अन्य नाम: नारायण, बालाजी, लक्ष्मीपति, जगदीश , सत्यनारायण, शेषशायी, पीतांबरधारी, कमलापति आदि।
भगवान विष्णु की प्रमुख छवियां: भगवान सत्यनारायण, शेषनाग पर लेटी हुई मुद्रा, खड़ी हुई मुद्रा आदि
नाम का माहात्म्य: शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव ने अपने बाएं अंग से विष्णुजी को प्रकट किया। विष्णु ने विनति की कि स्वामी मेरा नाम निश्चित कीजिए। शिवजी ने कहा कि तुम्हारे अनेक नाम होंगे लेकिन चुंकि तुम व्यापक हो अर्थात संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त हो अतः तुम्हे विष्णु नाम से जाना जाएगा। शिवजी ने उन्हें वेदों का ज्ञान दिया और कहा कि तुम्हारे समस्त दायित्वों के संपादन के लिए तुम तप करो। विष्णुजी ने सागर जल में रहकर कठोर तपस्या की। नार अर्थात जल में रहने के कारण उनका नाम नारायण हुआ। शिवजी द्वारा उन्हें जब प्रकट किया गया तब वे पीले रंग के वस्त्र धारण किए हुए थे इसलिए उन्हें पीतांबरधारी कहा गया। वे जगत के ईश्वर हैं अतः जगदीश कहलाते हैं। सत्य क्या है इसको बताने के कारण वे सत्यनारायण हुए। शेषनाग पर शयन करने के कारण वे शेषशा यी हुए।
विष्णुजी प्रतीक हैं: सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्ता ईश्वर के, सर्वोच्च भगवान के प्रमुख तीन स्वरूप में से एक पालनहार शक्ति के। वे प्रतिनिधित्व करते हैं ब्रह्मांड की गत्यात्मक निरंतरता का। प्रत्येक वस्तु ब्रह्मांड में अस्तित्व में आती है, कुछ समय रहती है और पुनः विष्णु में विलीन हो जाती है। यह केवल स्थूल वस्तुओं के लिए ही सच नहीं है अपितु जीवों, विचारों, घटनाओं , सिंद्धांतों, प्रत्ययों, मूल्यों आदि हर बात के लिए सत्य है। विष्णु प्रतीक हैं पुरूषार्थ के। प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व भगवान विष्णु की शक्ति से ही संभव है। उनकी शक्ति लक्ष्मी अर्थात प्रकृति है।
अवतार: जब भी विश्व के अस्तित्व के लिए आवश्यक हो जाता है धर्म की रक्षार्थ भगवान विष्णु अवतार लेते हैं। अवतार बुराई के वृहद एवं व्यापक आकार ले लेने पर अच्छाई एवं बुराई में पारस्परिक संतुलन स्थापित कर देते हैं। धर्म (शास्वत मूल्यों का समूह) की पुनर्स्थापना करते हैं। राम एवं कृष्ण सर्वाधिक लोकप्रिय अवतार हैं। राम आदर्श पुरूष की तो कृष्ण को पूर्ण अवतार की संज्ञा दी गई है। कृष्ण ने मोक्ष प्राप्ति के विभिन्न मार्गाें को प्रतिपादित किया है(श्रीमद्भगवद्गीता)। विष्णु के प्रमुख दस अवतार हैं - मत्स्य, कूर्म(कच्छप) वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध एवं कल्कि(कलियुग के अंत में होगा)। इन अवतारों के जीवन एवं संदेशों को समझकर तद्नुसार व्यवहार कर मानव स्वयं ईश्वर सदृष्य बन सकता है।
शेषनाग पर लेटी हुई छवि: सागर में तैरते शेषनाग पर भगवान विष्णु को लेटा हुआ दिखाया जाता है। भगवान ने सागर में रहकर ही कठोर तपस्या की थी अतः उनका नाम नारायण हुआ। सागर प्रतीक है अनंत असक्रिय/सुसुप्त चेतना (चिद्क्तिश ) का जबकि नाग प्रतीक है सक्रिय जागृत चेतना का। इसका तात्पर्य यह है कि मानव में छूपी हुई असीमित क्षमताएं है उनमें से कुछ ही विचारों के रूप में सतह पर आ पाती हैं जिससे मानव विश्व में सक्रिय रहता है।
नीला रंग: चुंकि श्रीविष्णु श्याम वर्ण के हैं अतः उन्हें नीले रंग में दिखाया जाता है।
हाथ में सुदर्शन चक्र: प्रतीक है निरंतर गतिमान समय का। समयरूपी चक्र वह हथियार है जो बुराई को नष्ट एवं अच्छाई को सुरक्षित रखता है। यह कभी रूकता नहीं है। महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल वध के लिए चक्र 100 की गिनती पुरी होने पर ही उठाया था अर्थात समय पूरा होने पर कार्य हुआ।
कमल का पुष्प: कमल प्रतीक है स्वयं में विद्यमान गुणों को पूर्णता के साथ अभिव्यक्त करने एवं प्रकटीकरण का। आपकी अन्तर्निहित क्षमताएं उसी प्रकार से प्रस्फुटित हो जानी चाहिए जैसे कि कमल के खिलने पर उसकी पंखुड़ियां फैल जाती हैं। कमल प्रतीक है जीवन की सुंदरता का।
मुकुट: हम स्वयं राजा के सदृश्य हैं इस प्रकार का अनुभव करें।
गदा: गदा शक्ति का प्रतीक है। बुराई पर विजय के लिए शक्ति का होना आवश्यक है।
शंख: प्रतीक है शास्वत ध्वनि (ओम) का। आंतरिक प्रसंन्नता का। असुरों को चेतावनी और भक्तों को निर्भय रहने का संदेश देने का।
लक्ष्मी: विष्णु के चरणों में बैठी लक्ष्मी द्योतक है कि समस्त संपत्ति ईष्वर की है। पुरूषार्थ से धनसंपदा अर्जित की जा सकती है। इसका उपयोग ब्रह्मांड के संरक्षण के लिए ही किया जाना चाहिए। लक्ष्मी सदैव पुरूषार्थ के प्रतीक विष्णु के साथ ही रहती है यह इस बात को व्यक्त करता है कि पुरूषार्थी मनुष्य कभी श्रीहीन नहीं रहता। अन्य समस्त संपति चलायमान है।
विष्णु सहस्रनाम: यह विष्णु के गुणों को अभिव्यक्त करने वाले एक हजार नाम हैं। उदाहरणार्थ अनंत एक नाम है जो कि ब्रह्मांड के अनंत विस्तार को बताता है। सत्य भी एक नाम है और उसके अर्थ को श्रीसत्यनारायण की कथा में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया। सत्य ही भगवान है। कथा में सत्य क्या है इसे स्पष्ट किया गया है, ऊंच-नीच, छुआ-छूत, गरीब-अमीर, राजा-रंक आदि में भेद करना अनुचित है, सत्य वचन एवं व्यवहार आदि क्या हैं इसे स्पष्ट किया गया है। भगवान विष्णु की विशेष आराधना सामान्यतः अनंत (अनंत चतुर्दशी ) एवं सत्यनारायण(श्री सत्यनारायण व्रत) के रूप में की जाती है।
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