बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

पवित्र पंच पल्लव: पीपल(अश्वत्थ), पाकड़, आम, वट(बरगद ), गुलर Sacred Five Leaves and their Importance in Sanatan Dharm

 पवित्र पंच पल्लव: पीपल(अष्वत्थ), पाकड़, आम, वट, गुलर 


 माहात्म्य: पूजन क्रिया में कलश  की स्थापना की जाती है उस कलश  में पीपल, पाकड़, आम, वट एवं अशोक वृक्ष के एक एक पत्ते  को नारियल के नीचे कलश  के मुुंह पर लगाने का प्रावधान है। इन वृक्षों को पवित्र माना जाता है। उक्त सभी वृक्ष औषधीय गुणों युक्त होते हैं एवं आक्सीजन के अच्छे स्रोत होने के साथ पर्यावरण के लिए भी बहुत ही उपयोगी होते हैं संभवतः इसीलिए सनातन में इन्हें किसी न किसी देवता एवं धार्मिक क्रिया से जोड़ा गया एवं पूज्य माना गया है।

पीपल (अश्वत्थ ): यह सतयुग का प्रतीक वृक्ष है। पीपल में भगवान विष्णु प्राण की प्रधानता है। भगवान कृष्ण ने अश्वत्थ  के लिए कहा था कि वृक्षों में वे अश्वत्थ हैं। पीपल को  वृक्षराज भी कहा जाता है। पीपल के वृक्ष में देवताओं एवं पीतरों का वास माना जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से पीपल सर्वाधिक आक्सीजन प्रदान करता है अतः वह पूज्य है। पीपल संबंधी मंत्र का जाप करने से शत्रुओं का नाश  होता है, सौभाग्य, सम्पदा, धन एवं जन की उपलब्धि होती है। यज्ञ में पीपल की समिधा का होना  आवषश्यक  माना गया है। शनिवारीय अमावस्या को पीपल के पूजन का विशेष  महत्व है। पीपल को ब्रह्मस्थान माना गया है। परमधान जाने से पूर्व श्रीकृष्ण ने पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाया था। भगवान बुद्ध को बोधगया में पीपलवृक्ष के नीचे बैठकर ही सम्बोधि की प्राप्ति हुई थी। अतः इसे बोधि वृक्ष भी कहा जाता है।  वास्तु शास्त्री इसको  घर में लगाने से मना करते हैं क्योंकि इसके बीज बहुत छोटे होते हैं और भवन की दीवारों में पड़ी दरार में घुसकर उग आते हैं , इससे भवन को नुकसान पहुँचता है। 

पाकड़: पाकड़ को द्वापर युग का प्रतीक माना गया है। पाकड़ के वृक्ष की छायां घणी एवं फैली हुई होती है। इसकी लकड़ी यज्ञ एवं हवन के लिए उत्तम  मानी जाती है।

आम: आम द्वापर युग का प्रतीक है। आम को फलों का राजा माना जाता है। जो कि अत्यंत स्वादिष्ट एवं आनंददाय होता है। यह आनंद, शृंगार, का प्रतीक है। इसकी लकड़ी भी हवन में काम ली जाती है। आम के बौर, जड़, गुठली, तेल औषधीय गुण रखते हैं। आम के पत्तों  से घर के प्रवेश द्वार एवं अन्य द्वारों पर वंदनवार बनाकर लगाई  जाती है जो कि अत्यंत शुभ मानी जाती है।

वट/बड़ (बरगद): वट वृक्ष कलियुग का प्रतीक है। इसे प्रलय का साक्षी माना जाता है। वटवृक्ष में पार्थिव शिव प्राण की प्रधानता है। यह अपनी जड़ों से अन्य वृक्षों को भी समाप्त कर देता है अतः उसे वट कहा जाता है। यह वृक्ष घना छायादार एवं अत्यंत विस्तार लिए होता है, अतः इसका उपयोग कथावाचन आदि हेेतु किया जाता रहा। कथा के उपरांत प्रसाद वितरण हेतु इसके पत्तों का उपयोग किया जाता रहा होगा। यक्ष, कुबेर, यम तथा शिव से इस वृक्ष का घनिष्ट संबंध है। यक्षों का आवास होने से इसे यक्षावास भी कहा जाता है। सत्यवान-सावित्री की कथा से भी यह जुड़ा हुआ है। कई धार्मिक लौकिक कथाओं में बरगद का उल्लेख होता है  वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो इसकी जड़ें दूर दूर तक फैलकर मीट्टी को बांधेरखकर मृदाक्षरण को रोकती है। वायु को प्रदूषणमुक्त करने में सहायक है। वटवृक्ष के समस्त अवयव औषधीय दृष्टि से उपयोगी हैं। बरगद की प्रकृति शीतल है अतः ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में भी सहायक हो सकती है। प्रयागराज का अक्षयवट, वाराणसी का अक्षयवट, गया का बोधिवृक्ष, उज्जैन का सिद्धवट आदि कुछ महत्वपूण वटवृक्ष हैं।

वट-सावित्री-व्रत एक महत्वपूर्ण व्रत है जो कि सामान्यतः ज्येष्ठ मास में दक्षिण भारत में अमावस्या को एवं उत्तर भारत में पूर्णिमा को किया जाता है। वास्तु शास्त्री इसको भी  घर में लगाने से मना करते हैं क्योंकि इसके बीज बहुत छोटे होते हैं और भवन की दीवारों में पड़ी दरार में घुसकर उग आते हैं , इससे भवन को नुकसान पहुँचता है। 

गुलर: गुलर एक औषधीय पौधा है अतः इसको भी पवित्र माना गया है। इसका पत्ता  भी कलश  में लगाया जाता है।

पंचपल्लव में अशो क, जामुन के पत्तों  का उपयोग भी किया जा सकता है।

पलाश(टेसू): पलाश  में स्वयंभू ब्रह्म का वास है। इस वृक्ष का भी प्रत्येक अवयव उपयोगी है। पत्तों  से पत्तल दोने बनाए जाते हैं, तने से गोंद प्राप्त होता है, फूलों से औषधीय रंग प्राप्त होता है, प्राचीन समय से ही इस रंग का उपयोग वस्त्रों को भगवा रंगने में किया जाता रहा है। इसीलिए भगवा रंग सनातन की पहचान बन गई। यह रंग रोगाणुओं के नाश  का भी कारण होता है। इसके कई औषधीय उपयोग हैं। अतः यह भी पूज्य है। इसकी लकड़ी भी हवन के लिए आवश्यक  मानी गई है। 


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