सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

तुलसी : एक पावन एवं विश्व कल्याणी वनस्पति , Tulasi किसका प्रतीक है? घर में तुलसी विवाह

 तुलसी  एवं घर में तुलसी विवाह 


                                 तुलसी विवाह

अन्य नाम: वृंदा, सुगंधा, अमृता, वैष्णवी, पावनी, विष्णुप्रिया, माधवी

तुलसी के प्रकार: तुलसी के बारह प्रकार हैं।  सामान्यतः मुख्यतः  तीन प्रकार की  है। 1. राम(श्वेत ) तुलसी, इसका तना हरा होता है। 2. श्याम(कृष्ण) तुलसी, इसका तना गहरा बैंगनी होता है तथा पत्ते भी बैंगनी आभा लिए होते हैं। 3. वन तुलसी, यह वन में अपने आप उग आती है।

माहात्म्य: तुलसी की उत्पत्ति की अनेक कथाएं हैं।  

कथा 1 . यह  कथा शिव पुराण में है जो इस प्रकार से है। दानवराज शंखचुड़ ने ब्रह्माजी की  कठोर तपस्या कर वर प्राप्त किया कि वह देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने उसे बदरीवन में तपस्या कर रही तुलसी से विवाह करने हेतु प्रेरित किया। वह वहां पहुंचा और उसने तुलसी से कहा कि वह दनु पुत्र दानव है, वह पूर्वकाल में श्रीकृष्ण का सखा सुदामा था। तुलसी उससे प्रभावित हो गई। ब्रह्मा के कहने पर उसने तुलसी से गंधर्व विवाह कर लिया। शंखचुड़ ने देवताओं को तंग कर दिया। देवताओं ने रुद्र से प्रार्थना की। कई युद्ध किए गए। परंतु शंखचूड बस में नहीं आ रहा था। शंखचूड़ के पास श्रीहरि द्वारा दिया गया  उग्र कवच रहने तक एवं पतिव्रता पत्नी तुलसी का सतीत्व अखण्डित रहने तक  उस  पर वृद्धावस्था एवं मृत्यु अपना प्रभाव नहीं डाल सकती  थी । शिवजी की प्रेरणा से विष्णु ने वृद्ध ब्राह्मण बनकर शंखचूड़ से दान में कवच मांग लिया एवं बाद में शंखचूड़ का छद्मरूप धारण कर तुलसी का शीलहरण कर लिया। तुलसी का सतीत्व एवं कवच के न रहने से  शिवजी के त्रिशूल से उसका वध हुआ। शंखचूड़ की हड्डियों से शंख जाति का प्रादुर्भाव हुआ। शिवजी के वर से वे तुलसी का पौधा हो गई। उन्हें सदा श्रीहरि के साथ रहने का वर मिला। 

 कथा 2  - समुद्र मंथन में अमृतकलश निकला।  इससे देवताओं के परिश्रम के सफल होने से उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली। अश्रु बुँदे जहाँ गिरी वहां तुलसी के पौधे उग आये। 

कथा 3 . राक्षस कुल में असुर कालनेमि पुत्री का नाम वृंदा था। वृंदा के पति का वध भगवान शिव ने किया । वृंदा सती हो गई। वृंदा की राख से तुलसी का पौधा बना। तुलसी भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी। तुलसी को भगवान विष्णु के बराबर होने का वरदान मिला। 

कथा ४.  तुलसी ने  गंगा तट पर तपस्यारत गणेशजी को देखा। वे उनपर मोहित  हो गईं। उन्होंने गणेश जी के समक्ष उनसे विवाह की ईच्छा व्यक्त की। गणेशजी ने ब्रह्मचर्य का कहकर अस्वीकार कर दिया। क्रोध में आकर तुलसी ने गणेशजी को दो विवाह होने का श्राप दे दिया।   

 जिस घर में तुलसी का पौधा होता है वह तीर्थरूप होता हैं। पद्मपुराण में उल्लेख  है कि तुलसी की गंध जहाँ जहाँ जाती है वहां की वायु तत्काल शुद्ध हो जाती है। पद्मोत्तर पुराण के अनुसार जिस घर के द्वार पर तुलसी का बगीचा रहता है वह घर तीर्थ के समान पवित्र हो जाता है। इससे वहां पर यमदूत अर्थात तरह तरह की प्राणघातक व्याधियां नहीं आ सकती। तुलसी का पौधा घर में नकारात्मकता को दूर रख कर सकरात्मक ऊर्जा का संचार करता है।    

पूजन में उपयोग: भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होने से उसे पूजन में विष्णु के स्वरूपों पर अवश्य  चढ़ाया जाता है। तुलसी की मंजरी भी चढ़ाई जाती है। 

भगवान को अर्पित किए  जाने वाले पुष्प, भोग , आभूषणों आदि सभी से  भी बड़ा है तुलसीपत्र। एक कथा है इसकी। श्रीकृष्ण के धर्मपत्नी सत्यभामा ने उनको तराजू के एक पलड़े में बैठाकर दूसरे पलड़े में अपने गहने आदि सब रख दिए  परन्तु जिस पलड़े में कृष्ण बैठे थे वह उठा ही नहीं। तब श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मणी ने गहनों के ऊपर एक तुलसी पत्र रख दिया, तराजू संतुलित हो गई।   

 सभी प्रकार के  तुलसी को घर के आंगन में लगाया जाता है और दैनिकरूप उसमें जल चढ़ाया जाता है एवं दीपक लगाया जाता है। सनातनी  घरों में तुलसी का क्यारा अवश्य  होता है।

तुलसी के औषधीय  उपयोग: एंटीबैक्टीरियल , एंटीफंगल और एंटीवायरल गुण पाए जाते हैं। तुलसी पत्र रोगप्रतिरोधक प्रणाली को प्रबल बनाती है। 

तुलसी में  पंचामृत में तुलसी पत्र भी रखा जाता है। तुलसीदल युक्त जल में संक्रमण से बचाव के गुण होते हैं इसीलिए शुद्ध जल में तुलसी पत्र रखकर वह सुगंधित जल चरणामृत के रूप में मंदिरों में भक्त ग्रहण करते हैं। 

आयुर्वेद में तुलसी को सर्वोत्तम औषधियों में माना जाता है। तुलसी का उपयोग औषधी के रूप में बहुत होता है। त्रिभुवनकीर्ति रस नामक औषधी में तुलसी ही होती है। खांसी के सिरप में भी उपयोग होता  कुष्ठरोग, शक्ति, रतौंधी, जुकाम, नामर्दी, वातरोग, मलेरिया,  हल्का ज्वर, इन्फ्लुएंजा , किडनी की पथरी दूर करने , सिरदर्द, मधुमेह , पेटदर्द ,  पीलिया , आदि में उपयोग होता है।

होमिओपेथिक दवाइयों में भी तुलसी का उपयोग होता है। श्याम तुलसी सौंदर्यवर्धक मानी जाती है। चेहरे की काली झाइयां , मुहांसे दूर करने में भी सहायक है। 

तुलसी विद्युत अवरोधक है: इस मान्यता के कारण ही तुलसी की लकड़ी से बनी माला, मजरा, पायजेब, करधनी पहनने का चलन रहा है।

पर्यावरणीय गुण: तुलसी की गंध किटाणुओं को नासिका में प्रवेश  करने से रोकती है। यह एक प्राकृतिक वायु शोधक पौधा है। यह पौधा दिन और रात दोनों समय ऑक्सीजन बनाता है। कार्बन डाई ऑक्साइड और सल्फर डाई ऑक्साइड जैसी विषाक्त गैसों का अवशोषण कर वातावरण को शुद्ध करता है। यह वायुमें उपस्थित अति सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। 

उक्त समस्त कारणों से ही तुलसी को परम पावन और जगत कल्याणी कहा जाता है। 

तुलसी को न तोड़ना अक्षम्य है: संक्रांति, चतुर्दशी , द्वादशी , पातपर्वों, शुक्रवार, मंगलवार, अपरान्हकाल, सूर्य एवं चंद्रग्रहण, जननाशौच(सूतक ), मरणाशौच(मारक /सूतक ) के दिनों में तुलसी का तोड़ना वर्जित है।

तुलसी के व्रत-अनुष्ठान: तुलसी विवाह - भगवान के श्रीविग्रह शालग्राम के साथ तुलसी का विधिवत विवाह कराया जाता है। वैसे तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक कभी भी शुभ मुहूर्त में किया जा सकता है ,  लेकिन अधिकाशं भक्त इसे देवउठनी एकादशी को करते हैं। कई लोग तुलसी विवाह अपनी पुत्री के विवाह के समान भव्यता के साथ करते हैं।  बड़े भौज तक आयोजित करते हैं। घर में तुलसी विवाह की संक्षेप में विधि आगे दी जा रही है।  तुलसी विवाह का पर्व गहरी आस्था , प्रेम ,  त्याग ,  प्रकृति के प्रति गहरी निष्ठां, आदर , एवं श्रद्धा का प्रतीक है। 

तुलसीवास - कार्तिक शुक्ल पक्ष में नवमी को यह वास किया जाता है।

लक्षतुलसीदलार्पण व्रत - कार्तिक या माघ मास में तुलसीदल से प्रारंभ कर माघ या वैशाख में उद्यापन किया जाता है। कुल सौ दिवस में प्रत्येक दिन विष्णुसहस्रनाम के साथ एक एक पत्र अर्पित कर कुल एक लाख तुलसीदल अर्पित किए जाते हैं।

श्राद्ध - ऐसी मान्यता है कि तुलसी वन में श्राद्ध करने से पितरों को शांति तथा तृप्ति प्राप्त होती है। 

घर में तुलसी विवाह की विधि संक्षेप में 

पूजन सामग्री : शालिग्राम या विष्णु या कृष्ण की मूर्ति , तुलसी का पौधा , नारियल , कपूर , धूप , अगरबत्ती ,चन्दन , सुहाग की सामग्री (चूड़ी, सिंदू , मेहंदी , बिंदी, काजल  आदि ) 

विवाह विधि :तुलसी विवाह में तुलसी का विवाह शालिग्राम या विष्णुजी के अवतार श्रीकृष्ण के साथ सामान्यतः शायंकाल शुभघड़ी  में किया जाता है। कन्यादान करने वाले घर वालों को नए वस्त्र पहनकर उस दिन उपवास रखना चाहिए। कन्यादान के बाद उपवास खोल सकते हैं। तुलसी के गमले को आँगन में रखकर उसमें एक गन्ना गाढ़कर उसपर चुनरी औढ़ाकर मंडप का रूप दे दें। गमले में श्रीविग्रह शालिग्राम को विराजित करें हुए उनपर एवं  तुलसी पर हल्दी चढ़ाएं( हल्दी की रस्म ) . तुलसी के पौधे पर लाल वस्त्र या चुनरी ओढ़ाएं। सुहाग की सामग्री अर्पित करें।  फलफूल चढ़ाएं। कन्यादान करने वाला पुरुष शालिग्रामजी  को दोनों हाथ में श्रद्धापूर्वक उठाकर तुलसी के पौधे की क्लॉकवाइज दिशा में सात परिक्रमा लगाएं (फेरों की रस्म )  फेरों की अवधि  में परिवार के सदस्य सिंदूरी रंग में रंगे  हुए अक्षत (पूर्ण चावल )   शालिग्राम  एवं तुलसाजी पर चढ़ाते जाएं। अब माता तुलसी और शालिग्राम प्रभु की कर्पूर प्रज्वलित कर आरती करें । जयकारें लगाएं। भोग लगाएं । प्रसाद वितरण करें।

अंत में एक टिप्पणी : जबतक तुलसी पवित्र  थी अर्थात उसका ध्यान रखा जा रहा था एवं उसका औषधीय उपयोग हो रहा था तब तक तीनों व्याधियां शंखचूड़ से दूर थीं।  त्रिशूल स्वरुप तीनों व्याधियों ने उसे समाप्त कर दिया क्योंकि औषधि नहीं रही थी।   



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