रविवार, 30 नवंबर 2025

प्रणवाक्षर, ओंकार, ओम्: अत्यंत पावन प्रतीक Om the most important Sacred symbol of Hindutva

 


प्रणवाक्षर ओंकार ओम्

ओम् का माहात्म्य: यह सृष्टि के रचयिता के मुख से ध्वनित प्रथम शब्द है। ओम् सूक्ष्म प्रणवाक्षर है इनके दो रूप हैं एक ह्रस्व प्रणव एवं दूसरा दीर्घ प्रणव, दोनों का कुछ भिन्न माहात्म्य है।

  ह्रस्व प्रणव: तीन तत्वों अ उ म् से युक्त प्रणव को ह्रस्व प्रणव कहा जाता है। अ शिव है, उ शक्ति है और म् दोनों के संयुक्त होने का द्योतक है।

दीर्घ प्रणव: अकार, उकार, मकार, बिंदु, नाद, शब्द, काल और कला से युक्त प्रणव को दीर्घ प्रणव कहा जाता है।

एक मान्यता के अनुसार अ ब्रह्मा, उ विष्णु एवं म् शिव के प्रतीक हैं। शिव की आरती में एक पंक्ति आती है प्रणवाक्षर ओम् मध्ये ये तीनों एका जो इसी बात का संकेत करती है।

प्रणव का जप: शिव पुराण के अनुसार प्रणव का जप करने से पृथ्वी, जल, तेज(अग्नि), वायु, आकाश , गंध, रस, रूप, स्पर्श  एवं शब्द तत्वों पर विजय पाई जा सकती है। प्रत्येक तत्व के लिए नौ करोड़ जप करने से उस पर विजय प्राप्त होती है। अतः कुल मिलाकर 108 करोड़ प्रणव का जप करने पर मनुष्य समाधि को प्राप्त होता है और वह साक्षात शिव हो जाता है।

ओम्: यह एक पवित्र ध्वनि का प्रतीक है जो कि हिंदु, बौद्ध एवं जैन प्रयुक्त करते हैं। यह ब्रह्मांड के कंपनों को अभिव्यक्त करता है। वैज्ञानिकों ने सूर्य की ध्वनि को रिकाॅर्ड कर संघनित किया तो वह ओम् की ध्वनि होती है।ओम् का उपयोग किसी भी मंत्र के प्रारंभ में करने में करना एक सामान्य प्रक्रिया है क्योंकि इसे मंत्रों का सिरमौर माना जाता है।

ध्यान का आधार: ध्यान एवं योग का आधार है ओम्। उसके बार बार दोहराव से गहन शांति एवं एकाग्रता प्राप्त होती है।

ब्रह्मांड के साथ जुड़ने की ध्वनि: जो इसका जप करता है उसकी आंतरिक आवृति का ब्रह्मांडीय आवृति के साथ मिलकर अनुनाद होता है जो कि स्वयं को समझने का उत्कृष्ट आध्यात्मिक जुड़ाव निर्मित करता है। 

भौतिक एवं मानसिक लाभ: ओम् के जाप से उत्पन्न कंपन व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक अवस्था को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।

 

                                                


शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

कलश: पूजन विधि का एक आवश्यक अंग , कलश एक पवित्र सनातन प्रतीक Kalash a Sanatan Secret Symbol, an important part of Puja

   कलश 


 माहात्म्य - यह मान्यता है कि कलश  में सभी देवताओं का वास होता है। 

कलशस्य मुखे विष्णुः कंठे रुद्र समाश्रितः। मुले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।

अर्थात् कलश के मुख में विष्णु, कंठ में शिव, और मूल में  ब्रह्मा स्थित होते हैं। मध्य में दैवीय मातृ शक्तियों का निवास होता है।

कलश को ब्रह्मांड, विराटता, व्यापकता, ब्रह्म और भूपिंड का प्रतीक माना जाता है। उसे पवित्रता, सुख-समृद्धि, धन-धान्य और मंगल कामना का भी प्रतीक माना गया है। 

वेदों में कलश: वेेदों के अनुसार धार्मिक कार्यों में जल, धान या धन से पूर्ण कलश अर्थात् पूर्ण कुंभ को जीवन का स्रोत एवं प्रचुरता का मंगलकारी प्रतीक माना गया है। पूर्ण कुभ को ऋग्वेद के समय से जाना जाता है। पूजा में पूर्ण कलश, शंख, घंटी और ज्योति का बहुत महत्व है। पिंड में शंख और घंटी के माध्यम से चेतन्य की तरंगों का आदान-प्रदान होता है। दीपक की ज्योतिे पिंड की आत्मज्योति का प्रतीक है। पूजा के ये चारों तत्व निर्गुण के सिद्धांत को सगुण में परिवर्तित करते हैं। कलश के महत्व को जान लेने के उपरांत अब हम उसे कैसे स्थापित करें इसे जानने का प्रयास करते हैं।

कलश स्थापना: अक्षत या गेंहू (धान का प्रतीक) की ढेरी बनाकर उस पर अपनी सामर्थ्य  अनुसार कलश स्थापित करें। कलश मिट्टी, तांबे, चांदी या सोने का हो सकता है।कलश के सामने कंकू से स्वस्तिक बनालें। कलश में कम से कम एक सिक्का(धन का प्रतीक) रखलें। उसमें शुद्ध जल(विद्युत चुम्बकीय  ऊर्जा का स्रोत) पधरा दें उपलब्ध होे तो कुछ बुंदें कलश में गंगाजल(पवित्रता एवं शुद्धता हेतु) की भी पधरा दें। गले के चारों ओर लच्छा/मौली लपेट लें। उसके मुँह में पंच पल्लव (प्रकृति के महत्वपूण अंग के प्रतीक के रूप  में आम, अशोक, बरगद, पीपल, गुलर) अथवा पांच आम, या अशोक या पान के पत्ते  लगाकर उन पर एक प्लेट में गेहूँ रख कर, उस पर एक नारियल पर तिलक लगाकर एवं चारों ओर लच्छा/लाल कपड़ा लपेटकर रखें। नारियल का मुख अपनी ओर होना चाहिए। नारियल के तीखे सिरे के विपरीत जो सिरा होता है वही नारियल का मुख होता है। नारियल पर सवा रूपया/ग्यारह रूपए/या अपनी श्रद्धानुसार भेंट रखें। कलश पर जल, कंकू, अक्षत छिड़क कर तथा पुष्प चढ़ाकर कलश का पूजन करें। कई पंडित कलश पर नारियल को बिना प्लेट लिए सीधा खड़ा भी रखवाते हैं। उसमें नारियल का तीखा सिरा कलष के मूँह में और नारियल का मुख ऊपर की ओर रहता है।

चित्र- कलश  स्थापना- प्रथम विधि 

चित्र- कलश  स्थापना- द्वितीय  विधि 

   

                                                   चित्र- कलश  स्थापना-   तृतीय विधि 

कलश की वैज्ञानिकता: धातु के पात्र में भरा जल विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा युक्त होता है जो पूजा स्थल पर सकारात्मक ऊर्जा की ओरा(आभामंडल) निर्मित करता  है। कलश पर रखा श्रीफल अर्थात नारियल भी जलयुक्त होता है, ऐसी मान्यता है कि इससे ब्रह्मांडीय ऊर्जा अर्थात् काॅस्मिक एनर्जी के संचालन में निरंतरता बनी रहती है। हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिशत जल होता है, कलश में भरा शुद्ध गंगाजल युक्त पवित्र जल हमारे जीवन को संचालित करने वाले उसी जल का प्रतीक है। यह जल हमारे जीवन को निर्विकार, शुद्ध, शांत, और शीतल बनाता है। ऊर्जा का पिंड कलश ब्रह्म ऊर्जा का प्रतीक है जो कि प्राकृतिक ऊर्जाओं के साथ सामंजस्य बनाए रखने की सीख देता है। कुल मिलाकर यह कहना उचित होगा कि पूजा में काम आने वाले पूर्ण कलश में विद्युत चुंबकीय ऊर्जा होती है जो कि ब्रह्म ऊर्जा का प्रतीक है, यह हमें प्राकृतिक ऊर्जाओं में सामंजस्य एवं संतुलन बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है।



रविवार, 2 नवंबर 2025

नंदी: एक पावन प्रतीक, भगवान शंकर का वाहन Nandi : An important symbol of sanatan dharma

 नंदी: एक पावन प्रतीक 

 


अन्य नाम: नंदीश्वर , नंदीकेेश्वर , नंदीदेव,

नाम का अर्थ: नंदि एक संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ होता है प्रसंनता, आह्लाद और संतुष्टि, वस्तुतः यही नंदी के गुण भी हैं।

नंदी की छवि: एक विशाल शक्तिशाली श्वेत वर्ण का बैल, जिसके पीठ पर कुबड़ होता है, सींग, गर्दन के नीचे लटकी हुई चमड़ी होती है। उसकी पीठ पर आसन होता है एवं कई सारे आभूषण भी होते हैं। अधिकांशतः वह बैठा हुआ होता है। कुछ मंदिरों में उसे शंकर के रूप में भी दिखाया जाता है।  

माहात्म्य: नंदी भगवान शिव के विग्रह रूप शंकर का वाहन है। शिवपुराण के अनुसार भगवान महादेव के अंश  से नंदीश्वर  का जन्म हुआ। भगवान शिव का तैयालिसवां अवतार नंदीश्वरावतार है। शिलाद नामक मुनि ने भगवान शिव से शिव के समान ही अयोनिज पुत्र की कामना की। कुछ समय बीत जाने के बाद यज्ञक्षेत्र तैयार करते समय ही नंदीश्वर  शिलाद के शरीर से उत्पन्न हो गए। नंदीश्वर पूर्णतः त्रिनेत्र स्वरूप रुद्र रूप में थे। मुनि की कुटिया में पहुंचने पर नंदीश्वर ने उस स्वरूप को त्याग कर मनुष्य रूप धारण कर लिया। शिलाद ने नंदीश्वर को संपूर्ण शिक्षा प्रदान की। शिलाद के शुभचिंतकों के यह कहने पर कि नंदीश्वर की आयु कम होगी, शिलाद रोने लगे। तब नंदीश्वर ने अपने पिता को आश्वस्त  करते हुए कहा कि मैं महादेवजी के भजन से मृत्यु को जीत लूंगा। नंदीश्वर ने नदी के पावन तट पर रुद्रमंत्र का जाप कर महादेव को प्रसन्न कर लिया। तब महादेव ने कहा पुत्र तुम तो मेरे ही समान हो तुम्हें मृत्यु का कोई भय नहीं होना चाहिए। तुम सदैव मेरे पार्श्व/बाजू  में रहोगे। तब माता पार्वती की सलाह पर महादेव ने अपने प्रियपुत्र नंदीश्वर को सभी गणनायकों का अध्यक्ष घोषित कर दिया। नंदीश्वर का विवाह दिव्य कन्या सुयशा  के साथ कराया गया। महादेव ने कहा कि नंदीश्वर सदैव उनके साथ रहेंगे। यही वर माता पार्वती ने भी नंदी को दिया। अतः जहां भी शिवजी बिराजमान होते हैं वहां वाहन एवं द्वारपाल के रूप में नंदी भी बिराजते हैं।

नंदीकेश्वर  मंदिर: जबलपुर मध्यप्रदेश  में नर्मदा के तट पर स्थित है नंदीश्वर का मंदीर। ऐसी स्थानीय मान्यता है कि यहीं पर नंदीश्वर ने तप किया था।

श्वेत नंदी प्रतीक हैं: अहिंसा , शक्ति, समर्पण, सामर्थ्य , अनुशासन एवं निष्ठा के।

नंदी द्वारपाल हैं: शिव मंदिरों के द्वारपाल के सदृश्य  हैं नंदी।

चार पांव: कुछ विद्वानों के अनुसार नंदी के चार पांव धर्म के चार सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये हैं तप, पवित्रता, दया और सत्यनिष्ठा।

समृद्धि एवं आशीर्वाद: मंदिर में शिवजी के दर्शन  से पूर्व नंदी के दर्शन  से आशीर्वाद एवं समृद्धि प्राप्त होती है।

प्रजनन एवं सामर्थ्य : नंदी प्रतीक हैं प्रजनन/उपजाऊपन, पौरुष/साहस, सुदृढता/सामर्थ्य  के।

बैलों के प्रति सम्मान का आधार: नंदी के कारण ही बैलों के प्रति सम्मान दिखाया जाता है। कृषि प्रधान देश में बैल एक अत्यंत महत्वपूर्ण संशाधन रहा है। ट्रेक्टर/मोटर वाहन  के आने से पहले बैल हल चलाने और गाड़ियां खींचने में काम आते थे। उन गाड़ियों का नाम ही बैल गाड़ी है , आज भी गाँव में दिख जाती हैं। आजकल बैल कम और सांड अधिक दिखाई देते हैं क्योंकि अब बैल का उपयोग न होने से वे आवारा सांड के रूप में घूमते हैं। बैल पालतू होता है सांड सामान्यतः पालतू नहीं होते। 

सेंगोल: तमीलनाड़ू के ऐतिहासिक राजशाही चौल  वंश  के प्रतीक सेंगोल के शीर्ष पर नंदी बना होता है जो कि शासक को उसके राजधर्म को निभाने के कर्तव्य को दर्शाता  है।

आध्यात्मिकता: नंदी प्रतीक हैं आंतरिक सामर्थ्य  और बुराई के विरूद्ध दृढ़ता से खड़े रहने का।

भगवान आदिनाथ का प्रतीक चिह्न : वृषभ को भी नंदी का ही स्वरुप माना जाता है परन्तु इसमें विद्वान लोग एकमत नहीं हैं। वैसे इस प्रतीक से भी वे ही सन्देश हैं जो नंदी के हैं। 

 


शनिवार, 1 नवंबर 2025

गाय: सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र प्रतीक Puja wrat upwas kathaen sanatan symbol

गाय: सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र प्रतीक 

      

गाय के अन्य नाम: गौ, धेनु, गौरी, गैया, सुरभि, भद्रा, कामधेनु

प्रस्तुत की जाने वाली छवि: गाय को सर्वाधिक श्रीकृष्ण के चित्र में उनके पीछे खड़ा हुआ दिखाया जाता है। एक चित्र गाय का उसके बछड़े के साथ दुग्ध पान करते हुए होता है। आजकल एक चित्र और अधिक प्रचलन में है जिसमें गाय के शरीर पर अन्य देव एवं पवित्र प्रतीक प्रदर्शित  किए हुए होते हैं।

गाय का माहात्म्य: पुराणों के अनुसार गाय साक्षात विष्णु रूप है, सर्व वेदमयी एवं वेद गौमय हैं। भगवान राम के पूर्वज महाराजा दिलीप नन्दिनी गाय की पूजा करते थे। जीवन के प्रारंभ में श्रीकृष्ण एक ग्वाले के रूप में रहे तथा उनका गायों के साथ बहुत अधिक जुड़ाव रहा, गौचरण से ही उन्हें सारगर्भित ज्ञान प्राप्त हुआ था। गणेशजी का मस्तक काटने पर शिवजी को एक गाय दान करने का दंड दिया गया था परिणामस्वरूप माता पार्वती को गाय दान करनी पड़ी थी। भगवान भोलेनाथ का नंदी दक्षिण भारतीय आंगोल नस्ल का बैल है। गाय एक अत्यंत महत्वपूर्ण संसाधन रहा है जो कि पंच गव्य उपलब्ध कराती है। सनातन धर्म,  संस्कृति और पर्यावरण में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। गाय अत्यंत पवित्र एवं पूजनीय होती है। गाय में देवताओं का वास माना जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार गौ सर्वदेवमयी एवं वेद सर्वगौमय है। गाय समृद्धि, मातृत्व एवं अहिंसा का प्रतीक है। पृथ्वी को भी गौ कहा गया है। श्रीमद्भगवदगीता में भगवान कृष्ण ने कहा कि गायों में वे कामधेनु हैं । गुरु वशिष्ट ने गौवंश  का विस्तार किया। भगवान कृष्ण ने गाएं चराने का कार्य गोपाष्टमी से प्रारम्भ  किया था। गाय की योनि में से होकर ही आत्मा मनुुष्य योनि में प्रवेश  कर सकती है। बिल्वपत्र की उत्पत्ति  गाय के गोबर से ही हुई थी। गाय को ऋग्वेद में अघन्या, यजुर्वेद में गौ को अनुपमेय(जिसको कोई उपमा नहीं दी जा सकती) अथर्ववेद में संपतियों का घर कहा गया है।  

गौ-माता: हिंदू धर्म में गाय को मां का स्थान प्राप्त है। उसे गौ-माता पुकारा जाता है। गाय में 33 प्रकार के देवताओं का वास माना जाता है। उन्हें विष्णु का रूप भी माना जाता है।

अहिंसा का प्रतीक: गाय अहिंसा का प्रतीक है इसलिए भी वह अवध्य है।

करूणा का प्रतीक: गाय की रक्षा करना सभी जीवों के प्रति करूणा एवं उनकी गरिमा का प्रतीक है।

आध्यात्मिकता: ऐसी मान्यता है कि कई योनियों में भ्रमण करने के बाद आत्मा गाय की योनि में आती है और उसके बाद ही आत्मा मनुष्य योनि में आ पाती है।

व्रत:  गाय से जुड़े कई व्रत हैं। जिनमें गौवर्द्धन पूजा  एवं वत्स द्वादसी या बछबारस प्रमुख हैं। गोपद्वम व्रत,गोपाष्टमी व्रत, पयोव्रत आदि अन्य व्रत हैं।

आर्थिक महत्व: दूध, दही, मक्खन, छाछ, पनीर, गोबर एवं गौमूत्र सभी बिकते हैं जो कि आर्थिक लाभ देते हैं।

पर्यावरणीय महत्व: 

जैविक खादः गाय का गोबर जैविक खाद का महत्वपूर्ण स्रोत है। 

ईंधन: यह बायो गैस का महत्वपूर्ण स्रोत है। गाय के गोबर से निर्मित उपले धूप, हवन आदि में काम आते हैं। ईंधन के तौर पर भी इनका सीधा उपयोग होता है। 

वनों की कटाई में कमी: उपलों का एवं गोबर गैस के प्रयोग से जंगलों की जलाऊ लकड़ी पर दबाव कम होता है।

कृषि: गाय के गोबर का खाद भूमि को टिकाऊ उर्वरता देता है। गाय के बछड़े जो आगे जाकर बैल बनते हैं वे भी हल आदि चलाने में काम आते हैं।

स्वास्थ्य संबंधी उपयोग: 

पोषकता: गाय के दूध में उपस्थित कैल्शियम , प्रोटीन एवं विटामिन हड्डियों को मजबूती प्रदान करते हैं।

पाचन: दही पाचन में सुधार करता है।

प्रतिरक्षा प्रणाली: गाय का घी एवं दही प्रतिरक्षा प्रणाली को सषक्त बनाते हैं।

कैंसर व्याधि में उपयोग: कैंसर के उपचार एवं उसके रोकथाम में गौमूत्र को उपयोगी पाया गया है।

पवित्रता: गौमूत्र को अत्यंत पवित्र माना गया है। उसका उपयोग कई धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।

गाय अवध्य है: सनातन धर्म में गाय का वध करना, उसका मांस भक्षण करना अक्षम्य अपराध माना जाता है।

(टिप्पणी: गाय की महिमा अपरंपार है उसका वर्णन आसान नहीं है, संक्षेप में देने का प्रयास किया गया है।)