श्रीगणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा (शिवपुराण से संक्षेप में)-
श्वेतकल्प में पार्वतीनंदन का मस्तक शिवजी ने त्रिशूल से अलग कर दिया तो संपूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया और प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया। तब जगदंबा को प्रसन्न करने के लिए गज का मस्तक लगाकर पार्वती पुत्र को पुनर्जीवित कर दिया गया। ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश ने उस बालक को सभी गणों का सर्वाध्यक्ष घोषित कर दिया। इस प्रकार वे गणेश या गणपति हो गए।
श्रीमहादेव ने गजानन को वर दिया “विघ्ननाश के कार्य में तेरा नाम सर्वश्रेष्ठ होगा। तू सबका पूज्य है, अतः अब मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा। गणेश्वर ! तू भाद्रपदमास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथी को चन्द्रमा का शुभोदय होने पर उत्पन्न हुआ है। जिस समय गिरिजा के सुन्दर चित्त से तेरा रूप प्रकट हुआ, उस समय रात्रि का प्रथम प्रहर बीत रहा था। इसलिए उसी दिन से आरम्भ करके उसी तिथि में प्रसन्नता के साथ(प्रतिमास) तेरा उत्तम व्रत करना चाहिए। वह व्रत परम शोभन तथा संपूर्ण सिद्धियों का प्रदाता होगा।”
“ जो मनुष्य नाना प्रकार के उपचारों से भक्तिपूर्वक तेरी पूजा करेंगे, उनके विघ्नों का सदा के लिए नाश हो जाएगा और उनकी कार्यसिद्धि होती रहेगी। सभी वर्ण के मनुष्यों को, विशेषकर स्त्रियों को यह पूजा अवश्य करनी चाहिए तथा अभ्युदय की कामना करने वाले राजाओं के लिए भी यह व्रत आवश्यक कर्तव्य है। व्रती मनुष्य जिस-जिस वस्तु की कामना करता है, उसे वह वस्तु अवश्य प्राप्त हो जाती है। अतः जिसे किसी वस्तु की अभिलाषा हो, उसे तेरी सेवा अवश्य करनी चाहिए।”
गणेश पुराण में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भी मध्यान्ह काल में श्रीगणपति पूजन का माहात्म्य बताया गया है। चूँकि श्रीगणेश का प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्यान्हकाल में हुआ था अतः यह तिथि अत्यंत फलदायिनी है एवं इस दिन मध्यान्ह में गणेषजी की मूर्ति की उपासना की जानी चाहिए।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें