भगवान शिव
भगवान शिव के अन्य नाम: शंकर, महादेव, भोलेनाथ, महेश , रुद्र, उमापति, नीलकंठ आदि
शिवजी की छवियां: नटराज, अर्द्धनारीश्वर , पंचानन
शिवजी प्रतीक हैं: ईश्वर के तीन प्रमुख स्वरूपों में से एक स्वरूप के। वे विघटन के प्रतीक हैं प्रत्येक नवीन निर्माण के लिए विघटन आवश्यक है, जीवन है तो मृत्यु भी निश्चित है, विघटन होगा तभी नया निर्माण भी होगा। इस कारण भगवान शिव को भ्रम स्वरूप संहारक की संज्ञा दे दी गई है जो कि काफी रूढ़ हो गई है, इसे तौड़ना बहुत ही कठिन है। शिवजी ही वह कारण हैं जो विघटन की प्रक्रिया को संभव बनाता है। विघटन निर्माण की आवश्यक प्रक्रिया है। वस्तुतः शिवजी को रक्षक माना जाना चाहिए न कि संहारक।
शिवजी की बैठी हुई छवि: ध्यानावस्था में बैठी हुई छवि सर्वाधिक प्रचलित छवि है जो उनके आदि योग गुरु स्वरूप को दर्शाती है। शरीर पर न्यूनतम वस्त्र, न्यूनतम अलंकार, भभूति से ढंका शरीर, लंबे बालों की जटा आदि उनके आत्यधिक सरल एवं मितव्ययी स्वरूप जो कि एक योगी का होना चाहिए उसे दर्शाते हैं। वे तपस्या, वैराग्य एवं ज्ञान के द्योतक हैं। वे सदैव ब्रह्मांड के कल्याण के लिए ध्यानस्थ रहते हैं। जो ब्रह्मांड के कल्याण के लिए ध्यानस्थ रहे उसे संहारक मानना कहां तक उचित है?
जटा से निकलती गंगा: जटा से निकलती दिखाई दी जाने वाली गंगा की धारा अंतरिक्ष से पृथ्वी की ओर प्रवाहित होती चिद्शक्ति /विवेक का द्योतक है। गंगा कल्याण का प्रतीक मानी जाती है। कल्याण की भावना के माध्यम से ही विवेक /सच्ची बुद्धि का प्रादुर्भाव होता है।
चंद्रमा: चंद्रमा मस्तिष्क पर पूर्ण नियंत्रण का द्योतक है। चंद्रमा शीतलता प्रदान करता है और कोई भी सही निर्णय ठंडे/शांत मस्तिष्क से ही लिया जा सकता है।
तृतीय नेत्र: यह नेत्र सामान्यतः बंद रहता है। वह द्योतक है शुद्ध ज्ञान/विवेक का, जब वह खुलता है तो संपूर्ण अंतद्र्वंद, काम आदि को भस्म कर देता है।
भस्म: संपूर्ण शरीर पर लगी भस्म इस तथ्य की द्योतक है कि विघटन के पश्चात संपूर्ण सांसारिक इच्छाएं विलुप्त होकर केवल आध्यात्मिक संपति ही शेष रहती है।
नीलकंठ: कंठ का नीला होना शिवजी का संसार के कल्याण के प्रति समर्पण का द्योतक है जो विश्व के लिए हानिकारक विषाक्त तत्वों को अपने कंठ में ही रख लेते हैं।
त्रिशूल : यह द्योतक है कि शिवजी त्रिगुण सत, रज एवं तम से परे हैं । चेतना के तीनों स्तरों से परे हैं। भूत, वर्तमान एवं भविष्य से परे हैं। वात, पित्त एवं कफ के नियंत्रक हैं।
डमरू: यह ध्यान देने योग्य है कि ब्रह्मांड का संपूर्ण अस्तित्व उसमें व्याप्त लयबद्धता के कारण है। डमरू लयबद्धता को दर्शाता है। इसके द्वारा शिवजी कॉस्मिक लय को बनाए रखते हैं जिससे ब्रह्मांड अपनी गत्यात्मकता एवं संतुलन को बनाए रखता है।
नागों के आभूषण: यह कुंडलिनी शक्ति का द्योतक होने के साथ ही यह भी बताता है कि शिवजी पर विष का असर नहीं होता ।
नंदी: नंदी वाहन के साथ साथ धर्म एवं आनंद का भी द्योतक है।
बाघांबर: बाघांबर अहंकार एवं निम्न प्रकृति को नियंत्रित करने की ओर संकेत करता है।
नटराज: शिवजी की नृत्य की मुद्रा इस बात का प्रतीक है कि ब्रह्मांड निरंतर गत्यात्मक है लेकिन संतुलित है।
अर्द्धनारीश्वर : ब्रह्मांड की निरंतरता के लिए पुरूषोचित एवं स्त्रियोचित गुणों का साथ साथ होना आवश्यक है। हर मानव में दोनों प्रकार के गुण होते हैं।
शिव मानस पूजा की स्तुति में एक श्लोक का अर्थ उनकी छवि को बहुत ही सुंदर रूप में प्रस्तुत करता है:
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं ग्रहं।
पूजा ते विषयोगपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः।।
संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो।
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्।।
भावार्थ: आप मेरी आत्मा हैं, आपकी पार्वतीजी मेंरी बुद्धि हैं, आपके गण मेंरे प्राण हैं, मेरा यह शरीर आपका मंदिर है, संपूर्ण विषय भोग की रचना आपकी पूजा है, मैं सोता हूं तो वह आपकी ध्यान समाधि है, मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है, मेरी वाणी से निकला प्रत्येक उच्चारण आपके स्तोत्र व मंत्र हैं। इस प्रकार मैं आपका अनन्य भक्त जिन जिन कर्मों को करता हूं वह सब कुछ आपकी आराधना ही है।
शिवजी की छवि को एवं उनके प्रतीकों को रूद्राष्टकम में बहुत अच्छे से स्पष्ट किया गया है।
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