प्रणवाक्षर ओंकार ओम्
ओम् का माहात्म्य: यह सृष्टि के रचयिता के मुख से ध्वनित प्रथम शब्द है। ओम् सूक्ष्म प्रणवाक्षर है इनके दो रूप हैं एक ह्रस्व प्रणव एवं दूसरा दीर्घ प्रणव, दोनों का कुछ भिन्न माहात्म्य है।
ह्रस्व प्रणव: तीन तत्वों अ उ म् से युक्त प्रणव को ह्रस्व प्रणव कहा जाता है। अ शिव है, उ शक्ति है और म् दोनों के संयुक्त होने का द्योतक है।
दीर्घ प्रणव: अकार, उकार, मकार, बिंदु, नाद, शब्द, काल और कला से युक्त प्रणव को दीर्घ प्रणव कहा जाता है।
एक मान्यता के अनुसार अ ब्रह्मा, उ विष्णु एवं म् शिव के प्रतीक हैं। शिव की आरती में एक पंक्ति आती है प्रणवाक्षर ओम् मध्ये ये तीनों एका जो इसी बात का संकेत करती है।
प्रणव का जप: शिव पुराण के अनुसार प्रणव का जप करने से पृथ्वी, जल, तेज(अग्नि), वायु, आकाश , गंध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द तत्वों पर विजय पाई जा सकती है। प्रत्येक तत्व के लिए नौ करोड़ जप करने से उस पर विजय प्राप्त होती है। अतः कुल मिलाकर 108 करोड़ प्रणव का जप करने पर मनुष्य समाधि को प्राप्त होता है और वह साक्षात शिव हो जाता है।
ओम्: यह एक पवित्र ध्वनि का प्रतीक है जो कि हिंदु, बौद्ध एवं जैन प्रयुक्त करते हैं। यह ब्रह्मांड के कंपनों को अभिव्यक्त करता है। वैज्ञानिकों ने सूर्य की ध्वनि को रिकाॅर्ड कर संघनित किया तो वह ओम् की ध्वनि होती है।ओम् का उपयोग किसी भी मंत्र के प्रारंभ में करने में करना एक सामान्य प्रक्रिया है क्योंकि इसे मंत्रों का सिरमौर माना जाता है।
ध्यान का आधार: ध्यान एवं योग का आधार है ओम्। उसके बार बार दोहराव से गहन शांति एवं एकाग्रता प्राप्त होती है।
ब्रह्मांड के साथ जुड़ने की ध्वनि: जो इसका जप करता है उसकी आंतरिक आवृति का ब्रह्मांडीय आवृति के साथ मिलकर अनुनाद होता है जो कि स्वयं को समझने का उत्कृष्ट आध्यात्मिक जुड़ाव निर्मित करता है।
भौतिक एवं मानसिक लाभ: ओम् के जाप से उत्पन्न कंपन व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक अवस्था को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।