रविवार, 19 अक्टूबर 2025

 छटा प्रकरण: महालक्ष्मी 

अन्य नाम: श्री, कमला, पद्मा, रमा, पद्मिनी , इन्दिरा, विमला, आदि  

छवियां:  सामान्यतः महालक्ष्मी को लाल कमल पर लाल वस्त्रों में बैठी या खड़ी हुई अवस्था में दर्षाया जाता है। आसपास हाथी, स्वर्ण मुद्राएं एवं आभूषण आदि होते हैं। एक मुद्रा उनकी और है और वह है शेषशायी भगवान विष्णु के चरणों में बैठी हुई लक्ष्मी की। 

विष्णु की शक्ति:  महालक्ष्मी विष्णु की शक्ति की प्रतीक है। वे सर्वशक्तिमान ईश्वर के संरक्षकत्व का द्योतक हैं। यह इस बात को दर्शाता  है कि उसके माध्यम से ब्रह्मांड लयबद्ध रहता है। ब्रह्मांड की निरंतरता के लिए वो समस्त भौतिक सामग्री उपलब्ध कराती रहती है। इसी कारण सर्वाधिक लोकप्रिय मान्यता है कि वे संपदा एवं संपन्नता की देवी हैं। वे मातृशक्ति हैं सुंदरता, लयबद्धता एवं संतुलन की।

समुद्रमंथन से उनका प्रादुर्भाव: देवीय एवं आसुरी शक्तियों के सम्मिलित प्रयासों से वे निकलती हैं। यह इस बात का द्योतक है कि निरंतर अथक एवं कठीन प्रयासों से ही सफलता एवं संपन्नता अर्जित की जा सकती है।

लाल कमलासन: यह उस आध्यात्मिक मूल या आधार को दर्शाता  है जिससे कि समस्त भौतिक जगत का सृजन होता है। अर्थात हम अपनी आंतरिक शक्ति के द्वारा अपनी समस्त ईच्छाओं को वास्तविकताओं के रूप में फलीभूत कर सकते हैं।

विष्णु के चरणों में बैठी हुई लक्ष्मी: यह इस बात का प्रतीक है कि लक्ष्मी केवल विष्णु की है और उसपर केवल उनका ही अधिकार है। अर्थात धनसंपदा रूपी लक्ष्मी विष्णुरूपी पुरूषार्थ की ही है। पुरूषार्थ से ही भौतिक संसाधन अर्जित किए जा सकते हैं। 

लक्ष्मीजी शक्ति है भगवान विष्णु की: लक्ष्मी की शक्तियां वस्तुतः विष्णु की ही शक्तियां हैं और उनका उपयोग उन्हीं के कार्यों के लिए किया जाना चाहिए। हमारी स्वयं की आत्मा ईश्वर से अलग नहीं है अतः आत्मा के पास भी वे सभी शक्तियां हैं जो ईश्वर  के पास है। जिस प्रकार विष्णु अपनी शक्ति को ब्रह्मांड के संरक्षण के लिए प्रयुक्त करते हैं उसी तरह हमें भी अपनी संपदा का विश्व की भलाई के लिए उपयोग करना चाहिए। यदि हम केवल उसको संग्रहित करते हैं और उसका विश्व  की भलाई के लिए उपयोग नहीं करते हैं तो यह माना जाना चाहिए कि हम भगवान विष्णु के कार्य में सहयोग नहीं करते हैं।

स्वर्ण मुकुट: सर्वोच्चता का द्योतक।

एक हाथ में कमल: पूर्णरूप से विकसित आध्यात्मिक प्रसन्नता का प्रतीक है।

एक हाथ से गिरती स्वर्ण मुद्राएं: मां लक्ष्मी के आशीर्वाद का प्रतीक है।

हाथियों द्वारा सूंड से जल बरसाना: यह दर्शाता  है कि आध्यात्मिक संपदा के स्रोत अनंत है यह कभी समाप्त होने वालेेे नहीं हैं। यदि हम अपनी इस आध्यात्मिक संपदा, शक्ति एवं अन्य क्षमताओं को आध्यात्मिक एवं अन्य श्रेष्ठ कार्यों के लिए उपयोग करते हैं तो वह निरंतर बढ़ती ही हैं। 

नवरात्रि: नवरात्रि के नौ दिनों में मध्य के तीन दिवस मां लक्ष्मी को समर्पित हैं। प्रथम तीन दिन में मां दूर्गा सभी नकारात्मकता को हटा देती है तब मध्य के तीन दिनों मंे लक्ष्मी समृद्धता लाती है, लयबद्धता एवं सतुलन स्थापित होता है। और इसके बाद ही हमारा मस्तिष्क उच्च स्तरीय सोच की ओर बढ़ता है जिससे कि विवेक अर्थात सरस्वती प्राप्त होती है। 

अग्रवाल जाति की कुलदेवी :  महालक्ष्मीजी अग्रवाल जाति के प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन की इष्ट देवी हैं। उनके आशीर्वाद एवं कृपा से ही वे जीवन में सफल हुए।  अतः महालक्ष्मी अग्रवाल जाति की कुलदेवी हैं।       

  प्रस्तुति: दुष्यन्त अग्रवाल




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें