सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

 ज्योतिर्लिंग 

नाम का  माहात्म्य: वे शिवलिंग जो ज्यातिर्मय हैं। जो स्वयंभू हैं । वे जो कि भक्त द्वारा की गई आराधना/तपस्या से एक ज्योतिपिंड के रूप में प्रकट हुए और जहां उनका प्रादुर्भाव हुआ वहीं स्थापित हो गए। शिवजी ने स्वयं ने बारह ज्योतिर्लिंग रूप में अवतरण किया।  

नाम:  शिवजी के द्वारा लिए गए कुल बारह ज्योतिर्लिंग अवतार हैं जिनके अवतरण के क्रमानुसार नाम हैं - 1. सोमनाथ 2. मल्लिकार्जुन 3. महाकाल 4. ओंकारेश्व र 5. केदारेश्वर 6. भीमाशंकर 7. विश्वेश्वर  8. त्र्यम्बकेश्वर  9. वैद्यनाथेश्वर  10. नागेश्वर  11. रामेश्वर  12. घुष्मेश्वर 

ज्यातिर्मय होने की व्याख्या: ये सभी 12 लिंग भक्तों की आराधना एवं तपस्या से प्रकट हुए। संभवतः अंतरिक्ष से आने वाले ये चमकीलें एवं ज्योतिर्मय पिंड हैं जो कि ज्यातिर्लिंग कहलाए। वे स्वयंभू कहलाए क्योंकि वे प्रकट हुए थे। यदि इन शिवलिंगों को निकट से देखा जाए तो इनमें से अधिकांश  अनगढ़, खुरदरे और छोटे हैं। कहानियों के अनुसार जहां भी ये प्रकट हुए वहां गड्ढा हो गया या बड़ा घेरा बन गया, या अन्य छोटे पिंड बन गए, ऐसा लगता है कि ये उल्का पिंड हैं जो कि लिंग आकृति के होने से एवं सनातनियों के प्रकृति पूजक हाने से ये भी पूज्य हो गए। इन पर निरंतर जल चढ़ाने का प्रावधान है जो कि ऐसी मान्यता है कि उनमें निहित रेडियोएक्टिव विकिरण एवं  ऊष्मा जलाभिषेक से कम होते हैं। प्रकृति में स्थान स्थान पर प्राकृतिक रूप से प्राप्त लिंगाकृतियां शिव लिंग के रूप में पूजी जाती हैं उसी प्रकार ये ज्योतिर्लिंग भी पूजे जाते हैं।

महाकाल: काल का मुख्य अर्थ है समय। महाकाल का अर्थ होता है महान समय। हम जानते हैं कि विक्रमी संवत के पंचांग(कैलेंडर) का निर्माण उज्जैन में होता है। ऐसी मान्यता है कि महाकाल का लिंग जिस जगह विद्यमान है वहां से प्राचीन शून्य अक्षांश  रेखा गुजरती थी जिसे आधार बनाकर समय निर्धारित किया जाता था। इस कारण इसे महाकाल कहा गया। महाकाल के चारों ओर दो कोस की त्रिज्या में शिव बिराजे हुए हैं ऐसा शिवपुराण में उल्लेख है।

काशी /वाराणसी: काशीपुरी शिवजी की परम प्रिय भूमि है। इस क्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त करने वाला कोई भी हो, कैसा भी हो, कैसे भी मृत्यु को प्राप्त करे, वह मोक्ष को ही प्राप्त करता है। काशीपुरी क्षेत्र में अनेक शिवलिंग स्थापित किए हुए हैं। चारों ओर पांच कोस की त्रिज्या में फैला हुआ यह क्षेत्र अविमुक्त कहा गया है। काशीपुरी का निर्माण स्वयं शिवजी द्वारा किया गया। प्रलय के बाद भी काशीपुरी का नाश नहीं होता। कर्मों का कर्षण करने से ही इसे काशी  कहा गया। यहीं पर काशी विश्वनाथ  या विश्वेश्वर  ज्योतिर्लिंग विराजित हैं।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें