गाय: सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र प्रतीक
गाय के अन्य नाम: गौ, धेनु, गौरी, गैया, सुरभि, भद्रा, कामधेनु
प्रस्तुत की जाने वाली छवि: गाय को सर्वाधिक श्रीकृष्ण के चित्र में उनके पीछे खड़ा हुआ दिखाया जाता है। एक चित्र गाय का उसके बछड़े के साथ दुग्ध पान करते हुए होता है। आजकल एक चित्र और अधिक प्रचलन में है जिसमें गाय के शरीर पर अन्य देव एवं पवित्र प्रतीक प्रदर्शित किए हुए होते हैं।
गाय का माहात्म्य: पुराणों के अनुसार गाय साक्षात विष्णु रूप है, सर्व वेदमयी एवं वेद गौमय हैं। भगवान राम के पूर्वज महाराजा दिलीप नन्दिनी गाय की पूजा करते थे। जीवन के प्रारंभ में श्रीकृष्ण एक ग्वाले के रूप में रहे तथा उनका गायों के साथ बहुत अधिक जुड़ाव रहा, गौचरण से ही उन्हें सारगर्भित ज्ञान प्राप्त हुआ था। गणेशजी का मस्तक काटने पर शिवजी को एक गाय दान करने का दंड दिया गया था परिणामस्वरूप माता पार्वती को गाय दान करनी पड़ी थी। भगवान भोलेनाथ का नंदी दक्षिण भारतीय आंगोल नस्ल का बैल है। गाय एक अत्यंत महत्वपूर्ण संसाधन रहा है जो कि पंच गव्य उपलब्ध कराती है। सनातन धर्म, संस्कृति और पर्यावरण में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। गाय अत्यंत पवित्र एवं पूजनीय होती है। गाय में देवताओं का वास माना जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार गौ सर्वदेवमयी एवं वेद सर्वगौमय है। गाय समृद्धि, मातृत्व एवं अहिंसा का प्रतीक है। पृथ्वी को भी गौ कहा गया है। श्रीमद्भगवदगीता में भगवान कृष्ण ने कहा कि गायों में वे कामधेनु हैं । गुरु वशिष्ट ने गौवंश का विस्तार किया। भगवान कृष्ण ने गाएं चराने का कार्य गोपाष्टमी से प्रारम्भ किया था। गाय की योनि में से होकर ही आत्मा मनुुष्य योनि में प्रवेश कर सकती है। बिल्वपत्र की उत्पत्ति गाय के गोबर से ही हुई थी। गाय को ऋग्वेद में अघन्या, यजुर्वेद में गौ को अनुपमेय(जिसको कोई उपमा नहीं दी जा सकती) अथर्ववेद में संपतियों का घर कहा गया है।
गौ-माता: हिंदू धर्म में गाय को मां का स्थान प्राप्त है। उसे गौ-माता पुकारा जाता है। गाय में 33 प्रकार के देवताओं का वास माना जाता है। उन्हें विष्णु का रूप भी माना जाता है।
अहिंसा का प्रतीक: गाय अहिंसा का प्रतीक है इसलिए भी वह अवध्य है।
करूणा का प्रतीक: गाय की रक्षा करना सभी जीवों के प्रति करूणा एवं उनकी गरिमा का प्रतीक है।
आध्यात्मिकता: ऐसी मान्यता है कि कई योनियों में भ्रमण करने के बाद आत्मा गाय की योनि में आती है और उसके बाद ही आत्मा मनुष्य योनि में आ पाती है।
व्रत: गाय से जुड़े कई व्रत हैं। जिनमें गौवर्द्धन पूजा एवं वत्स द्वादसी या बछबारस प्रमुख हैं। गोपद्वम व्रत,गोपाष्टमी व्रत, पयोव्रत आदि अन्य व्रत हैं।
आर्थिक महत्व: दूध, दही, मक्खन, छाछ, पनीर, गोबर एवं गौमूत्र सभी बिकते हैं जो कि आर्थिक लाभ देते हैं।
पर्यावरणीय महत्व:
जैविक खादः गाय का गोबर जैविक खाद का महत्वपूर्ण स्रोत है।
ईंधन: यह बायो गैस का महत्वपूर्ण स्रोत है। गाय के गोबर से निर्मित उपले धूप, हवन आदि में काम आते हैं। ईंधन के तौर पर भी इनका सीधा उपयोग होता है।
वनों की कटाई में कमी: उपलों का एवं गोबर गैस के प्रयोग से जंगलों की जलाऊ लकड़ी पर दबाव कम होता है।
कृषि: गाय के गोबर का खाद भूमि को टिकाऊ उर्वरता देता है। गाय के बछड़े जो आगे जाकर बैल बनते हैं वे भी हल आदि चलाने में काम आते हैं।
स्वास्थ्य संबंधी उपयोग:
पोषकता: गाय के दूध में उपस्थित कैल्शियम , प्रोटीन एवं विटामिन हड्डियों को मजबूती प्रदान करते हैं।
पाचन: दही पाचन में सुधार करता है।
प्रतिरक्षा प्रणाली: गाय का घी एवं दही प्रतिरक्षा प्रणाली को सषक्त बनाते हैं।
कैंसर व्याधि में उपयोग: कैंसर के उपचार एवं उसके रोकथाम में गौमूत्र को उपयोगी पाया गया है।
पवित्रता: गौमूत्र को अत्यंत पवित्र माना गया है। उसका उपयोग कई धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।
गाय अवध्य है: सनातन धर्म में गाय का वध करना, उसका मांस भक्षण करना अक्षम्य अपराध माना जाता है।
(टिप्पणी: गाय की महिमा अपरंपार है उसका वर्णन आसान नहीं है, संक्षेप में देने का प्रयास किया गया है।)
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