तिथियों की माता चतुर्थी की उत्पत्ति की पौराणिक कथा (संक्षेप में मुद्गल पुराण से)
लोकपितामह ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना के लिए अपने हृदय में श्रीगणेश का ध्यान किया। उसी समय उनके शरीर से प्रकृति स्वरूपा तिथियों की जननी देवी प्रकट हुई। देवी ने श्रीब्रह्मा से कहा, “आप मेंरे पिता हैं आज्ञा करें मैं क्या करूँ? कृपया मुझे रहने के लिए स्थान एवं भोजन प्रदान करें।” श्रीब्रह्मा ने मंत्र वक्रतुंडाय हुम् देते हुए कहा तुम अद्भुत सृष्टि की रचना करो। देवी ने श्रीगणेश जी को प्रसन्न करने के लिए हजारों वर्ष तक तप किया। तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीगणेश जी ने देवी से वर मांगने हेतु कहा। देवी ने कहा, “मुझे आपकी भक्ति, स्नेह, सदैव निकटता तथा सृष्टि सृजन की सामर्थ्य प्राप्त हो।” श्रीगणेश जी ने स्वीकृति में ओम का उच्चारण करते हुए कहा “तुम समस्त तिथियों की माता होंगी, तुम्हारा नाम चतुर्थी होगा, तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय रहोगी, तुम्हारा बायां भाग कृष्ण एवं दाहिना भाग शुक्ल होगा।” यह कह श्रीगणेश अन्तर्धान हो गए। चौथ माता द्वारा गणपति का ध्यान करते हुए सृष्टि की रचना करना प्रारंभ करते से ही, सहसा उनका वाम अंग कृष्ण एवं दायां भाग शुक्ल हो गया। उनके मुख से प्रतिपदा, नासिका से द्वितीया, वक्ष से तृतीया, अंगुली से पंचमी, हृदय से षष्टी, नेत्र से सप्तमी, बाहु से अष्टमी, उदर से नवमी, कान से दशमी, कंठ से एकादशी , पैर से द्वादशी , स्तन से त्रयोदशी , अंहकार से चतुर्दशी , मन से पूर्णिमा, और जीभ से अमावस्या तिथि प्रकट हुई। शुक्ल चतुर्थी ने श्रीगणेश जी की आराधना की उससे प्रसन्न होकर उन्होंने कहा," शिव एवं अन्य देवगण तथा मेरे भक्त जन तुम्हारा व्रत करेंगे। उन्हें मैं सबकुछ प्रदान करूंगा। तुम्हारा नाम वरदा होगा।” बाद में उन्होंने कृष्ण चतुर्थी को भी वर देते हुए कहा कि चंद्रोदय होने पर तुमने मुझे प्राप्त किया है तुम मुझे सदैव प्रिय रहोगी, इस दिन निराहार रहकर चंद्रोदय पर दर्शन करने वालों को तुम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सब प्रदान करोगी। मेरी कृपा से तुम सर्वदा मनुष्य को आनंद प्रदान करने वाली होगी। चंद्रोदय होने पर मेरा पूजन एवं चंद्र दर्शन कर ब्राह्मण को भोजन करा स्वयं भोजन करे। श्रावण में लड्डू, भाद्रपद में दही, आष्विन में निराहार, कार्तिक में दुध, मार्गशीर्ष में जलाहार, पौष में गौमूत्र, माघ में श्वेत तिल, फाल्गुन में शर्करा, चैत्र में पंचगव्य, वैशाख में कमलगट्टा, ज्येष्ठ में गोघृत और आषाढ़ में मधु का भोजन करना चाहिए।
चौथ का व्रत समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने, धन-धान्य और आरोग्य प्रदान करने, समस्त आपदाएँ को नष्ट करने, तथा श्रीगणेश की कृपा से परमार्थ सिद्धि करने वाला होता है। अतः यदि संभव हो तो मास की दोनों चतुर्थी नहीं तो कम से कम भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चौथ बहुला, कार्तिक कृष्ण पक्ष की चौथ करका (करवा), तथा माघकृष्ण पक्ष की चौथ तिलका(माही चौथ ) व्रत करना चाहिए। रविवार या मंगलवार को पड़ने वाली चतुर्थी का अमित माहत्म्य है। जिस तिथि को चतुर्थी का चंद्रोदय हो रहा हो उसी दिन व्रत करना चाहिए।
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