प्रथम प्रकरणः गणेशजी
सनातन धर्म में विभिन्न देवी देवताओं को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत/चित्रित किया जाता है। विभिन्न स्रोतों से हम सभी इसकी कुछ कुछ जानकारी रखते हैं। प्रस्तुत शृंखला में प्रतीकों के अर्थ को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
गणेश जी के प्रतीकात्मक स्वरूप से हम सभी भली भांति परिचित हैं।
1. गज मस्तक: बड़े आकार का मस्तक । तीव्र बु़िद्ध एवं बड़ी सोच का द्योतक।
2. छोटे नेत्र: तीक्ष्ण दूष्टि, एकाग्रता एवं दूरदृष्टि के द्योतक।
3. बड़े कान: अधिक सुनों/दूसरों की बात को ध्यान से सुनों।
4. छोटा मुख: कम बोलों/ अनावश्यक नहीं बोलना।
5. पूर्ण दाँत : आस्था का द्योतक।. खंडित दांत: बुद्धि । अच्छाई को संभालों और बुराई का परित्याग करों। जीवन में प्रगति के लिए बुद्धि एवं आस्था दोनों का होना आवश्यक है। कभी किसी ज्वलंत समस्या का समाधान बुद्धि से न मिले तो उसे ईश्वर (आस्था) पर छेाड़ दों।
6. सूंड: उच्च शक्ति, उच्च दक्षता एवं उच्च अनुकूलन क्षमता (किसी भी परिस्थिति में स्वयं को ढाल लेना।) सूंड बड़े अवरोधों को हटा भी देती है तो कोमल वस्तुओं को आहिस्ता से उठा भी लेती है।
7. फरसा: आत्मरक्षा, लगाव के सभी बंधनों को त्याग देना, ईच्छाओं और मद को नियंत्रित करना।
8. पाश /रस्सी: अपने आपको सत्य के निकट ले जाना।सत्य पर चलो, सत्य से बंधकर रहो।
9. आशीर्वाद मुद्रा में हथेली: ब्रह्म तक पहुंचने के मार्ग को प्रशस्त करना एवं अवरोधों से बचाने हेतु आशीर्वाद प्रदान करना।
10. मोदक: साधना का पुरस्कार, प्रसन्नता, संतोष एवं पोषण। कठोर एवं सूखा लड्डू अंदर से मीठा होता है।
11. बड़ा उदर: समस्त बुरे एवं अच्छे अनुभवों को शांतिपूर्वक अपने में समा लेना। गोपनीयता को बनाए रखना।
12. छोटे पांव: किसी भी कार्य हेतु जल्दबाजी नहीं करना। पूर्ण विचारोपरांत आगे कदम बढ़ाना ।
13 . चूहा: चूहा किसी भी वस्तु को अपने तीक्ष्ण दांतो से नुकसान पहुंचा सकता है। व्यक्तित्व में विद्यमान चूहा रूपी आंकाक्षाएं आपकी सारी तपस्या को भंग कर सकती हैं। उसेे नियंत्रण में रखना आवश्यक है । चूहा खेती को नुकसान पहुंचाता है उसे नियंत्रण में रखो। प्रस्तुति: दुष्यन्त अग्रवाल
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