बुधवार, 24 दिसंबर 2025

नाग/ शेषनाग एक पावन प्रतीक A Sacred Symbol of Sanatan

 नाग/ शेषनाग 


नाग के मुख्य पौराणिक नाम : शेषनाग, वासुकी, तक्षक, कालिया, अनंत प्रमुख हैं ।

प्रस्तुत की जाने वाली छवि :  सामान्यतः नाग को कई फनों वाला दर्शाया जाता है । कस्बों, गावों, शहरों में पत्थर आदि पर एक फन वाले नाग भी बहुतायत में देखे जा सकते हैं । शिवलिंग पर एक फन वाले नाग ही सामान्यतः दर्शाए जाते हैं, जबकि शेषनाग को कई फन वाला दिखाया जाता है ।

नाग का माहात्म्य :  सनातन में नाग का  महत्व इसी तथ्य से स्पष्ट होता है कि नाग भगवान विष्णु की शैय्या है । भगवान विष्णु उसपर लेटे हुए दर्शाए जाते हैं। जिसे शेषनाग कहा जाता है । शेषनाग पृथ्वी को अपने फन पर धारण किए दर्शाए जाते हैं । शेषनाग को अनंत भी कहा जाता है ।  भगवान शिव के विभिन्न अंगों पर लिपटे हुए होते हैं नाग। कोई भी शिवलिंग बिना नाग के नहीं होता । हर मंदिर में या घर पर भी शिवलिंग के ऊपर नाग का फन छाया किए होता है । नाग को पाताललोक का वासी माना जाता है । नाग पंचमी पर नाग की पूजा की जाती है। वासुकी नागों के राजा हैं जो कि पाताल लोक मे रहते हैं । एक मान्यता यह भी है कि भगवान कृष्ण ने अपने बाल्यकाल में यमुना नदी में रह रहे कालिया नाग पर विजय प्राप्त की थी इसलिए भी नाग पंचमी मनाई जाती है । अश्लेषा नक्षत्र का स्वामी सर्प को माना जाता है ।

शेषनाग नाम की व्याख्या  :  शेषनाग सृष्टि के आरंभ और अंत से सम्बद्ध है । वह अनंतकाल को व्यक्त करता है । सृष्टि में प्रलय के बाद भी शेष रहने को अभिव्यक्त करते हैं । ये समय की निरंतरता और अनंतता के द्योतक हैं। हजारों फन हजारों ब्रह्मांडों के संतुलन को बताते हैं। ये सृष्टि, शक्ति, संतुलन, ब्रह्मांड तथा शास्वत अस्तित्व के प्रतीक हैं ।

शेषनाग के अवतार : शेषनाग ने त्रेतायुग में श्रीराम के लघुभ्राता लक्ष्मण तथा द्वापर युग में श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम के रूप में अवतार लिया था ।

नाग की पूजा का प्रारम्भ : महाभारत काल में द्वापर युग की समाप्ति एवं कलियुग के प्रारम्भ के संधिकाल में राजा जनमेजेय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए नागों का संहार करने के लिए एक विशाल यज्ञ करवाया । राजा परीक्षित की मृत्यु सर्पों के राजा तक्षक के डसे जाने से हुई थी । हवन कुंड में लाखों नाग आहुति बन रहे थे । तब आस्तिक ऋषि ने राजा से इस यज्ञ को बंद करने का आग्रह  किया । तभी से नागों की पूजा की जाने लगी । प्रत्येक शहर, कस्बे या गांव में पत्थर पर नाग की आकृति बने हुए देवस्थान पाए जाते हैं।

अग्रवाल जाति में नाग की पूजा : अग्रवाल जाति के प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन की एक पत्नी नाग कन्या थी । अतः अग्रवाल अपने आपको उनका वंशज मानते हैं अतः उनकी नाग पंचमी पर पूजा करते हैं । अग्रवाल जाति के अलावा भी कई अन्य जातियाँ भी नाग को अपना कुल देवता मानती हैं ।

धार्मिक महत्व: एसी मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने से वंश वृद्धि होती है और सुख समृद्धि प्राप्त होती है । सांपों से डसे जाने का भय दूर होता है। नागों को तप और शक्ति का प्रतीक माना गया है ।

भगवान दत्तात्रेय एवं सर्प : भगवान दत्तात्रेय के कोई औपचारिक गुरु नहीं थे । उन्होने प्रकृति के जीव निर्जीव से ही बहुत कुछ सीखा । इस प्रकार उनके 24 गुरु थे । उनमें दो गुरु थे सर्प और अजगर । सर्प से उन्होने ने संतोषी जीवन की सीख ली, क्योंकि सर्प का कोई आवास नहीं होता, वह घर बनाए बिना रहता है । अजगर से भी उन्होने संतोष भाव ही ग्रहण किया, जो मिल जाए उसी में संतोष रखो, उसी में तृप्ति अनुभव करो, एसी मान्यता है कि अजगर भोजन के लिए इधर उधर अधिक नहीं भटकता है जो मिल जाए उसीको अपना भोजन बना कर तृप्त हो जाता है

काल सर्प दोष का निवारण : नागों की पूजा करने से काल सर्प दोष का निवारण होता है । जन्म कुंडली में काल सर्प योग नाम की नई अवधारणा ने अभी कुछ ही वर्षों में जन्म लिया है ।  

वैज्ञानिक महत्व : खेतों में चूहे किसानों की फसलों को हानि पहुँचाते हैं। चूहे सांपों का प्रिय भोजन है । अतः सांप उनको अपना खाद्य बनाकर फसल को हानि से बचाते हैं । इसी कारण सांप को क्षेत्रपाल भी कहा जाता है ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें