चौथ माता की लोक कथा -1
एक माँ-बेटे थे। लकड़हारा बेटा कमाकर लाता जिससे दोनों का खर्च आराम से चल जाता था। बेटा जो लकड़ी लाता माँ उसमें से दो लकड़ी रख लेती तथा उन्हें बेचकर चौथ माता के पूजन और व्रत की सामग्री लाती थी।चौथ के दिन 5 लड्डू बनाती। एक गणेश जी, एक चौथ माता का, एक बायणे का तथा चंद्र दर्शन के बाद एक खुद खा लेती। एक चौथ के दिन बेटा अपने पड़ौस में गया वहाँ महिलाएँ चौथ माता की पूजा कर रहीं थी। यह देखकर बेटे ने पूछा कि आप सब क्या कर रहीं हैं? महिलाएँ बोली की हम चौथ माता का पूजन कर रहीं तेरी माँ तो हर महिने यह करती है, चूरमा बनाती है, क्या तुझे खाने को नहीं देती है? बेटा घर गया और माँ से लड़ने लगा कि मैं इतनी मेहनत से कमा कर लाता हूँ और तू लड्डू बना कर मजे से खाती है। माँ ने कहा - “बेटा यह व्रत तो मैं तेरी भलाई के लिए ही करती हूँ। तू ही बता भला कोई केवल लड्डू खाने के लिए दिनभर भूखा रहकर रात को चंद्रमा दिखने के बाद क्यों खाएगा।”... पर बेटे को क्रोध के कारण माँ की बात समझ में नहीं आई। उसने माँ को चौथ का व्रत करने के लिए मना किया और रूठ कर घर से जाने लगा। माँ ने कहा - “बेटा ले ये आखे(अक्षत/पूरे चावल) ले जा, जब भी तुझ पर कोई संकट आए चौथ माता का नाम लेकर छोड़ देना तेरा संकट दूर हो जाएगा।”
बेटा घर छोड़ कर निकल पड़ा। मार्ग में एक खून की नदी मिली। उसने आखे छोड़े और बोला यदि चौथ माता तू सच्ची है तो मूझे रास्ता दे। नदी में रास्ता बन गया और वह नदी के पार आगया। आगे बाघ आदि वाले जंगल में फंसा। उसने चौथ माता के नाम पर आखे छोड़े। फिर से उसे रास्ता मिल गया। इससे उसको चौथ माता के प्रताप पर विश्वास हो गया। आगे जाकर एक ऐसे राज्य में पहुँचा जहाँ का राजा हर माह एक मनुष्य की बली देता था। ठिकाने की तलाश में वह एक वृद्धा माँई के घर पहुँचा। उसने देखा कि वृद्धा मालपूए बनाती जा रही थी और रो भी रही थी। उसने रोने का कारण पूछा। वृद्धा ने बताया कि आज राजा उसके बेटे की बली चढ़ाने वाला है। यह सुनकर चौथ माता पर विश्वास के चलते उसने कहा कि मुझे मालपुआ खाने को दे दे मैं तेरे बेटे की जगह चला जाउँगा। मालपूए खाकर वह सो गया। राजा का बुलावा आने पर उसे वृद्धा ने जगा दिया। वह उठकर जाते हुए आखे छोड़ता गया और चौथ माता से विनती करता गया कि हे माता मेरे संकट को टालना। राजा ने बली देने के लिए मिट्टी के घड़े पकाने के लिए आवा तैयार कर रखा था। बेटा आवा में बैठ गया। तीन दिन निकल गए। आवा के पास खेलने वाले बच्चों ने आवा पर कंकर मारा तो आवा के पकने की आवाज आई। बच्चों ने राजा को आवा पकने का समाचार दिया। राजा को आश्चर्य हुआ कि आवा पकने मेें छः महीने लगते हैं तीन दिन में कैसे पक गया। राजा आवे के स्थान पर गया तो देखा कि वहांँ पर जवारे उगे हुए थे और मिट्टी के घड़ों के स्थान पर सोने-चांदी के कलश दिखाई दे रहे थे। राजा आश्चर्य चकित होकर कलश उतारने लगा इतने मे आवाज आई- हे राजा कलश धीरे-धीरे उतारना। राजा डर गया कहीं लड़के का भूत तो नहीं है? लड़के ने कहा- “हे राजन डरो मत मैं तो वही लड़का हूं जिसकी तुमने बली दी थी। मेरी माँ चौथ माता का व्रत करती थी उसी के प्रताप से मैं बच गया।“
राजा ने उसकी बात की सच्चाई को परखने के लिए उसे जंजीरों से बँधवा दिया और बोला कि अब छूट कर बता। चौथ माता सच्ची होगी तो यह जंजीर खुल जाएगी और मुझे बाँध लेेगी। लड़के ने चौथ माता का नाम लेकर आखे छोड़ते हुए कहा कि तूने मुझे तीन संकटों से उबारा है अब इस चौथे संकट से भी मुझे निकाल। यह कहते से ही वह बंधन मुक्त हो गया और राजा जंजीर में बंध गया।
राजा ने अपनी बेटी का विवाह उस लड़के से कर दिया। एक दिन दोनों पति-पत्नी बैठे हुए थे तो बिजली कड़की, जिसे देखकर लड़का बोला कि मेरे गाँव में बिजली चमकी है। राजकुमारी बोली जब क्या आपका गाँव भी है? हां गाँव भी है और वहाँ माँ भी है? अरे तो फिर आप अपनी माँ को अकेली छोड़कर यहां क्यों बैठे हैं? बेचारी सासुमाँ किस हाल में होगी? चलो अपने गाँव चलो।..... राजा ने दोनों को बहुत सारा धन देकर उनको विदा किया।
गाँव पहुँचने पर वे माँ से मिले और माँ के पैर पड़ते हुए बोले- माँ तेरी चौथ माता की कृपा और प्रताप से ही मैं वापस जीवित लौट सका हूँ।... माँ ने सारे गाँव में ढूंढी पिटवा दी कि साल में 13 नहीं तो 4 नहीं तो कम से कम 2 चौथ माता के व्रत तो अवश्य करें। बाद में बहु और गाँव की अन्य महिलाएँ भी व्रत करने लगी और चौथ माता के आशीर्वाद से सभी सुखपूर्वक रहने लगे।
हे चौथ माता, जैसा लड़के का संकट टाला और उसके परिवार को सुख-समृद्धि दी वैसे ही सबके दुखों को दूर करना और सबको सुख शांति देना।
अनुकरणीय संदेश :-
- दृढ़ आस्था से की गई आराधना व्यक्ति में आत्मविश्वास उत्पन्न करती है जिससे उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
- सुख-समृद्धि प्राप्त होने पर अपने माता-पिता और परिवार को नहीं भूल जाना चाहिए।
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