नंदी: एक पावन प्रतीक
अन्य नाम: नंदीश्वर , नंदीकेेश्वर , नंदीदेव,
नाम का अर्थ: नंदि एक संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ होता है प्रसंनता, आह्लाद और संतुष्टि, वस्तुतः यही नंदी के गुण भी हैं।
नंदी की छवि: एक विशाल शक्तिशाली श्वेत वर्ण का बैल, जिसके पीठ पर कुबड़ होता है, सींग, गर्दन के नीचे लटकी हुई चमड़ी होती है। उसकी पीठ पर आसन होता है एवं कई सारे आभूषण भी होते हैं। अधिकांशतः वह बैठा हुआ होता है। कुछ मंदिरों में उसे शंकर के रूप में भी दिखाया जाता है।
माहात्म्य: नंदी भगवान शिव के विग्रह रूप शंकर का वाहन है। शिवपुराण के अनुसार भगवान महादेव के अंश से नंदीश्वर का जन्म हुआ। भगवान शिव का तैयालिसवां अवतार नंदीश्वरावतार है। शिलाद नामक मुनि ने भगवान शिव से शिव के समान ही अयोनिज पुत्र की कामना की। कुछ समय बीत जाने के बाद यज्ञक्षेत्र तैयार करते समय ही नंदीश्वर शिलाद के शरीर से उत्पन्न हो गए। नंदीश्वर पूर्णतः त्रिनेत्र स्वरूप रुद्र रूप में थे। मुनि की कुटिया में पहुंचने पर नंदीश्वर ने उस स्वरूप को त्याग कर मनुष्य रूप धारण कर लिया। शिलाद ने नंदीश्वर को संपूर्ण शिक्षा प्रदान की। शिलाद के शुभचिंतकों के यह कहने पर कि नंदीश्वर की आयु कम होगी, शिलाद रोने लगे। तब नंदीश्वर ने अपने पिता को आश्वस्त करते हुए कहा कि मैं महादेवजी के भजन से मृत्यु को जीत लूंगा। नंदीश्वर ने नदी के पावन तट पर रुद्रमंत्र का जाप कर महादेव को प्रसन्न कर लिया। तब महादेव ने कहा पुत्र तुम तो मेरे ही समान हो तुम्हें मृत्यु का कोई भय नहीं होना चाहिए। तुम सदैव मेरे पार्श्व/बाजू में रहोगे। तब माता पार्वती की सलाह पर महादेव ने अपने प्रियपुत्र नंदीश्वर को सभी गणनायकों का अध्यक्ष घोषित कर दिया। नंदीश्वर का विवाह दिव्य कन्या सुयशा के साथ कराया गया। महादेव ने कहा कि नंदीश्वर सदैव उनके साथ रहेंगे। यही वर माता पार्वती ने भी नंदी को दिया। अतः जहां भी शिवजी बिराजमान होते हैं वहां वाहन एवं द्वारपाल के रूप में नंदी भी बिराजते हैं।
नंदीकेश्वर मंदिर: जबलपुर मध्यप्रदेश में नर्मदा के तट पर स्थित है नंदीश्वर का मंदीर। ऐसी स्थानीय मान्यता है कि यहीं पर नंदीश्वर ने तप किया था।
श्वेत नंदी प्रतीक हैं: अहिंसा , शक्ति, समर्पण, सामर्थ्य , अनुशासन एवं निष्ठा के।
नंदी द्वारपाल हैं: शिव मंदिरों के द्वारपाल के सदृश्य हैं नंदी।
चार पांव: कुछ विद्वानों के अनुसार नंदी के चार पांव धर्म के चार सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये हैं तप, पवित्रता, दया और सत्यनिष्ठा।
समृद्धि एवं आशीर्वाद: मंदिर में शिवजी के दर्शन से पूर्व नंदी के दर्शन से आशीर्वाद एवं समृद्धि प्राप्त होती है।
प्रजनन एवं सामर्थ्य : नंदी प्रतीक हैं प्रजनन/उपजाऊपन, पौरुष/साहस, सुदृढता/सामर्थ्य के।
बैलों के प्रति सम्मान का आधार: नंदी के कारण ही बैलों के प्रति सम्मान दिखाया जाता है। कृषि प्रधान देश में बैल एक अत्यंत महत्वपूर्ण संशाधन रहा है। ट्रेक्टर/मोटर वाहन के आने से पहले बैल हल चलाने और गाड़ियां खींचने में काम आते थे। उन गाड़ियों का नाम ही बैल गाड़ी है , आज भी गाँव में दिख जाती हैं। आजकल बैल कम और सांड अधिक दिखाई देते हैं क्योंकि अब बैल का उपयोग न होने से वे आवारा सांड के रूप में घूमते हैं। बैल पालतू होता है सांड सामान्यतः पालतू नहीं होते।
सेंगोल: तमीलनाड़ू के ऐतिहासिक राजशाही चौल वंश के प्रतीक सेंगोल के शीर्ष पर नंदी बना होता है जो कि शासक को उसके राजधर्म को निभाने के कर्तव्य को दर्शाता है।
आध्यात्मिकता: नंदी प्रतीक हैं आंतरिक सामर्थ्य और बुराई के विरूद्ध दृढ़ता से खड़े रहने का।
भगवान आदिनाथ का प्रतीक चिह्न : वृषभ को भी नंदी का ही स्वरुप माना जाता है परन्तु इसमें विद्वान लोग एकमत नहीं हैं। वैसे इस प्रतीक से भी वे ही सन्देश हैं जो नंदी के हैं।
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