रविवार, 19 अक्टूबर 2025

माँ सरस्वती Ma Saraswati/Basant Panchami दीपावली के दिन पूज्य गणेशजी लक्ष्मीजी के साथ पूज्य विद्या की देवी/बसंत पंचमी की आराध्य देवी

  मां सरस्वती एवं बसंत पंचमी 

अन्य नाम: शारदा, वीणाधारिणी, वागेश्वरी, भारती, हंसवाहिनी, वाग्देवी, शुभदा, सौम्या 

मां सरस्वती की छवि: सामान्यतः मां सरस्वती के चित्र में उन्हें श्वेत कमल पर बैठी हुई, वीणा हाथ में लिए हुए, श्वेत वस्त्रों में, पास में धवल हंस बैठा हुआ, दिखाया जाता है।

सरस्वती का अर्थ: स्व के सार का बोध कराने वाली। वह देवी हैं आध्यात्मिक ज्ञान एवं विवेक की। वह शक्ति हैं सृष्टि रचयिता ब्रह्मा की जिनको की ब्रह्मांड की रचना करने के लिए समस्त प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता होती है। वे विद्या, वाणी, कला, कौशल, बुद्धि, की देवी हैं।

श्वेत वस्त्र: उनके श्वेत वस्त्र शुद्धता को व्यक्त करते हैं, ज्ञान बिना भ्रांति एवं मिथ्याबोध के शुद्ध एवं पवित्र होना चाहिए। 

वीणा: एक हाथ में वीणा प्रतीक है आनंद, तारतम्यता, समरसता एवं तादात्म्य की। जो कि ज्ञान एवं विवेक से प्रस्फुटित होते हैं। 

श्वेत हंस: हंस द्योतक है विभेदीकरण बुद्धि का, अर्थात् सत्य ज्ञान को ग्रहण करना एवं असत्य को त्याग देना। हंस के लिए ऐसा माना जाता है कि वह पानी में से दूध को पृथक करने की क्षमता रखता है।

मयूर: किसी चित्र में मयूर भी दिखाया जाता है जो कि पूर्ण सुंदरता का द्योतक है। पूर्ण सुंदरता विवेक में अंतर्निहित होती है।

पूर्ण विकसित श्वेत कमलासन: यह अभिव्यक्त करता है चिद्क्तिश  अर्थात शुद्ध चेतना को, जो कि सद्-चित-आनंद का मध्य शब्द है। विवेक प्राप्ति हेतु शुद्ध चेतना एक सशक्त मूलाधार है।

चार हाथ: ये प्रतीक हैं हमारे मस्तिष्क के चार पक्षों मन, बुद्धि, अहंकार एवं चित्त के।

नवरात्रि: नवरात्रि के अंतिम तीन दिन मां सरस्वती को समर्पित हैं। योग साधना के अंतिम तीन दिनों में साधक विवेक को प्राप्त कर लेता है।

आभा मंडल: मां सरस्वती के चारों ओर प्रदर्शित आभा मंडल  ज्ञान एवं विवेक के प्रसार को दर्शाता है। 

एक हाथ में पुस्तक(वेद): वेद पूर्ण एवं शुद्ध ज्ञान को प्रतिबिंबित करते हैं।

बसन्त पंचमी: माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी मनाई जाती है। पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन माँ सरस्वती का प्राकट्य  हुआ था। जब सृष्टि के प्रारम्भ में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में नीरवता व्याप्त थी तब भगवान ब्रह्मा के द्वारा अपने कमण्डल में  से जल छिड़कने से माँ सरस्वती प्रकट हुई थी। यह दिन विद्या और सृजन कार्य से सम्बद्ध व्यक्तियों यथा विद्यार्थियों, शिक्षकों, साहित्यकारों,संगीतकारों, कलाकारों आदि हेतु अत्यंत शुभ माना जाता है। विद्यालयों में भी माँ सरस्वती का पूजन किया जाता है। सन 1960 से पहले बचपन में हमें विद्यालयों में पीले रंग के वस्त्र पहन कर जाना होता  था।  बंगाल में तो यह दिन बहुत ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन विद्या आरम्भ , अन्नप्राशन , और अन्य शुभ कार्य प्रारम्भ करना श्रेष्ठ  माना जाता है। गृह प्रवेश , विवाह हेतु यह अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन माँ सरस्वती की आराधना करने से ज्ञान , बुद्धि और विवेक का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 

इस दिन पीले रंग का अत्यधिक महत्व है। खेतों में सरसों के पीले फूल खिले हुए होते हैं। सभी देवी देवताओं का पीले रंग की सामग्री से शृंगार किया जाता है। पीले रंग के मिष्ठान का भोग लगाया जाता है। घरों में भी पीले रंग की भोजन सामग्री की प्रचुरता होती है।  

सनातन धर्मावलम्बियों को घर में बच्चों से माँ सरस्वती के पास पाठ्य पुस्तकें और अन्य पाठ्य सामग्री रखकर उन का पूजन अवश्य करवाना चाहिए और "हे माँ सरस्वती मुझे   विद्या , ज्ञान ,  बुद्धि और विवेक प्रदान कर "  बोलकर प्रार्थना करने हेतु प्रेरित करना चाहिए। 

यह त्यौहार केवल ऋतु परिवर्तन ही नहीं अपितु जीवन में नई ऊर्जा , आशा, और सृजन का प्रतीक है। 


                                                                 




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