त्रिशूल एवं सुदर्शन चक्र
त्रिशूल
त्रिशूल क्या है?:त्रिशूल का अर्थ है त्रि + शूल , त्रि का अर्थ तीन एवं शूल का अर्थ कांटा होता है। एक लंबी छड़ के एक सिरे पर तीन नुकीले चाकू/ काँटों जैसी रचना होती है जिसे त्रिशूल कहते हैं।
माहात्म्य: त्रिशूल का सर्वाधिक प्रयोग भगवान शिव एवं मां दूर्गा के द्वारा होता है। यह नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने के अस्त्र का प्रतीक है। तीन शूल ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के प्रतीक हैं। ये भगवान के तीन स्वरूपों सृजनकर्ता, पालनकर्ता एवं विघटनकर्ता का भी प्रतीक है। यह मनुष्य की विभिन्न व्याधियों के लिए उत्तरदायी व्याप्त तीन कारणों वात, पित्त एवं कफ को संतुलित रखने का भी प्रतीक है। यह भक्त को आश्वस्त करता है कि निश्चिन्त रहो ईश्वर तुम्हारी रक्षा कर रहा है।
सुदर्शन चक्र
भगवान विष्णु के हाथ में तर्जनी अंगुली में निरंतर घूर्णन करता एक पहिए जैसा अस्त्र है जिसकी परिधि पर बारह दांतें होतेे हैं। उसके केंद्र को वज्र कहा जाता है।
सुदर्शन चक्र ब्रह्मा द्वारा विष्णु को प्रदान किया गया था। बारह दांतें बारह माह को बताते हैं तथा जिस प्रकार समय निरंतर आगे बढ़ता रहता है तथा वर्ष निरंतर व्यतीत होते रहते हैं वैसे ही चक्र भी घूर्णन करता रहता है और यह समय की निरंतरता का प्रतीक है। ऐसी भी मान्यता है कि इसका निर्माण विश्वकर्मा द्वारा किया गया था।
सुदर्शन चक्र से संबद्ध कहानियां: इसके साथ अनेक कथाएं जुड़ी हुई हैं। विष्णुजी द्वारा मगरमच्छ द्वारा पानी में हाथी का पैर पकड़ लेने पर मगरमच्छ का सिर काटकर हाथी को बचाना, महाभारत में शिशुपाल द्वारा श्रीकृष्ण के लिए सौ अपशब्द बोलने पर श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल का वध, समुद्र मंथन के दौरान अमृत छीन कर भाग रहे असुर राहू का मोहिनी रूप धारी विष्णुजी द्वारा सिर काट लेना आदि कई कथाएं सुदर्शन चक्र से जुड़ी हैं।
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