अन्य
नाम: दीया] दीप] दीवा
महत्व:
सनातन धर्म में दीपक को आत्यधिक महत्व प्राप्त है। अधिकांश धर्मों में दीप प्रज्वलित किया जाता है। सनातन
में हर शुभ कार्य यथा पूजा] शुभारंभ] गृह प्रवेश] विवाह आदि में दीप प्रज्वलन से प्रारंभ होता है। यह अत्यंत
प्राचीन परंपरा है। दीपावली का तो नाम ही दीप पर रखा गया है जिसका अर्थ है दीपों
की माला। दीपक में एक लघु पात्र होता है जिसमें खड़ी या आड़ी रूई से बनी बत्ती लगाकर उसमें घी या तेल भरा जाता है] बत्ती को जलाया जाता है तो वह दीपक हो जाता है। दीप्ति का
अर्थ प्रकाश होता है और दीपक का कार्य
प्रकाश फैलाना है। अंतर्तम एवं बाह्य
अंधकार को दूर करने का प्रतीक है दीपक। सामान्यतः बोलचाल में दीप के पात्र के लिए
भी दीपक नाम का ही उपयोग होता है।
पुराणों
में दीपक: कार्तिक मास के संदर्भ में दीपक का उल्लेख पद्म पुराण] स्कंद पुराण]
अग्निपुराण आदि में
हुआ है। भगवान शिव ने कार्तिकेय को बताया था कि घी या तेल का दान करने से
अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
यमराज के अनुसार घर के द्वार पर दीपदान से अकाल मृत्यु से रक्षा होती है। भगवान
विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी। वरदान में प्राप्त हुआ
कि जो तीन दिन दीपदान करेंगे उनके घर पर लक्ष्मी स्थाई रूप से निवास करेगी।
अग्निदेव ने वशिष्ट मुनि को बताया कि कार्तिक मास में दीप दान करने से इच्छित फल
प्राप्त होता है। दीपदान नेत्रज्योति]
आयु] धन] पुत्र और सौभाग्य
प्रदान करता है।
दीपावली
के दीप: एक विश्लेषण के अनुसार दीपावली के
पांचों दिन जलाए जाने वाले दीपक मुख्यतः पांच संदेश देते हैं। प्रथम दिवस- धन तेरस को धन्वंतरी की पूजा की जाती है। वे
स्वास्थ्य के देवता हैं। अतः इस दिन जलाए जाने वाले दीप अच्छे स्वास्थ्य का संदेश देते हैं । द्वितीय दिवस - रूप चौदस जिसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है इस दिन नरकासुर नामक राक्षस का
वध किया गया था और संपूर्ण जन को राक्षसी चंगुल से मुक्त कर एक स्वच्छ एवं शुद्ध
वातावरण का सृजन हुआ था। इस पर्व को तन एवं मन दोनों की सुंदरता को बढ़ाने वाला
पर्व भी माना जाता है। अतः इसे शुद्धिकरण का संदेश देने वाला दीपक कहा जा सकता है। तृतीय दिवस -
इस दिन गणेश जी (रिद्धि सिद्धि प्रदाता)]
लक्ष्मी (धन की
देवी)] एवं सरस्वती (बुद्धि] विद्या एवं विवेक प्रदान करने वाली) की पुजा की जाती है।
उक्त तीनों ही मानव की सर्वांगीण समृद्धि के द्योतक हैं। अतः दीपावली के दीप से
समृद्धि का संदेश प्राप्त होता है। इस दिन
घर में समृद्धि को प्रकट करने वाली वस्तु का क्रय शुभ माना जाता है। अतः बर्तन] चांदी के सिक्के]
वाहन आदि क्रय किए
जाते हैं। चतुर्थ दिवस - इस दिन गोबर से
निर्मित आकृति बना कर गोवर्द्धन पूजा की जाती है। जो प्रकृति से प्राप्त गाय एवं
उसके उत्पाद जिसे पंचगव्य कहा जाता है प्राकृतिक संसाधन के प्रतीक हैं। अतः गोवर्द्धन पूजा
प्रकृति के संरक्षण का संदेश देती है।
पंचम दिवस - इस दिन बहन के द्वारा भाई की सुरक्षा हेतु व्रत रखा जाता है जो कि
रिश्तों को बनाए रखने का संदेश देता है। अतः भाई दूज के दीप को रिश्तों का दीप मानना चाहिए।
दीपक
कहां कहां जलाते हैं: सामान्यतः हर सनातन परिवार में प्रतिदिन दीपक जलाया जाता है।
पूजनीय एवं श्रद्धा वाले स्थान पर सुबह,
शाम को दीपक जलाया
जाता है। देवताओं] पwजनीय वृक्षों एवं पौधों यथा पीपल] बरगद] बिल्व] शमी] आंवला] तुलसी आदि के समक्ष दीपक जलाये जाते हैं। सनातनी परिवारों
में तो तुलसी के समक्ष दीपक प्रज्वलित किया ही जाता है।
दीपों
के प्रकार: दीपक कई प्रकार के होते हैं। दीपक धातु] मिट्टी, पत्थर आदि से बनाए जाते हैं। दीपावली पर मिट्टी के दीपक जलाने
का प्रावधान है। उसमें तेल या घी का उपयोग किया जाता है। छोटे, बड़े, समोई, आरती आदि दीपक के कुछ प्रकार हैं।
दीपक
प्रज्वलित करने के तरीके: शनिदेव,
पीपल, भैरव आदि के तेल का दीपक जलाए जाने का प्रावधान है। देवी
देवताओं विशेषकर लक्ष्मीजी आदि के घी के दीपक का प्रावधान है। विशेष अवसरों पर आटे
से बने दीपक जलाए जाते हैं जैसे कार्तिक मास में नदी एवं झीलों में आटे से बने दीप
दान किए जाते हैं। आरती में पांच
बत्ती का दीपक जलाया जाता है। कुछ
विद्वानों का मत है कि एक ही स्थान पर घी एवं तेल का दीपक साथ साथ न जलाएं, एक ही प्रकार का दीपक जलाना चाहिए। दीपक जलाते समय भावना
शुद्ध एवं मन में श्रद्धा होनी चाहिए।


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