रविवार, 4 जनवरी 2026

हवन/यज्ञ कुंड एक पावन प्रतीक A sacred symbol of Hindu dharma : Havan /Yagya

 


हवन/यज्ञ कुंड  

हवन/यज्ञ का माहात्म्य:  यज्ञ या हवन सनातन धर्म के महत्वपूर्ण स्रोत वेदों की देन है। वेदों में यज्ञ अत्यंत आवश्यक  पूजन कर्म है। ऐसी मान्यता है कि कोई भी अनुष्ठान या पूजन हवन के बिना पूर्णता को प्राप्त नहीं होता है। वेदों में कई प्रकार के यज्ञों का महत्व वर्णित है। पर्यावरण शुद्धि, सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि एवं कल्याण हेतु यज्ञ किया जाता है। हमारे दैनिक जीवन में भी कई प्रकार के हवन करने का विधान है। हवन करने के लिए विशेष  प्रकार की विभिन्न पदार्थों से निर्मित आकृति होती है जिसमें अग्नि प्रज्वलित की जाती है जिसे हवन कुंड कहते हैं। यज्ञ व्यक्तिगत एवं विशाल पैमाने पर सामुहिक भी किए जाते हैं। यज्ञ सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण अंग हैं जिनका उद्देश्य  जीवन के विभिन्न पक्षों जैसे देव, पितृ, ऋषि, भूत, मनुष्य आदि में संतुलन और कर्तव्यपूर्ति करना है।

वेदों में यज्ञः  वेदों में मुख्य रूप से पांच प्रकार के यज्ञ बताए गए हैं जिन्हें पंच महायज्ञ कहते हैं। ये हैं ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वयज्ञ , नृयज्ञ। ये यज्ञ नित्यकर्म  के अंग हैं। इनके अतिरिक्त अग्निहोत्र, सोम, अश्वमेध , राजसूय और वाजपेय यज्ञ भी हैं। 

हवन कुंड के प्रकार:  हवन कुंड कई आधारों पर वर्गीकृत किए गए हैं। 

१ . आकृति के अनुसार: त्रिकोणीय, वर्गाकार, षटकोणीय, अष्टकोणीय, वृत्ताकार, अर्द्धचंद्रकार, कमलाकार, योनि आकार आदि।

२ . यज्ञ के उद्देश्य  के अनुसार: जनकल्याण, सुख-शांति , मन की शांति, मारक कार्य, शत्रु विजय, कार्य सिद्धि, संतान प्राप्ति, शक्ति संतुलन, ग्रह शांति, तांत्रिक अनुष्ठान, सौम्य कार्य, पितृ कार्य, श्राद्धकर्म , ग्रह प्रवेश , विवाह संस्कार, आदि।

३ . वेदी केे अनुसारः  वेदों के अध्ययन के उपरांत वेद विद्वानों को उनके अध्ययन स्तर के अनुरूप उपाधि दी जाती है। एक वेद के ज्ञाता एक वेदी, दो वेदों के ज्ञाता द्विवेदी, तीन वेदों के ज्ञाता त्रिवेदी एवं चारों वेदों के विद्वान चतुर्वेदी के नाम से जाने जाते हैं। संभवतः उनके अध्ययन के पूर्ण होने पर जो यज्ञ किया जाता है उस हेतु निर्मित वेदी को एक वेदी, द्विवेदीय, त्रिदेवीय एवं चतुर्वेदीय हवन कुंड कहा जाता है।

एक संभावना और भी है कि वेदी निर्माण के स्तर के अनुसार यह नाम दिए गए हों। एक स्तर(तल/मंजिल), दो स्तर, तीन स्तर एवं चार स्तर की वेदी को ये नाम दिए जाते हों। 

४ . एक वेदीय (एक तल) - दैनिक भोजन हेतु, द्विवेदीय (द्वि तल) -साधारण दैनिक हवन, त्रिवेदीय (त्रि तल) - सत,रज ,तम की आकांक्षा  , चतुर्वेदीय (चार तल) - धर्म,अर्थ, काम एवं मोक्ष हेतु।

५ . कुंड निर्माण सामग्री के आधार पर: हवन कुंड किस सामग्री से निर्मित है इसका भी महत्व होता है। अलग अलग प्रयोजन के लिए हवन कुंड अलग अलग सामग्री से बनाया जाता है। हवन कुंड स्वर्ण, ताम्र , लोह, मृदा, पीतल, आदि से बनाया जाता है। आजकल सामान्यतः ईंटों और रेत से हवन कुंड बनाते हैं।  पूर्व निर्मित हवन कुंड ताम्बे के बने हुए होते हैं। 

हवन सामग्रीः हवन हेतु आहुति दी जाती है। ये सामग्री होती है - समिधा, अनाज जैसे जौ, चावल, काला सफेद तिल, प्रयुक्त किए जाते हैं। सुगंधित जड़ी बूटियां प्रयुक्त की जाती हैं। पुष्टता एवं मधुरता हेतु गुड़, मिश्री, शहद, पंचमेवा, आदि प्रयुक्त किए जाते हैं। गाय का घी, लोबान, कपूर आदि  का उपयोग होता है। विशेष यज्ञों में केले, अनार, गुदेदार फलों की आहुति दी जाती है।

समिधा: हवन में अग्नि को समर्पित की जाने वाली लकड़ी को समिधा कहा जाता है। समिधा की लकड़ी सूखी, शुद्ध और पवित्र होना चाहिए। समिधा हेतु सामान्यतः आम की लकड़ी प्रयुक्त की जाती है। पलाश , मदार, पीपल, गूलर, शमी, बिल्व, बरगद की लकड़ी  का भी उपयोग होता है। परंतु कई विद्वान हवन कुंड में किन्हीं भी पांच प्रकार की लकड़ी को प्रयुक्त करना अधिक शास्त्र सम्मत मानते हैं। सड़ी-गली, कीड़े लगी, गीली, सूली हुई, श्मशान  के वृक्ष, परिंदों के घोंसले वाले वृक्ष से ली गई लकड़ी का उपयोग उचित नहीं माना जाता है। नदी के किनारे  और जंगल से प्राप्त लकड़ी को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

आहुति एवं पूर्णाहुति: हवन में अग्नि को सामग्री समर्पित करने को आहुति कहते हैं। यज्ञ की समाप्ति के पूर्व मुख्य यज्ञ कर्ता के साथ उपस्थित सभी श्रद्धालु भी आहुति समर्पित कर सकतेे हैं। इस आहुति को पूर्णाहुति कहा जाता है। इसमें मुख्यतः नारियल का गोला, सुखेमेवे आदि होते हैं।

आहुति के मंत्र: यज्ञ के उद्देश्य  के अनुरूप मंत्र बोलते हैं। मंत्र के अंत में स्वाहाः बोलते हुए आहुति अग्नि को समर्पित की जाती है। विशेषकर अग्निदेव मंत्र, गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र बोले जाते हैं। विभिन्न देवताओं से संबंधित मंत्रों के उच्चारण के साथ आहुति दी जाती है।

पूर्णाहुति के मंत्र: ओम पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णपुदच्यते। 

पूणस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।। स्वाहा।।








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