शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

bhagwan surya, a symbolic interpretation भगवान सूर्य की छवि की व्याख्या, प्रतीकात्मक छवि की एक व्याख्या

       

बीसवां प्रकरण: भगवान सूर्य और छठ पूजा 

सूर्य के अन्य नाम: रवि, भास्कर, भानु, आदित्य, दिनकर, प्रभाकर, दिवाकर, मार्तण्ड, सूरज आदि अनेक नाम

सूर्य की छवि: सर्वाधिक प्रसिद्ध छवि में सूर्य को सात घोड़ों के गतिमान एक पहिया रथ पर बैठा हुआ दिखाया जाता है। उनकी चार भुजाएं हैं। एक भुजा में कमल, एक में शंख, एक आशीर्वाद की मुद्रा में एवं एक घुटने पर रखा होता है । रथ में सारथी भी है जिसका नाम अरूण है। अरूण के पैर नहीं है। सूर्य भगवान के चारों ओर सूर्य की किरणें निकलती हुई दिखाई जाती है। कई प्राचीन मुर्तियों में सूर्यरथ में चार घोड़े बताए गए हैं। (गुप्त कालीन सूर्य प्रतिमाओं में युनानी वेशभूषा में सूर्य दिखाई देते हैं।) 

माहात्म्य: सूर्य संपूर्ण विश्व  में किसी न किसी रूप में पूज्य है। वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मणों, जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में सूर्य पर बहुत कुछ वर्णन मिलता है। सनातन धर्म में सूर्य सर्वप्रथम सूर्योदय से पहले पूजनीय रहा है। सनातनी प्रातः सूर्योदय के समय सूर्य को अर्ध्य  देते हैं। सूर्य को ब्रह्मांड की आत्मा माना गया है। पुराणों में सूर्य कि उत्पत्ति  की विशेष कथा है। ब्रह्मा ने अपने दाएं अंगूठे से दक्ष एवं बाएं अंगूठे से उनकी पत्नी को सृजित किया। ब्रह्मपुत्र का नाम कश्यप  था। कश्यप  का विवाह दक्ष की तेरहवीं पुत्री अदिति के साथ हुआ। उनके जो पुत्र हआ वही सूर्य हुआ। अदितिपूत्र होने से सूर्य को आदित्य कहा जाता है। उन्हीं सूर्य से ही समस्त चराचर जगत् का आविर्भाव हुआ। ओम को सूर्य का सूक्ष्म रूप माना गया है। मनुष्य में नाड़ीचक्र में मणिपूर (नाभि) चक्र को सूर्यचक्र माना गया है। उसे नाड़ीचक्र संस्थान का केंद्र माना जाता है। इड़ा नाड़ी को सूर्य नाड़ी कहा जाता है। मणिपुर चक्र के साथ पीला रंग संबद्ध है जो कि ऊष्णता एवं तेज का प्रतीक है। सातों चक्रों के साथ सात रंग संबद्ध हैं। सूर्यरथ के सात घोड़े सूर्य के श्वेत प्रकाश  में सात रंगों के प्रतीक हैं। शरीर के मेरूदंड में स्थित ब्रह्मनाड़ी में जो चक्र स्थित हैं वस्तुतः वे नाड़ी पुंज हैं। 72000 नाड़ियों के पूंज इन्हीं चक्रों से निकलते और संपूर्ण शरीर में प्रसारित होते हैं। योगासनों में सूर्य नमस्कार को सर्वाधिक महत्व प्राप्त है। सूर्य वायु तत्व के अधिपति हैं। बाह्य वायु के साथ ही शरीर में संचारित होने वाली प्राण, व्यान, उदान, समान, अपान आदि वायुओं के भी अधिपति हैं। सूर्य ज्योतिर्लिंग है। बारह ज्योतिर्लिंग उन्हीं से व्यूत्पन्न हुए हैं। यजुर्वेद में परमात्मा के दो रूप माने गए हैं एक घोर एवं दूसरा शिव। घोररूप अग्नि तथा शिवरूप सोम है। ऊष्णता से रौद्रता आती है तथा आर्द्रता से शिवता आती है। एक गर्म है तो दूसरा ठंडा। जैसे एक ही वायु गर्म और ठंडी हो सकती है वैसे ही एक ही परमात्मा के दो रूप रुद्र एवं शिव हैं । अतः ज्योतिर्लिंग रुद्रलिंग भी हैं तो शिवलिंग भी हैं। ऊष्णता के शीतलीकरण के लिए ही शिवलिंग/रुद्रलिंग पर जल चढ़ाया जाता है। (ज्योतिर्लिंग सम्भवतः उल्कापिंड रहे होंगे अतः उनमें  रेडिएशन भी रहे ही होंगे। उन्ही विकिरणों का सामना करने या लाभ लेने के जल चढाने का प्रावधान किया गया।)  (सूर्य की संम्पूर्ण महिमा का वर्णन संक्षेप में करना संभव नहीं है। जिज्ञासु को इसके लिए गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा सन् 1979 में प्रकाशित कल्याण का विशेषांक सूर्यांक में बहुत सी सामग्री दी गई है उसका अध्ययन करना चाहिए।  )

अरूण : अरूण रथ के नियंत्रक एवं दिग्दर्शक  हैं। अरूण रथ के साथ पहले पहुंचते हैं। सुबह सूर्य के प्रकाश  की लालिमा को अरूणाभ कहा जाता है। सूर्य का मुख्य प्रकाश  पहुंचने के पहले उसकी आभा पहुंचती है। उनके पांव नहीं हैं अतः वे रथ पर बैठे ही रहते हैं और रथ को निरंतर बिना रूके चलाते रहते हैं जो कि सूर्य के निरंतर गतिमान रहने का द्योतक है। कश्यप  के पुत्र अरूण भगवान विष्णु के वाहन गरूड़ के भाई हैं। अरूण यह संदेश  देते हैं कि जीवन यात्रा में मार्गदर्शन  एवं नियंत्रण आवश्यक  है। शास्त्रों के अनुसार अरूण का मुख सूर्य भगवान की ओर होता है। लेकिन चित्रों में सामने मुख करके बैठे हुए दिखाया जाता है।

गतिमान रथ: यह प्रतीक है गत्यात्मकता का,  सूर्य निरंतर बिना रूके चलायमान है।

सात घोड़े: सूर्य के तीव्र श्वेत प्रकाश  में  विद्यमान सात प्रमुख रंग की रश्मियों  के द्योतक हैं। 

ये सात रंग हैं बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी एवं लाल(बैनी आह पीनाला )। इन्हें सात दिनों का प्रतीक भी माना जाता है। इन घोड़ों के नाम गायत्री, वृहति, उष्णिक, जगति, त्रिष्टुप, अनुष्टुप, और पंक्ति है। ये मानव शरीर में स्थित सात योगिक  चक्रों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं ,  आध्यात्मिक दृष्टि से ये प्रमुख सात जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं ये हैं परिश्रम, विवेक, धैर्य, ज्ञान, आत्मबल, आनंद और संतुलन।

एक पहिया: इस पहिए का नाम संवत्सर है। यह पहिया पूरे एक वर्ष का प्रतीक है। पहिए में 12 तीलियां/आरे हैं जो कि वर्ष के 12 महिनों को अभिव्यक्त करती हैं।

एक हाथ में कमल: कमल सृष्टि के निर्माण एवं विकास का द्योतक है। कमल प्रकृति एवं जीवन का द्योतक भी है। जिस प्रकार कमल प्रस्फुटित होता है उसी प्रकार दिन भी आगे बढ़ता है।

शंख: प्रतीक है शास्वत ध्वनि ॐ (ओम) का। आंतरिक प्रसंन्नता का। वैज्ञानिकों ने सूर्य की ध्वनि को रिकाॅर्ड किया है जो कि ॐ  ध्वनि के समान ही है। शंख प्रतिक है जीव को दिन के प्रारंभ की सूचना देने का। 

आशीर्वाद मुद्रा: यह इस बात का आश्वासन  है कि जब तक सूर्य है तब तक जीवन की निरंतरता बनी रहेगी।

सूर्य: कुल मिलाकर सूर्य प्रतीक है ब्रह्मांडीय संतुलन, नियमितता, निरंतरता, शक्ति, अनिवार्यता,  स्वयं को जलाकर जीवन ऊर्जा प्रदान करने का। 

सूरज पूजा: बच्चे को जन्म देने के बाद माता को सात से पंद्रह दिन बाद पहली बार सूर्य के समक्ष लाया जाता है उस दिन की पूजा को सूरज पूजा कहते हैं।

छठ पूजा: छठ पूजा एक बहुत बड़ा त्यौहार है जो विशेषकर बिहार में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। धीरे धीरे वह संपूर्ण भारत में प्रसारित हो रहा है। कार्तिक मास में दीपावली के बाद शुक्ल पक्ष की छठ को छठपूजा की जाती है। इस पूजा में व्रत करने वाले व्यक्ति उदय एवं अस्त होते सूर्य को जल में खड़े होकर अर्ध्य  देकर पूजा करते हैं। जल, नमक एवं अन्न का त्याग कर व्रत किया जाता है। इन दिनों संपूर्ण वातावरण भक्ति, पवित्रता तथा आनंद से ओतप्रोत  होता है।

छठ पूजा का वैज्ञानिक पक्ष: आध्यात्मिकता के साथ साथ छठपूजा का वैज्ञानिक पक्ष बहुत अधिक सषक्त है। सूर्य सौरमंडल का केंद्र है। सौर ऊर्जा से संपूर्ण जीव जगत संचालित होता है। सौर ऊर्जा हमारे शरीर की संचालक है। सूर्य पूजा करते समय व्रत करने वाला उसकी ऊष्मा और प्रकाश  को ग्रहण करता है जोकि सूर्य किरणों से निकलने वाली जीवन शक्ति है। उदय एवं अस्त होने के समय सूर्य की रश्मियों  में उपस्थित पराबैंगनी एवं अवरक्त किरणों में संतुलन रहता है जोकि विटामिन डी बनाते हैं एवं शरीर में हार्मोन के निर्माण में संतुलन स्थापित करने में सहायक होता है। पानी में खड़े होकर अर्ध्य  देना, मानसिक दृढ़ता, शांति, संतुलन एवं अनुशासन को प्रतिबिंबित करते हैं। जल, अन्न, नमक आदि के त्याग से आंतरिक शरीर का शुद्धिकरण होता है। पूजा में प्रयुक्त प्रत्येक वस्तु यथा गुड़, गन्ना, चावल, नारियल, ठेकुआ आदि प्राकृतिक जैविक उत्पाद हैं जो कि इस पूजा का पर्यावरण से जुड़ाव का द्योतक है। पर्यावरण के प्रति एक आम भारतीय की श्रद्धा का द्योतक है छठपूजा का पर्व। 

छठ पूजा में प्रयुक्त कुछ प्रमुख मंत्र: 1. ॐ  ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः।  2. ॐ  घृणि सूर्य्य  आदित्याय नमः। 

3. ॐ  ऐहि सूर्य सहस्रांशों  तेजो राशे  जगत्पते, अनुकंपय मां भक्त्या गृहाणार्ध्य  दिवाकरः।

 प्रस्तुति : दुष्यन्त अग्रवाल 


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