द्वितीय प्रकरण: श्री हनुमान जी
हनुमानजी के अन्य प्रमुख नाम: मारूति-नंदन, पवन-सुत, महावीर, बजरंग बली, राम दूत, केसरी नंदन, आदि
नाम का माहात्म्य : हनु का अर्थ होता है ठोड़ी / नीचे का जबड़ा। हनुमानजी का जबड़ा चेहरे से आगे उठा हुआ है अतः उनका नाम हनुमान पड़ा। वे पवन के पुत्र हैं अतः उन्हें मारुतिनंदन, पवनसुत भी कहते हैं। उनके अंग वज्र के समान कठोर हैं अतः वे वज्रअंग कहलाए, अपभ्रंश होकर बजरंग हों गया।
हनुमानजी की प्रस्तुत की जाने वाली प्रमुख छवियां: 1. पर्वत हाथ में लेकर उड़ते हुए, 2. सीना चीर कर श्रीराम-सीता की छवि दिखाते हुए 3. राम दरबार में शांति से कार्य करने के लिए तत्पर बैठे हुए
हनुमानजी प्रतीक हैं: वे अवतार हैं शिव के। वे वनों में रहने वाले वनवासी मानव हैं। प्रतीक हैं सेवा, भक्ति और समर्पण के।
अर्द्धमानव स्वरूप: उनको दिखाया जाता है एक अर्द्धमानव स्वरूप में परंतु वस्तुतः उनके गुण अतिमानव/देवता के है
लंबी पूंछ: वस्तुतः उनके वानर होने का द्योतक नहीं अपितु उस वनवासी समाज के साथ जुड़ी पूंछनुमा पहचान का द्योतक है जिस का वे प्रतिनिधित्व करते हैं । वो पूंछ उन वनवासियों की पहचान थी जो कि बनावटी होती थी। वो उनको अत्यंत प्रिय होती है। उस प्रतीक का कोई अपमान सहनीय नहीं होता है। क्या कोई भी वानर जनेऊ पहनेगा? क्या वह विद्यावान एवं गुणी हो सकता है?
शक्ति एवं भक्ति के प्रतीक:वे प्रतीक हैं असीमित शक्ति, भक्ति, साहस, निडरता एवं वीरता के।
समर्पण के प्रतीक: अपने आराध्य के प्रति समर्पित, हर परिस्थिति में उनकी सेवा में सदा तत्पर रहने वाले।(राम-दूत/रामदास)
प्रतीक हैं: बुद्धि, सत्य भाषण, ज्ञान के भंडार के।
पर्वत को उठाकर ले जाने वाली छवि: अपने प्रभु/स्वामी द्वारा सौंपे गए साध्य/असाध्य/कठिन कार्य को करने के लिए तत्पर रहने की द्योतक।
हाथ में गदा: आसुरी शक्तियों के विनाश हेतु। अर्थात् मन की दुष्प्रवृतियों पर नियंत्रण।
सीने में सीता-राम की छवि: अहंकार रहित होेकर अपने प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण का द्योतक।
राम दरबार में राम के चरणों में बैठी हुई छवि: यह छवि द्योतक है सेवक की। सत्य के प्रति समर्पित शांत, नियंत्रित एवं एकाग्र मस्तिष्क की। उनकी बैठने की स्थिति इस बात की द्योतक है कि वे श्रीराम का आदेश मिलते से ही तत्काल खड़े हो सकें । इस इस तरह बैठने का नाम ही हनुमान बैठक पड़ गया है।
मारूति नंदन: मारूत के पुत्र के रूप, प्रतीक हैं प्राणायाम की शक्ति के। प्राणायाम एवं मस्तिष्क सीधे जुड़े हुए हैं।
सीता का पता लगाना: यह प्रतीक है नियंत्रित एवं शांत मस्तिष्क का जो घोर जंगल में भी सीता(शुद्ध बुद्धि) को खोज लेता है। अर्थात् स्वयं की आंतरिक छुपी हुई क्षमता को पहचानना।
(यदि हम हनुमान चालीसा पर विचार करें तो हम पाते हैं कि वह हनुमानजी रूपी प्रतीक के गुणों से हमें अवगत कराती है। )
प्रस्तुति: दुष्यन्त अग्रवाल
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