शिवलिंग
नाम का माहात्म्य: भगवान शिव स्वयं ने ही अपने नाम का माहात्म्य प्रतिपादित किया था ऐसा वर्णन शिवपुराण में मिलता है। शिवलिंग शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक है। शिव साक्षात ब्रह्म हैं अतः एकमात्र वे ही लिंग के रूप में पुज्य हैं। भगवान शिव के अतिरिक्त प्रत्येक देवता का साकार स्वरूप में पूजन होता है। भगवान शिव ब्रह्मस्वरूप और निष्कल(निराकार) हैं अतः उन्हें लिंग रूप में पूजा जाता है।
शिवलिंग का प्राकट्य: ब्रह्मा एवं विष्णु में विवाद हुआ। उस विवाद से देवता दुखी होकर भगवान महादेव के पास पहुंचे। उनके आग्रह पर महादेवजी विवादस्थल पर पहुंचे। वे उनके विवाद को शांत करने के लिए उन दोनों के मध्य एक अनंत लंबाई के अग्निस्तंभ के रूप में प्रकट हो गए, इस ज्योर्तिस्तंभ का आदि-अंत नहीं था। बाद में उन्होंने अपने आपको लघु लिंग के रूप में सबके समक्ष प्रस्तुत किया।
शिवरात्रि: सनातन वर्ष की फाल्गुन कृष्णचतुर्दशी की रात्रि को अनंत लंबाई के आज्ञास्तंभ/ज्योतिर्लिंग स्वरूप शिवजी का प्रथम बार प्रादुर्भाव हुआ था वह रात्रि शिवरात्रि कहलाई। इसी दिन शिवपार्वती का विवाह भी हुआ था।
ज्योतिर्लिंग: ज्योतिर्लिंग ब्रह्म का प्रतीक है। जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति एवं उसकी आकृति की ओर संकेत करती है। इस पर अगर विचार करें तो किसी एक भयंकर विस्फोट से ब्रह्मांड बना। इसके वर्णन के अनुसार ब्रह्मांड का कोई ओर-छोर नहीं है। सूर्य ज्योतिर्लिंग है। बारह ज्योतिर्लिंग उन्हीं से व्यूत्पन्न हुए हैं। यजुर्वेद में परमात्मा के दो रूप माने गए हैं एक घोर एवं दूसरा शिव । घोररूप अग्नि तथा शिवरूप सोम है। ऊष्णता से रौद्रता आती है तथा आर्द्रता से शिवता आती है। एक गर्म है तो दूसरा ठंडा। जैसे एक ही वायु गर्म और ठंडी हो सकती है वैसे ही एक ही परमात्मा के दो रूप रुद्र एवं शिव है। अतः ज्योतिर्लिंग रुद्रलिंग भी हैं तो शिवलिंग भी हैं। ऊष्णता के शीतलीकरण के लिए ही शिवलिंग/रुद्रलिंग पर जल चढ़ाया जाता है।
लिंग स्वरूप की व्याख्या: अधिकांश विद्वान इसे ब्रह्म का प्रतीक मानते हैं। लेकिन कुछ लोग इसे पुरूष के यौनांग से जोड़ते है। कुछ अति प्राचीन शिवलिंगों की आकृति भी कुछ इसी ओर संकेत करती है। शिवलिंग पीठिका को योनि कहा जाता है। इससे भी यही अर्थ निकलता है। परंतु लिंग को आत्मा का प्रतीक भी माना जाता है और आत्मा विभिन्न योनियों में विचरण करती है वह स्वतंत्र नहीं रहती अतः लिंग एवं योनि को एक साथ ही दिखाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि चौरासी लाख योनियां होती हैं उन्हीं में से किसी एक योनि में आत्मा रहती है। अतः यहां योनि (जैविक स्वरूप/शरीर) एवं लिंग(आत्मा) के प्रतीकों को इसी संदर्भ में देखना उचित प्रतीत होता है।
लिंग की स्थापना संक्षेप में : शिवलिंग एवं उसकी पीठ का निर्माण नदी की पवित्र मिट्टी, पत्थर, धातु से किया जाना चाहिए। शिवलिंग की पीठ मंडलाकार/चौकोर, /त्रिकोणात्मक/डमरू के आकार की होनी चाहिए। शिवलिंग एवं पीठ एक ही पदार्थ से बनाए जाने चाहिए। शिवलिंग की लंबाई स्थापित करने वाले के कम से कम बारह अंगुल के बराबर होनी चाहिए उससे श्रेष्ठ फल मिलता है। कम लंबाई होने पर फल में कमी हो सकती है। स्थाई शिवलिंग ऐसे स्थान पर स्थापित किया जाना चाहिए जहां उनकी निरंतर पूजा हो। चल शिवलिंग की ऊंचाई कम से कम एक अंगुल होनी चाहिए।
लिंग की पूजा: षोड़षोपचार(सोलह उपचार) द्वारा यथाशक्ति यथोचित विधि से क्रमशः पूजन करना चाहिए। ये हैं - 1.आवाहन, 2. आसन, 3. अर्ध्य, 4.पाद्य, 5.पाद्यांग आचमन, 6. अभ्यंगपूर्वक स्नान, 7.वस्त्र एवं यज्ञोपवित, 8. सुगंध, 9. पुष्प, 10. धूप दर्शाना 11. दीप दर्शाना 12. नैवेद्य, 13. तांबूल(पान ) 14. नीराजन (आरती), 15.नमस्कार, और 16. विसर्जन।
वस्तुतः पीठिका सहित शिवलिंग ब्रह्मांड, योनि एवं आत्मा का प्रतीक है।
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