                                      प्राकृतिक बाम्बी 

   


                                                                   रेत से बनी नाग की बांबी              

  


                                                                      रूई से बनी पुनियाँ          

5. नाग देवता का पूजन भी उसी विधि से किया जाता है जैसे कि सारे पूजन किये जाते हैं। इस पूजा में चूँकि ठंडे का ही प्रावधान है इसलिए प्रतीक स्वरूप  दिया एवं अगरबत्ती  बिना जलाए ही रख दिए जाते हैं। चित्र में दिखाए अनुसार रूई की पुनियां (रूई की पुनी पर कुछ कुछ दूरी पर बीच में कंकू एवं हल्दी लगाकर) बना कर नाग पर चढ़ाई जाती हैं। 

6 पिछले दिन बनाई गई ठंडी भोजन सामग्री का भोग लगाएँ। ठंडा ही भोजन किया जाता है।  सामग्री में दही का प्रयोग अवश्य  करें। 

7 सासूजी/बहिन बेटी के लिए बायना निकाले।

2   नागपंचमी की पौराणिक  कथामहाभारत काल में द्वापर युग की समाप्ति एवं कलियुग के प्रारम्भ के संधिकाल में राजा जनमेजेय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए नागों का संहार करने के लिए एक विशाल यज्ञ करवाया । राजा परीक्षित की मृत्यु सर्पों के राजा तक्षक के डसे जाने से हुई थी । हवन कुंड में लाखों नाग आहुति बन रहे थे । तब आस्तिक ऋषि ने राजा से इस यज्ञ को बंद करने का आग्रह  किया 

3  नागपंचमी की लोक कथा -

एक साहुकार था। उसके सात बेटे और बहुएँ थी। एक बार सातों बहुए खदान से मिट्टी लेने के लिए गईं। खोदते समय उसमें से एक नाग निकला। जब सभी बहुए नाग को मारने लगी तो सबसे छोटी बहु ने उसे मारने नहीं दिया और नाग को अपना भाई बनाते हुए बोली- “मेरे पीहर में बाप, बांबी में साँप।” तब सारी देरानी-जेठानियाँ बोली कि कल इसकी छाने लाने की बारी है, इसे वहीं भेजेगें, वहाँ नाग निकलेगा और उसे डस लेगा। जब दूसरे दिन छोटी बहु छाने लेने गई तो वहाँ नाग बैठा था, वह उसे देखकर जोर से फुफकारा। नाग को देखकर वह बोली- “भाईजी, राम राम।”  नाग बोला, “तुने मुझे भाई बोला है इसलिए वर्ना तो मैं डस लेता।” तो छोटी बहु बोली, “ऐसे कैसे डस  लेता तू तो मेरा धरम भाई है,” और बोली - 

जीवो नाग नागोलियो, जीवो वासुकी नाग, 

जिव मेरो लाड़ लड़ायो, नेवर घाली पाँव।

यह सुनकर नाग ने उसे नेवर देकर जाने दिया। पांव में नेवर पहिन कर छोटी बहु इठलाती हुई घर पहुंची तो उसकी जेठानियाँ उसे जीवित देखकर बोल पड़ी कि नाग ने उसे तो डसा ही नहीं। थोड़ी देर बाद नाग आया और बोला, “मेरी बहिन को भेजो मैं उसे ले जाने आया हूँ।”

 यह देखकर जेठानियाँ ईर्ष्यावश  आपस में चर्चा करने लगी कि देखो इसको तो इसका मुँह बोला धरम भाई नाग लेने आ गया और अपने को तो सगा भाई भी लेने नहीं आया। उन्होंने छोटी को तैयार कर भिजवा दिया। रास्ते में उन दोनों को खून की नदी बहती मिली। तब नाग उसे अपनी पूँछ पकड़ा कर नदी पार कराने लगा तो खून की नदी दूध की हो गई। वह अपने पीहर नाग के घर पहुँच गई। वहाँ नाग की माता एवं अन्य भाई भी रहते थे। वहाँ उसको बहुत लाड़ प्यार मिला। बहुत दिन हो गए, एक दिन नागिन छोटी बहु से बोली कि बेटी मैं काम से बाहर जा रहीं हूँ तू दूध को ठंडा करके भाइयों को पिला देना। छोटी बहु ने दूध को ठंडा किए बिना ही गर्म गर्म दूध ही पिला दिया इससे किसी का फन तो किसी कि जीभ जल गई। एक दिन पड़ोसन से झगड़े में उसने बोल दिया कि मेरखाड़िया-बाड़िया की सौगंध। यह सुनकर भाइयों को लगा कि बहिन अब ऊब गई हैं, उन्होंने माँ से कहा कि इसको बहुत दिन हो गए हैं अब इसे इसके ससुराल भेज दो। जब उसको बहुत सारा धन देकर विदा करने लगे तो ताई-चाची बोली कि बाईजी तुम्हारे भाइयों ने तुम्हे बहुुत लाड-़प्यार दिया पर विदा करते समय तुम्हे छ कोठार की चाबी तो दे दी पर सातवें कोठे की चाभी तो दी ही नहीं। तब उसने नाग भाई से पूछा कि उसने सातवें कोठे की चाबी क्यों नहीं दी तो भाई बोला कि सातवें कोठे की चाबी लेगी तो पछताएगी, पर उसने जिद करके चाबी ले ही ली। उसने सातवां कोठा खोला तो वह चौंक  पड़ी, उसने देखा कि उसमें एक बूढ़ा नाग बैठा था। उसने जोर से फुफकार मारी, छोटी बहु बोली कि बाबाजी राम राम। तब वह बुढ़ा नाग बोला कि तूने मुझे बाबाजी कहा इसलिए छोड़ देता हूँ वर्ना तुझे डस लेता। तो वह बोली मैंने आपको अपना पिता बनाया भला आप मुझे क्यों डस लेतेे। यह कहकर वह बोली -

जीवो नाग नागोलियो, जीवो वासुकी नाग

जिव मेरो लाड़ लड़ायो, नौ करोड़ का हार।

नाग देवता प्रसन्न हो गया और उसने हार निकालकर दे दिया। इस प्रकार बहुत सारा धन, जेवरात, हीरे जवाहरात लेकर वह अपने ससुराल पहुँची तो उसकी इस संपति को देखकर सारी जेठानियाँ बोली कि अपने को तो सगे पीहर से भी कुछ नहीं मिलता इसे तो पीहर नहीं होने के बाद भी इतना कुछ मिल गया। दूसरे दिन छोटी के बच्चे ताइयों के अनाज की बोरियाँ साफ करा रहे थे तो वे व्यंग में बोली की तुम हमारी बोरियाँ मत साफ कराओ, तुम्हारे मामा-नाना तो अजरांगिया-बजरांगियां हैं, वो सुनते होंगे तो चांदी की बोरियां मंगा देंगे। ये बात बच्चों ने अपनी मां से जाकर कही तो नाग भाई ने भी सुनली। उसने अपनी मां से कहकर सोने चांदी की बोरियां मंगवा दी और एक बाई रखवा दी। तीसरे दिन बच्चे उनके यहां झाड़ू निकाल रहे थे तो फिर से ताइयों ने ताना मारा तो नाग भाई ने सोने चांदी की झाड़ू मंगवा दी। यह देखकर ताइयों ने विचार किया कि इनको तो ताना मत मारो, ये तो जैसे सुनते हैं इसका घर धन दौलत से भर देते हैं। अपन इसके लिए राजा को जाकर भिड़ा देते हैं। वे राजा के पास गई और शिकायत करी कि उनकी देरानी के पास नौ करोड़ का हार है वो उसको थोड़े ही शोभा देता है वह तो रानी के गले में ही शोभा देगा। तब राजा ने साहुकार और उसकी बहु को बुलाकर उससे वह हार देने के लिए कहा। बहु ने उसे उदास मन से दे दिया पर साथ ही बोली कि “मेरे गले का मोती का हार, रानी के गले में नाग हो जावे”। यह कह कर वह जाने लगी तभी रानी के गले का हार  नाग हो गया और वह रानी को डसने लगा तो रानी ने राजा से यह कहकर कि बहु ने कुछ जादू टोना कर दिया है, बहु को फिर से बुलवा लिया। राजा ने उसे डाटा कि तूने रानी के साथ यह क्या कर दिया। तो छोटी बोली कि मैंने तो कुछ नहीं किया, मुझे तो मेरे मुंह बोले धरम भाई नाग देवता ने यह हार दिया था। यह सुनकर राजा ने वह हार वापस दे दिया और साथ ही एक हार अपनी तरफ से और दे दिया। यह देखकर जेठानियां और जल भून बैठी कि यह  तो राजा से भी नहीं डरी, तो फिर उन्होंने  उसके पति के कान भरे कि तेरी बहु तो सेठ के यहाँ जाती है और वहां से धन लेकर आती है तू उससे लड़ता क्यों नहीं है। यह सुनकर कान का  कच्चा उसका पति छोटी से झगड़ पड़ा और उसने पूछा सच बता तू इतना धन कहां से लाती है। यह सुनकर छोटी ने अब तक की घटना की सारी कहानी सुना दी। यह सुनकर उसके पति ने सारे गांव में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब कोई अब से नागपंचमी का व्रत करेंगे, नाग देवता की पूजा करेंग ,बाँसी खाएंगे और बायणा निकालेंगे।

हे नाग देवता जैसा बिना पीहर वाली छोटी बहु को दिखाया वैसा ही सभी कहने सुनने वालों को दिखाना।

इसके बाद कोई भी गणेशजी की कहानी कहें। 

4 .अनुकरणीय संदेश  -

  • सर्प की हत्या न करें।
  • किसी को भी आदर सूचक अपनत्व भरे वचनों से संबांधित करने पर वह आपका अपना हो जाता है।
  • किसी की उन्नति देखकर ईर्ष्या  न करें।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें