हंस: एक पवित्र सनातन प्रतीक
छवि: सनातन धर्म के देवताओं के साथ हंस को दिखाया जाता है। कभी अकेले बैठी हुआ मुद्रा में कभी किसी देवता के आसन या वाहन के रूप में इसे प्रदर्शित किया जाता है।
माहात्म्य: हंस मां सरस्वती, ब्रह्मा एवं गायत्री का वाहन है। यह उस आत्मा या जीवनदायी प्राण का प्रतीक है जो नीर क्षीर को परस्पर पृथक कर सकने की बुद्धि वाला होता है। यह प्रतीक है उनका जो आवश्यक बातों को अनावश्यक बातों से पृथक करने की क्षमता रखता है। हंस आत्मा का प्रतीक है। हंस का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। शरीर से हंस का उड़ जाना संसार त्याग कर आत्मा का मोक्ष हेतु गमन का प्रतीक है।
पवित्रता एवं विवेक का प्रतीक: हंस को सभी पक्षियों में सबसे बुद्धिमान एवं पवित्र माना जाता है। दूध एवं जल के मिश्रण में से दूध को ही ग्रहण करने की क्षमता उसके आध्यात्मिक विवेक को बताती है।
जीवन शक्ति: हंस में दो ध्वनियां निकलती है। ये ध्वनियां श्वास को अंदर बाहर होने की हैं। एक ह(पूरक) जो कि प्राण को भीतर लेने पर और दूसरी स(रेचक) जो प्राण को बाहर निकालने पर होती है। यह अपने आप में प्राण का, जीवन शक्ति का प्रतीक है। यह सोहम से संबंद्ध है। सोहम प्रतिनिधित्व करता है व्यक्ति एवं ईश्वर के योग का, जुड़ाव का। अतः योगिक क्रिया प्राणायाम का प्रतीक है हंस।
शास्वत प्रेम: हंस को एक आदर्श प्रतीक माना जाता है पवित्र प्रेम का।
देवताओं का वाहन: हंस वाहन है मां सरस्वती, ब्रह्मा, गायत्री, और विश्वकर्मा का।
आध्यात्मिक विवेक: ऐसी मान्यता है कि हंस कंकड़ों के ढेर में से मोती चुग लेता है। यह इस बात का प्रतीक है कि विश्व में प्रचूर मात्रा में व्याप्त विभिन्न व्यर्थ की जानकारी में से ईश्वर को पाने के लिए उपयुक्त ज्ञान का ही चयन करना चाहिए। दूध एवं पानी के मिश्रण में दूध को पृथक करने की क्षमता इस बात का द्योतक है कि आपमें सभी वस्तुओं में से सत्य एवं मर्म को समझने की क्षमता होना चाहिए। बुराई में से अच्छाई को विभक्त कर देना ही आध्यात्मिक विवेक है।
योगियों की परमहंस उपाधि: परमहंस की उपाधि दी जाती है उन संतों को जो कि योग की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं।
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