चंद्रमा
अन्य नाम: चंद्रदेव, सोम, शशि , चांद
माहात्म्य: सनानत धर्म में चंद्रमा को बहुत अधिक महत्व प्राप्त है। ये कई त्यौहारों का आधार हैं। कई अवसरों पर इनकी पूजा की जाती है। सोम के रूप में यह एक महत्वपूर्ण देवता है जो कि रात्रि, वनस्पति, पौधों के अधिपति हैं। नवग्रहों में से एक महत्वपूर्ण ग्रह है। भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित होते हैं। ज्योतिष, हिंदु पंचांग, त्यौहार, व्रत आदि का एक मूल आधार चंद्रमा हैं। इन्हे मानव मन को प्रभावित करने वाला माना गया है। इन्हें लक्ष्मी का भाई माना गया है। चंद्रमा पर अमृत मिलता है जोकि अमरता प्रदाता है। चंद्रमा पर ही पितरों का निवास माना जाता है। सप्ताह का एक दिवस का नाम इसी के नाम पर सोमवार रखा गया है। शिव पुराण के अनुसार शिवजी ने सप्ताह के वारों का नामकरण किया। पहले क्रम में सूर्य ग्रह के वार को रविवार तथा द्वितीय दिवस को अपनी मायशक्ति का वार बनाया अर्थात संपत्ति प्रदान करने वाला है जिसे सोमवार कहा गया। इनकी पूजा अर्चना से संपत्ति की प्राप्ति होती है।
चंद्रकलाओं की पौराणिक कथा: चंद्रमा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र हैं। दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से इनका विवाह हुआ था। इन पत्नियों में चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र से अधिक प्रेम करते थे । दूसरी पुत्रियों ने दक्ष से शिकायत की। दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग का श्राप दिया। श्राप के प्रभाव के कारण उनकी आकृति घटने लगी। चंद्रमा ने शिवजी से प्रार्थना की। शिवजी ने वरदान दिया कि कृष्णपक्ष के 15 दिवस में चंद्रमा क्षीण होता जाएगा एवं अमावस्या को पूर्ण रूप ये अदृश्य हो जाएगा तथा शुक्ल पक्ष के 15 दिवस में वह बढ़ता जाएगा एवं पूर्णिमा के दिन पूर्णचंद्र हो जाएगा। इन्हें ही चंद्रकलाएं कहा जाता है। भगवान शिव ने श्राप के प्रभाव को कम करने एवं चंद्रमा को अमर कर देने के लिए उसे क्षीण अवस्था में अपने मस्तक पर धारण कर लिया।
चंद्रमा और नक्षत्र: चंद्रमा वर्ष भर में अंतरिक्ष में स्थित 27 नक्षत्रों के सामने से होकर गुजरता है। ये नक्षत्र अंतरिक्ष में अत्यंत दूर स्थित तारा समूह हैं। समूह के तारे एक विशेष आकृति में व्यवस्थित होते हैं जिनका कि पौराणिक पात्रों, जीवों, वस्तुओं पर नामकरण किया गया है। चंद्रमा लगभग 27.3 दिनों में एक चक्कर पूर्ण करता है। इस प्रकार चंद्रमा का नक्षत्रों से संबंध है इसलिए यह ज्योतिष शास्त्र के अंतर्गत बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
चंद्रमा, व्रत, उपवास एवं त्यौहार: लगभग सभी सनातनी त्यौहार चंद्रमा की स्थिति पर आधारित होते हैं। चंद्रमा के घटने बढ़ने की स्थिति को दो पक्ष में विभाजित किया गया है। बढ़ती हुई अवस्था को शुक्ल पक्ष(एकम से पुर्णिमा तक 15 दिवस) एवं घटती हुई अवस्था को कृष्ण पक्ष(पूर्णिमा के अगले दिन से अमावस्या तक 15 दिवस) कहा जाता है। शुक्ल पक्ष को शुभ कार्यों के लिए अच्छा माना जाता है। घटने एवं बढ़ने की अवधि को तीस दिवस में विभाजित किया गया है और प्रत्येक दिवस को एक तिथि निर्धारित है। एक पक्ष में पंद्रह तिथियां होती हैं। मुख्य तिथियों पूर्णिमा(पूर्ण चंद्र), अमावस्या (चंद्रमा नहीं दिखता), चौथ , अष्ठमी, ग्यारस आदि प्रमुख हैं। हर तिथि के साथ कोई न कोई त्यौहार, व्रत, उपवास, जुड़ा है। दीपावली, होली, रक्षाबंधन, नवरात्रि, शरदपूर्णिमा, करवा चौथ, गणेश चतुर्थी ,महाशिवरात्रि, राम नवमी, कृष्ण जन्माष्ठमी आदि कुछ महत्वपूर्ण त्यौहार हैं जो चंद्रमा की गति एवं स्थिति के आधार पर निर्धारित तिथियों पर आते हैं। चूंकि त्यौहारों का आयोजन तिथि के आधार पर होता है और तिथि का प्रारंभ एवं अंत चंद्रमा की गति एवं उसकी सापेक्ष स्थिति पर निर्भर करता है अतः कई पर विभिन्न मत होने के कारण कोई कोई त्यौहार दो दो बार होता है जिससे भ्रम की स्थिति बनती है। लेकिन चूंकी त्यौहार तिथि के अनुसार ही निर्धारित होते हैं अतः उनके लिए कोई अंग्रेजी केलेंडर की तिथि निर्धारित किया जाना संभव नहीं है।
चांदनी: चंद्रमा से प्राप्त होने वाला प्रकाश चांदनी कहलाता है। उसमें शीतलता होती है जो बहुत प्रिय लगती है। वस्तुतः सूर्य एक आग का गोला है जो स्वयं प्रकाश उत्पन्न करता है। सूर्य का प्रकाश जब चंद्रमा पर गिरता है और उससे पराविर्तित होकर वह पृथ्वी पर आता है तो उसमें ऊष्णता उत्पन्न करने वाली किरणों की कमी होती है इससे वह शीतलता प्रदान करता है। शरद पूर्णिमा की रात को दूध या उसकी खीर चांदनी में रखी जाती है और ऐसी मान्यता है कि वह दूध न केवल शीतलता प्रदान करता है अपितु आँखों के लिए भी लाभप्रद होता है।
चंद्रकलाओं का खगौलीय कारण: चंद्रमा के आधे भाग पर सूर्य का प्रकाश निरंतर गिरता है। लेकिन पृथ्वी, सूर्य एवं चंद्रमा की सापेक्ष स्थिति के कारण चंद्रमा का चमकीला भाग कम या अधिक दिखाई देता है। जो कि प्रति दिन घटता या बढ़ता जाता है। इसे ब्रह्मा के श्राप से जोड़ा गया।
सूर्य एवं चंद्र ग्रहण: जब कभी पृथ्वी, चंद्रमा एवं सूर्य एक सीध में आ जाते हैं तो ग्रहण होता है। जब पूर्णिमा के दिन पृथ्वी, चंद्रमा एवं सूर्य के बीच आ जाती है तो पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर गिरती है जिससे चन्द्रमा का वह भाग आँखों के सामने नहीं रहता , इसे ही चंद्र ग्रहण कहते हैं । जब अमावस्या के दिन पृथ्वी एवं सूर्य के बीच चंद्रमा आ जाता है तो चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर गिरती है और सूर्य का वह भाग अस्थाई रूप से ओझल हो जाता है , जिससे सूर्य ग्रहण होता है। पुराणों में इसकी कथा अलग है जिसमें यह बताया गया है कि राहु एवं केतु के कारण ग्रहण होते हैं। समुद्र मंथन में अमृत निकला जिसे स्वरभानु नामक दानव ने देवताओं की पंक्ति में बैठकर पी लिया। चंद्रमा एवं सूर्य ने उसे पहचानकर भगवान विष्णु को बता दिया। विष्णुजी ने सुदर्शन चक्र से उस दानव का सिर धड़ से अलग कर दिया। परंतु चूंकि वह अमृत पान कर चुका था इसलिए उसके दोनों भाग अमर हो गए। सिर को राहु और धड़ को केतु नाम दिया गया। राहु और केतु सूर्य एवं चंद्र को दुश्मन मानने लगे। अतः जब राहु सूर्य को निगलने लगता है तो सूर्यग्रहण होता है। तथा जब केतु चंद्रमा को निगलता है तो चंद्रग्रहण होता है परंतु दानव पूर्ण शरीर में नहीं होता है अतः सूर्य और चंद्रमा उनमें से पुनः बाहर आ जाते हैं। राहु एवं केतु 180 डिग्री पर स्थित हैं वे सदैव इसी स्थिति में चलायमान हैं। वस्तुतः ये दोनों ग्रह कोई ठोस खगौलीय पिंड न होकर काल्पनिक ग्रह हैं। राहु एवं केतु वस्तुतः छाया ग्रह हैं। जब पृथ्वी की छाया पूर्णिमा को चंद्रमा पर गिरती है तो चंद्रग्रहण होता है इसी छाया को केतु कहते हैं। इसी प्रकार जब चंद्रमा की छाया अमावस्या को सूर्य पर गिरती है तो सूर्यग्रहण होता है इसी छाया को राहु कहते हैं। इन छायाओं को पुराणों में कथाओं से समझाया गया।
चंद्रमा की उत्पत्ति पुराणों एवं आधुनिक विज्ञान के आधार पर: भगवान शिव (ब्रह्म) एवं शक्ति (ऊर्जा) के आनंद तांडव नृत्य के दौरान शिवजी के नेत्रों से निकली ऊर्जा सूर्य एवं पार्वती की देह से निकली शीतल ऊर्जा से चंद्रमा बने। अर्थात सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मांडीय उद्वेलन से जो उथल पथल हुआ उसी से चंद्रमा एवं सूर्य का भी निर्माण हुआ। स्पष्ट है पौराणिक कथाएं भी इसी ओर संकेत करती हैं।
एक कथा और है, समुद्र मंथन से निकले विष को शिवजी ने पी लिया एवं उसकी गर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए शीतल चंद्र को मस्तक पर धारण कर लिया। यह कथा भी यही संकेत करती है कि सूर्य, चंद्र, पृथ्वी आदि सभी खगोलीय पिंडों का अस्तित्व ब्रह्मांडीय अंतःक्रिया का ही परिणाम है।
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