नाम का माहात्म्य: रामायण के प्रमुख चार चरित्र हैं जिन्हें राम दरबार के चित्र में दर्शाया जाता है। इस चित्र को राम दरबार कहा जाता है।
प्रस्तुत की जाने वाली छवि: सामान्यतः चित्र में श्रीराम, सीताजी, लक्ष्मणजी एवं हनुमान जी को मुख्य रूप से दर्शाया जाता है। श्रीराम को नीले रंग, एवं अन्य को गौरवर्ण में दिखाया जाता है। रामजी की धोती पीले रंग की (पीतांबरधारी श्री विष्णु के अवतार होने का प्रतीक) और सीताजी लाल साड़ी (लक्ष्मी का अवतार होने का प्रतीक) में होती हैं। रामजी एवं लक्ष्मणजी के हाथ में धनुष होते हैं। उनकी पीठ पर तरकश होते है। सभी खड़ी हुई सौम्य एवं प्रसन्न मुद्रा में होते हैं। हनुमान जी को श्री राम के चरणों में हाथ जोड़ कर विनम्र मुद्रा में बैठा हुआ दर्शाया जाता है। इनकी इस मुद्रा का नाम हनुमान बैठक पड़ा।
आसन: सिंहासन, प्रतीक है शासक का।
श्रीराम: वे आत्मा के प्रतीक हैं। धनुष एवं तीर प्रतीक हैं, यौद्धा होने के तथा सदैव क्रियाशील रहने की तत्परता के। सदा वर्तमान में हैं परंतु निर्लिप्त हैं। वे एक आदर्श मनुष्य की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं, एक ऐसे पुत्र जो आज्ञाकारी है, स्नेह का प्रतीक भाई हैं, प्रतिबद्धता के प्रतीक पति हैं, विश्वसनीय सहयोगी के प्रतीक मित्र हैं, गुरु के प्रति समर्पित अनुशासित हैं, और एक राजा की तरह निष्पक्षता, करुणा एवं दृढता़ के प्रतीक हैं।
श्रीराम का नीला रंग: नीला रंग अर्थात आकाश एवं अनंत विस्तार। वैसे वह उनके श्याम रंग का द्योतक है।
सीताजी: ऐसी बुद्धि जो कि राम अर्थात आत्मा के प्रति समर्पित हैं जिसकी अपनी कोई इच्छाएं नहीं हैं।
लक्ष्मणजी: वे ऐसे शरीर का प्रतीक हैं जो कि स्वस्थ एवं सुदृढ है और कार्य करने के लिए सदैव तत्पर रहता है।
हनुमानजी: वे मस्तिष्क का प्रतीक हैं। ऐसा मस्तिष्क जो कि शांत है, संतुलित है, निःस्वार्थी एवं पवित्र है। पूर्णतः प्रशिक्षित, अनुशासनबद्ध, विनम्र एवं अंहकारमुक्त हैं। उनकी बैठने की मुद्रा तत्काल क्रिया करने के लिए तत्परता को दर्शाती हैै।
राम दरबार: उक्त सभी को अगर समग्रता से देखें तो राम दरबार प्रतीक है स्वयं की सच्चे व्यक्तित्व का, आत्मा का, स्थिर जागरूकता का, आत्मा को स्मृति में बनाए रखना ही जीवन का लक्ष्य और प्रयोजन होना चाहिए।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें