कलश
माहात्म्य - यह मान्यता है कि कलश में सभी देवताओं का वास होता है।
कलशस्य मुखे विष्णुः कंठे रुद्र समाश्रितः। मुले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।
अर्थात् कलश के मुख में विष्णु, कंठ में शिव, और मूल में ब्रह्मा स्थित होते हैं। मध्य में दैवीय मातृ शक्तियों का निवास होता है।
कलश को ब्रह्मांड, विराटता, व्यापकता, ब्रह्म और भूपिंड का प्रतीक माना जाता है। उसे पवित्रता, सुख-समृद्धि, धन-धान्य और मंगल कामना का भी प्रतीक माना गया है।
वेदों में कलश: वेेदों के अनुसार धार्मिक कार्यों में जल, धान या धन से पूर्ण कलश अर्थात् पूर्ण कुंभ को जीवन का स्रोत एवं प्रचुरता का मंगलकारी प्रतीक माना गया है। पूर्ण कुभ को ऋग्वेद के समय से जाना जाता है। पूजा में पूर्ण कलश, शंख, घंटी और ज्योति का बहुत महत्व है। पिंड में शंख और घंटी के माध्यम से चेतन्य की तरंगों का आदान-प्रदान होता है। दीपक की ज्योतिे पिंड की आत्मज्योति का प्रतीक है। पूजा के ये चारों तत्व निर्गुण के सिद्धांत को सगुण में परिवर्तित करते हैं। कलश के महत्व को जान लेने के उपरांत अब हम उसे कैसे स्थापित करें इसे जानने का प्रयास करते हैं।
कलश स्थापना: अक्षत या गेंहू (धान का प्रतीक) की ढेरी बनाकर उस पर अपनी सामर्थ्य अनुसार कलश स्थापित करें। कलश मिट्टी, तांबे, चांदी या सोने का हो सकता है।कलश के सामने कंकू से स्वस्तिक बनालें। कलश में कम से कम एक सिक्का(धन का प्रतीक) रखलें। उसमें शुद्ध जल(विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा का स्रोत) पधरा दें उपलब्ध होे तो कुछ बुंदें कलश में गंगाजल(पवित्रता एवं शुद्धता हेतु) की भी पधरा दें। गले के चारों ओर लच्छा/मौली लपेट लें। उसके मुँह में पंच पल्लव (प्रकृति के महत्वपूण अंग के प्रतीक के रूप में आम, अशोक, बरगद, पीपल, गुलर) अथवा पांच आम, या अशोक या पान के पत्ते लगाकर उन पर एक प्लेट में गेहूँ रख कर, उस पर एक नारियल पर तिलक लगाकर एवं चारों ओर लच्छा/लाल कपड़ा लपेटकर रखें। नारियल का मुख अपनी ओर होना चाहिए। नारियल के तीखे सिरे के विपरीत जो सिरा होता है वही नारियल का मुख होता है। नारियल पर सवा रूपया/ग्यारह रूपए/या अपनी श्रद्धानुसार भेंट रखें। कलश पर जल, कंकू, अक्षत छिड़क कर तथा पुष्प चढ़ाकर कलश का पूजन करें। कई पंडित कलश पर नारियल को बिना प्लेट लिए सीधा खड़ा भी रखवाते हैं। उसमें नारियल का तीखा सिरा कलष के मूँह में और नारियल का मुख ऊपर की ओर रहता है।
चित्र- कलश स्थापना- तृतीय विधि
कलश की वैज्ञानिकता: धातु के पात्र में भरा जल विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा युक्त होता है जो पूजा स्थल पर सकारात्मक ऊर्जा की ओरा(आभामंडल) निर्मित करता है। कलश पर रखा श्रीफल अर्थात नारियल भी जलयुक्त होता है, ऐसी मान्यता है कि इससे ब्रह्मांडीय ऊर्जा अर्थात् काॅस्मिक एनर्जी के संचालन में निरंतरता बनी रहती है। हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिशत जल होता है, कलश में भरा शुद्ध गंगाजल युक्त पवित्र जल हमारे जीवन को संचालित करने वाले उसी जल का प्रतीक है। यह जल हमारे जीवन को निर्विकार, शुद्ध, शांत, और शीतल बनाता है। ऊर्जा का पिंड कलश ब्रह्म ऊर्जा का प्रतीक है जो कि प्राकृतिक ऊर्जाओं के साथ सामंजस्य बनाए रखने की सीख देता है। कुल मिलाकर यह कहना उचित होगा कि पूजा में काम आने वाले पूर्ण कलश में विद्युत चुंबकीय ऊर्जा होती है जो कि ब्रह्म ऊर्जा का प्रतीक है, यह हमें प्राकृतिक ऊर्जाओं में सामंजस्य एवं संतुलन बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है।
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