तिलक
तिलक: सनातन धर्मावलंबियों में तिलक एक विशिष्ट पहचान है, स्त्री, पुरूष, बड़े, छोटे सभी तिलक लगाते हैं। कोई भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पहले व्यक्ति के मस्तक पर भोहों के मध्य रोली, चंदन, सिंदूर आदि से तिलक लगाया जाता है। दूसरों को तिलक लगाने के लिए अनामिका एवं अंगुठे का प्रयोग करते हैं। स्वयं के तिलक लगाने के लिए बीच वाली अंगुली का प्रयोग करते हैं तथा पितरों के लिए तर्जनी का उपयोग किया जाता है। तिलक कई आकृतियों में लगाए जाते हैं। वैष्णव, शैव आदि प्रसिद्ध तिलक हैं। लंबा, वृत्ताकार बिंदी आदि के रूप में तिलक लगाया जाता है।
वैष्णव तिलक - यह खड़ा तिलक होता है जो कि वैणव पंथ को मानने वाले लगाते हैं। जो केवल भगवान विष्णु को मानते हैं वे वैष्णव कहलाते हैं।
शैव तिलक - इसमें तीन आड़ी लकीरें और मध्य में खड़ी रेखा या बिंदी लगाई जाती है यह शैव पंथ को मानने वाले सनातनी लगाते हैं।
आम सनातनी के लिए आजकल वैष्णव एवं शैव का विभाजन लगभग समाप्त हो गया है। वे भगवान विष्णु एवं शिवजी दोनों को पूजते हैं।
तिलक क्यों लगाते हैं - तिलक मस्तक पर दोनों भोहों के मध्य से होते हुए लगाया जाता है। योग शास्त्र के अनुसार तिलक वाले स्थान के ठीक पीछे आज्ञा चक्र होता है जो कि इड़ा, पिंगला, और सुषुन्मा नाड़ी का संगम स्थल होता है। तिलक में प्रयुक्त रौली, चंदन, सिंदूर आदि का सकारात्मक प्रभाव आज्ञा चक्र पर होता है, यह हमारा चेतना केंद्र भी माना जाता है, इसमें प्रयुक्त सामग्री से आज्ञा चक्र पर प्रभाव के फलस्वरूप शीतलता, तरावट एवं शांति का अनुभव होता है। चंदन से शीतलता मिलती है, सही रौली हल्दी से बनी होती है, हल्दी में औषधीय गुण होते हैं उसका अपना प्रभाव होता है।
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