राधा कृष्ण
नाम का माहात्म्य: महाभारत के प्रमुख पात्र एवं श्रीमद्भागवदगीता के उपदेशक श्रीकृष्ण का नाम सदैव राधा के साथ लिया जाता है। यह सर्वाधिक चर्चित एवं प्रसिद्ध प्रेमी युगल नाम है तथा इन पर ही सबसे अधिक भजन आदि बने हैं। वस्तुतः इस युगल का आत्यधिक गूढ़ रहस्य है।
प्रस्तुत की जाने वाली छवि: सामान्यतः चित्र में श्रीकृष्ण एवं राधाजी को एक दूसरे के साथ प्रणय मुद्रा में दिखाया जाता है। श्रीकृष्ण को आसमानी रंग में एवं राधाजी को गौरे रंग में दिखाया जाता है। श्रीकृष्ण के हाथ में मुरली होती है और राधाजी मुग्ध मुद्रा में उनके साथ खड़ी दिखाई देती हैं। श्रीकृष्ण के सिर पर मोर पंख युक्त मुकुट होता है। वे अक्सर पीली धोती में ही होते हैं। उनके पीछे गाय होती। एक मयुर भी होता है।
श्रीकृष्ण: श्रीकृष्ण सत्-चित-आनंद के प्रतीक हैं । उन्हें सच्चिदानंद कहा जाता है। वे आनंद, परमानंद, पूर्णता, श्रेष्ठता के अवतार हैं। वे भगवान विष्णु (पीतांबरधारी) के मनुष्य अवतार हैं।
श्रीकृष्ण का नीला रंग: नीला रंग अर्थात आकाश एवं अनंत विस्तार। सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ हैं। वे प्रत्येक जीव में हैं, वे किसी एक शरीर, मस्तिष्क या बुद्धि या पदार्थ के साथ बंधे हुए नहीं हैं। श्रीकृष्ण एक ग्वाले (गायों के झुंड का नियंत्रक) के रूप में प्रतीक हैं इंद्रियों या संवेगों (गायों का झुंड प्रतीक है समस्त इंद्रियों का ) के पूर्ण नियंत्रक होने के।
राधाजी: वे प्रतीक हैं ईश्वर के प्रति तीव्र, निरपेक्ष प्रेम, प्यास, मन की गहराई से चाह की। वे प्रतीक हैं भौतिक जगत के सभी क्रियाकलापों में संलग्न रहते हुए निरंतर मन से ईश्वर को स्मरण करते हुए उसमें रम जाने की।
मुरली: मुरली शरीर है जो अंतःमन से हो या बाह्य रूप में हो, वह आत्मा के गीत एवं अद्भूत संगीत को सृजित करता है। आत्मा का यह संगीत जीवंत हो उठता है जब श्रीकृष्ण अर्थात ईश्वर स्वयं मुरली के छिद्रों पर अंगुुलिया चलाता है।
गाय: गाय मां के रूप में प्रदान की गई सेवा का प्रतीक है। वह पंच गव्य प्रदान करती है। वह दूध, दही, मक्खन, गौमुत्र (औषधी) एवं गोबर (खाद) आदि प्रदान करती है। दूध से मिठाई आदि कई अन्य खाद्य सामग्री प्राप्त होती है।
मयुर एवं मोर पंख: मोर एवं मयुर पंख प्राकृतिक सौंदर्य में आनंद से जीवनयापन करने का द्योतक है। यह प्रतीक है कि हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हुए आनंद से जीवननिर्वाह करना चाहिए।
राधाजी एवं श्रीकृष्ण की प्रणय लीला: यह प्रतीक हैं एक भक्त (राधाजी) का जो कि ईश्वर (आत्मा) के प्रति पूर्ण समर्पित प्रेम के साथ स्वयं की इच्छाओं का दमन कर देता है। यह प्रणय लीला नश्वर प्रकृति (राधाजी) एवं अविनाशी ईश्वर (आत्मा) की पारस्परिक क्रीड़ा का प्रतीक है।
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