गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

हंस: एक पवित्र सनातन प्रतीक


हंस: एक पवित्र सनातन प्रतीक  

छवि: सनातन धर्म के देवताओं के साथ हंस को दिखाया जाता है। कभी अकेले  बैठी हुआ मुद्रा में कभी किसी देवता के आसन या वाहन के रूप में इसे प्रदर्शित  किया जाता है।

माहात्म्य: हंस मां सरस्वती, ब्रह्मा एवं गायत्री  का वाहन है। यह उस आत्मा या जीवनदायी प्राण का प्रतीक है जो नीर क्षीर को परस्पर पृथक कर सकने की बुद्धि वाला होता है। यह प्रतीक है उनका जो आवश्यक बातों को अनावश्यक बातों से पृथक करने की क्षमता रखता है। हंस आत्मा का प्रतीक है। हंस का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। शरीर से हंस का उड़ जाना संसार त्याग कर आत्मा का मोक्ष हेतु गमन का प्रतीक है।

पवित्रता एवं विवेक का प्रतीक: हंस को सभी पक्षियों में सबसे बुद्धिमान  एवं पवित्र माना जाता है। दूध एवं जल के मिश्रण में से दूध को ही ग्रहण करने की क्षमता उसके आध्यात्मिक विवेक को बताती है।

जीवन शक्ति: हंस में दो ध्वनियां निकलती है। ये ध्वनियां श्वास को अंदर बाहर होने की हैं। एक (पूरक) जो कि प्राण को भीतर लेने पर और दूसरी (रेचक) जो प्राण को बाहर निकालने पर होती है। यह अपने आप में प्राण का, जीवन शक्ति का प्रतीक है। यह सोहम से संबंद्ध है। सोहम प्रतिनिधित्व करता है व्यक्ति एवं ईश्वर के योग का, जुड़ाव का। अतः योगिक क्रिया प्राणायाम का प्रतीक है हंस।

शास्वत प्रेम: हंस को एक आदर्श  प्रतीक माना जाता है पवित्र प्रेम का।

देवताओं का वाहन: हंस वाहन है मां सरस्वती, ब्रह्मा, गायत्री, और विश्वकर्मा  का।

आध्यात्मिक विवेक: ऐसी मान्यता है कि हंस कंकड़ों के ढेर में से मोती चुग लेता है। यह इस बात का प्रतीक है कि विश्व  में प्रचूर मात्रा में व्याप्त विभिन्न व्यर्थ की जानकारी में से ईश्वर  को पाने के लिए उपयुक्त ज्ञान का ही चयन करना चाहिए। दूध एवं पानी के मिश्रण में दूध को पृथक करने की क्षमता इस बात का द्योतक है कि आपमें सभी वस्तुओं में से सत्य एवं मर्म को समझने की क्षमता होना चाहिए। बुराई में से अच्छाई को विभक्त कर देना ही आध्यात्मिक विवेक है।

योगियों की परमहंस उपाधि: परमहंस की उपाधि दी जाती है उन संतों को जो कि योग की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। 



 

बुधवार, 24 दिसंबर 2025

नाग/ शेषनाग एक पावन प्रतीक A Sacred Symbol of Sanatan

 नाग/ शेषनाग 


नाग के मुख्य पौराणिक नाम : शेषनाग, वासुकी, तक्षक, कालिया, अनंत प्रमुख हैं ।

प्रस्तुत की जाने वाली छवि :  सामान्यतः नाग को कई फनों वाला दर्शाया जाता है । कस्बों, गावों, शहरों में पत्थर आदि पर एक फन वाले नाग भी बहुतायत में देखे जा सकते हैं । शिवलिंग पर एक फन वाले नाग ही सामान्यतः दर्शाए जाते हैं, जबकि शेषनाग को कई फन वाला दिखाया जाता है ।

नाग का माहात्म्य :  सनातन में नाग का  महत्व इसी तथ्य से स्पष्ट होता है कि नाग भगवान विष्णु की शैय्या है । भगवान विष्णु उसपर लेटे हुए दर्शाए जाते हैं। जिसे शेषनाग कहा जाता है । शेषनाग पृथ्वी को अपने फन पर धारण किए दर्शाए जाते हैं । शेषनाग को अनंत भी कहा जाता है ।  भगवान शिव के विभिन्न अंगों पर लिपटे हुए होते हैं नाग। कोई भी शिवलिंग बिना नाग के नहीं होता । हर मंदिर में या घर पर भी शिवलिंग के ऊपर नाग का फन छाया किए होता है । नाग को पाताललोक का वासी माना जाता है । नाग पंचमी पर नाग की पूजा की जाती है। वासुकी नागों के राजा हैं जो कि पाताल लोक मे रहते हैं । एक मान्यता यह भी है कि भगवान कृष्ण ने अपने बाल्यकाल में यमुना नदी में रह रहे कालिया नाग पर विजय प्राप्त की थी इसलिए भी नाग पंचमी मनाई जाती है । अश्लेषा नक्षत्र का स्वामी सर्प को माना जाता है ।

शेषनाग नाम की व्याख्या  :  शेषनाग सृष्टि के आरंभ और अंत से सम्बद्ध है । वह अनंतकाल को व्यक्त करता है । सृष्टि में प्रलय के बाद भी शेष रहने को अभिव्यक्त करते हैं । ये समय की निरंतरता और अनंतता के द्योतक हैं। हजारों फन हजारों ब्रह्मांडों के संतुलन को बताते हैं। ये सृष्टि, शक्ति, संतुलन, ब्रह्मांड तथा शास्वत अस्तित्व के प्रतीक हैं ।

शेषनाग के अवतार : शेषनाग ने त्रेतायुग में श्रीराम के लघुभ्राता लक्ष्मण तथा द्वापर युग में श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम के रूप में अवतार लिया था ।

नाग की पूजा का प्रारम्भ : महाभारत काल में द्वापर युग की समाप्ति एवं कलियुग के प्रारम्भ के संधिकाल में राजा जनमेजेय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए नागों का संहार करने के लिए एक विशाल यज्ञ करवाया । राजा परीक्षित की मृत्यु सर्पों के राजा तक्षक के डसे जाने से हुई थी । हवन कुंड में लाखों नाग आहुति बन रहे थे । तब आस्तिक ऋषि ने राजा से इस यज्ञ को बंद करने का आग्रह  किया । तभी से नागों की पूजा की जाने लगी । प्रत्येक शहर, कस्बे या गांव में पत्थर पर नाग की आकृति बने हुए देवस्थान पाए जाते हैं।

अग्रवाल जाति में नाग की पूजा : अग्रवाल जाति के प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन की एक पत्नी नाग कन्या थी । अतः अग्रवाल अपने आपको उनका वंशज मानते हैं अतः उनकी नाग पंचमी पर पूजा करते हैं । अग्रवाल जाति के अलावा भी कई अन्य जातियाँ भी नाग को अपना कुल देवता मानती हैं ।

धार्मिक महत्व: एसी मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने से वंश वृद्धि होती है और सुख समृद्धि प्राप्त होती है । सांपों से डसे जाने का भय दूर होता है। नागों को तप और शक्ति का प्रतीक माना गया है ।

भगवान दत्तात्रेय एवं सर्प : भगवान दत्तात्रेय के कोई औपचारिक गुरु नहीं थे । उन्होने प्रकृति के जीव निर्जीव से ही बहुत कुछ सीखा । इस प्रकार उनके 24 गुरु थे । उनमें दो गुरु थे सर्प और अजगर । सर्प से उन्होने ने संतोषी जीवन की सीख ली, क्योंकि सर्प का कोई आवास नहीं होता, वह घर बनाए बिना रहता है । अजगर से भी उन्होने संतोष भाव ही ग्रहण किया, जो मिल जाए उसी में संतोष रखो, उसी में तृप्ति अनुभव करो, एसी मान्यता है कि अजगर भोजन के लिए इधर उधर अधिक नहीं भटकता है जो मिल जाए उसीको अपना भोजन बना कर तृप्त हो जाता है

काल सर्प दोष का निवारण : नागों की पूजा करने से काल सर्प दोष का निवारण होता है । जन्म कुंडली में काल सर्प योग नाम की नई अवधारणा ने अभी कुछ ही वर्षों में जन्म लिया है ।  

वैज्ञानिक महत्व : खेतों में चूहे किसानों की फसलों को हानि पहुँचाते हैं। चूहे सांपों का प्रिय भोजन है । अतः सांप उनको अपना खाद्य बनाकर फसल को हानि से बचाते हैं । इसी कारण सांप को क्षेत्रपाल भी कहा जाता है ।

रविवार, 30 नवंबर 2025

प्रणवाक्षर, ओंकार, ओम्: अत्यंत पावन प्रतीक Om the most important Sacred symbol of Hindutva

 


प्रणवाक्षर ओंकार ओम्

ओम् का माहात्म्य: यह सृष्टि के रचयिता के मुख से ध्वनित प्रथम शब्द है। ओम् सूक्ष्म प्रणवाक्षर है इनके दो रूप हैं एक ह्रस्व प्रणव एवं दूसरा दीर्घ प्रणव, दोनों का कुछ भिन्न माहात्म्य है।

  ह्रस्व प्रणव: तीन तत्वों अ उ म् से युक्त प्रणव को ह्रस्व प्रणव कहा जाता है। अ शिव है, उ शक्ति है और म् दोनों के संयुक्त होने का द्योतक है।

दीर्घ प्रणव: अकार, उकार, मकार, बिंदु, नाद, शब्द, काल और कला से युक्त प्रणव को दीर्घ प्रणव कहा जाता है।

एक मान्यता के अनुसार अ ब्रह्मा, उ विष्णु एवं म् शिव के प्रतीक हैं। शिव की आरती में एक पंक्ति आती है प्रणवाक्षर ओम् मध्ये ये तीनों एका जो इसी बात का संकेत करती है।

प्रणव का जप: शिव पुराण के अनुसार प्रणव का जप करने से पृथ्वी, जल, तेज(अग्नि), वायु, आकाश , गंध, रस, रूप, स्पर्श  एवं शब्द तत्वों पर विजय पाई जा सकती है। प्रत्येक तत्व के लिए नौ करोड़ जप करने से उस पर विजय प्राप्त होती है। अतः कुल मिलाकर 108 करोड़ प्रणव का जप करने पर मनुष्य समाधि को प्राप्त होता है और वह साक्षात शिव हो जाता है।

ओम्: यह एक पवित्र ध्वनि का प्रतीक है जो कि हिंदु, बौद्ध एवं जैन प्रयुक्त करते हैं। यह ब्रह्मांड के कंपनों को अभिव्यक्त करता है। वैज्ञानिकों ने सूर्य की ध्वनि को रिकाॅर्ड कर संघनित किया तो वह ओम् की ध्वनि होती है।ओम् का उपयोग किसी भी मंत्र के प्रारंभ में करने में करना एक सामान्य प्रक्रिया है क्योंकि इसे मंत्रों का सिरमौर माना जाता है।

ध्यान का आधार: ध्यान एवं योग का आधार है ओम्। उसके बार बार दोहराव से गहन शांति एवं एकाग्रता प्राप्त होती है।

ब्रह्मांड के साथ जुड़ने की ध्वनि: जो इसका जप करता है उसकी आंतरिक आवृति का ब्रह्मांडीय आवृति के साथ मिलकर अनुनाद होता है जो कि स्वयं को समझने का उत्कृष्ट आध्यात्मिक जुड़ाव निर्मित करता है। 

भौतिक एवं मानसिक लाभ: ओम् के जाप से उत्पन्न कंपन व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक अवस्था को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।

 

                                                


शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

कलश: पूजन विधि का एक आवश्यक अंग , कलश एक पवित्र सनातन प्रतीक Kalash a Sanatan Secret Symbol, an important part of Puja

   कलश 


 माहात्म्य - यह मान्यता है कि कलश  में सभी देवताओं का वास होता है। 

कलशस्य मुखे विष्णुः कंठे रुद्र समाश्रितः। मुले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।

अर्थात् कलश के मुख में विष्णु, कंठ में शिव, और मूल में  ब्रह्मा स्थित होते हैं। मध्य में दैवीय मातृ शक्तियों का निवास होता है।

कलश को ब्रह्मांड, विराटता, व्यापकता, ब्रह्म और भूपिंड का प्रतीक माना जाता है। उसे पवित्रता, सुख-समृद्धि, धन-धान्य और मंगल कामना का भी प्रतीक माना गया है। 

वेदों में कलश: वेेदों के अनुसार धार्मिक कार्यों में जल, धान या धन से पूर्ण कलश अर्थात् पूर्ण कुंभ को जीवन का स्रोत एवं प्रचुरता का मंगलकारी प्रतीक माना गया है। पूर्ण कुभ को ऋग्वेद के समय से जाना जाता है। पूजा में पूर्ण कलश, शंख, घंटी और ज्योति का बहुत महत्व है। पिंड में शंख और घंटी के माध्यम से चेतन्य की तरंगों का आदान-प्रदान होता है। दीपक की ज्योतिे पिंड की आत्मज्योति का प्रतीक है। पूजा के ये चारों तत्व निर्गुण के सिद्धांत को सगुण में परिवर्तित करते हैं। कलश के महत्व को जान लेने के उपरांत अब हम उसे कैसे स्थापित करें इसे जानने का प्रयास करते हैं।

कलश स्थापना: अक्षत या गेंहू (धान का प्रतीक) की ढेरी बनाकर उस पर अपनी सामर्थ्य  अनुसार कलश स्थापित करें। कलश मिट्टी, तांबे, चांदी या सोने का हो सकता है।कलश के सामने कंकू से स्वस्तिक बनालें। कलश में कम से कम एक सिक्का(धन का प्रतीक) रखलें। उसमें शुद्ध जल(विद्युत चुम्बकीय  ऊर्जा का स्रोत) पधरा दें उपलब्ध होे तो कुछ बुंदें कलश में गंगाजल(पवित्रता एवं शुद्धता हेतु) की भी पधरा दें। गले के चारों ओर लच्छा/मौली लपेट लें। उसके मुँह में पंच पल्लव (प्रकृति के महत्वपूण अंग के प्रतीक के रूप  में आम, अशोक, बरगद, पीपल, गुलर) अथवा पांच आम, या अशोक या पान के पत्ते  लगाकर उन पर एक प्लेट में गेहूँ रख कर, उस पर एक नारियल पर तिलक लगाकर एवं चारों ओर लच्छा/लाल कपड़ा लपेटकर रखें। नारियल का मुख अपनी ओर होना चाहिए। नारियल के तीखे सिरे के विपरीत जो सिरा होता है वही नारियल का मुख होता है। नारियल पर सवा रूपया/ग्यारह रूपए/या अपनी श्रद्धानुसार भेंट रखें। कलश पर जल, कंकू, अक्षत छिड़क कर तथा पुष्प चढ़ाकर कलश का पूजन करें। कई पंडित कलश पर नारियल को बिना प्लेट लिए सीधा खड़ा भी रखवाते हैं। उसमें नारियल का तीखा सिरा कलष के मूँह में और नारियल का मुख ऊपर की ओर रहता है।

चित्र- कलश  स्थापना- प्रथम विधि 

चित्र- कलश  स्थापना- द्वितीय  विधि 

   

                                                   चित्र- कलश  स्थापना-   तृतीय विधि 

कलश की वैज्ञानिकता: धातु के पात्र में भरा जल विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा युक्त होता है जो पूजा स्थल पर सकारात्मक ऊर्जा की ओरा(आभामंडल) निर्मित करता  है। कलश पर रखा श्रीफल अर्थात नारियल भी जलयुक्त होता है, ऐसी मान्यता है कि इससे ब्रह्मांडीय ऊर्जा अर्थात् काॅस्मिक एनर्जी के संचालन में निरंतरता बनी रहती है। हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिशत जल होता है, कलश में भरा शुद्ध गंगाजल युक्त पवित्र जल हमारे जीवन को संचालित करने वाले उसी जल का प्रतीक है। यह जल हमारे जीवन को निर्विकार, शुद्ध, शांत, और शीतल बनाता है। ऊर्जा का पिंड कलश ब्रह्म ऊर्जा का प्रतीक है जो कि प्राकृतिक ऊर्जाओं के साथ सामंजस्य बनाए रखने की सीख देता है। कुल मिलाकर यह कहना उचित होगा कि पूजा में काम आने वाले पूर्ण कलश में विद्युत चुंबकीय ऊर्जा होती है जो कि ब्रह्म ऊर्जा का प्रतीक है, यह हमें प्राकृतिक ऊर्जाओं में सामंजस्य एवं संतुलन बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है।



रविवार, 2 नवंबर 2025

नंदी: एक पावन प्रतीक, भगवान शंकर का वाहन Nandi : An important symbol of sanatan dharma

 नंदी: एक पावन प्रतीक 

 


अन्य नाम: नंदीश्वर , नंदीकेेश्वर , नंदीदेव,

नाम का अर्थ: नंदि एक संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ होता है प्रसंनता, आह्लाद और संतुष्टि, वस्तुतः यही नंदी के गुण भी हैं।

नंदी की छवि: एक विशाल शक्तिशाली श्वेत वर्ण का बैल, जिसके पीठ पर कुबड़ होता है, सींग, गर्दन के नीचे लटकी हुई चमड़ी होती है। उसकी पीठ पर आसन होता है एवं कई सारे आभूषण भी होते हैं। अधिकांशतः वह बैठा हुआ होता है। कुछ मंदिरों में उसे शंकर के रूप में भी दिखाया जाता है।  

माहात्म्य: नंदी भगवान शिव के विग्रह रूप शंकर का वाहन है। शिवपुराण के अनुसार भगवान महादेव के अंश  से नंदीश्वर  का जन्म हुआ। भगवान शिव का तैयालिसवां अवतार नंदीश्वरावतार है। शिलाद नामक मुनि ने भगवान शिव से शिव के समान ही अयोनिज पुत्र की कामना की। कुछ समय बीत जाने के बाद यज्ञक्षेत्र तैयार करते समय ही नंदीश्वर  शिलाद के शरीर से उत्पन्न हो गए। नंदीश्वर पूर्णतः त्रिनेत्र स्वरूप रुद्र रूप में थे। मुनि की कुटिया में पहुंचने पर नंदीश्वर ने उस स्वरूप को त्याग कर मनुष्य रूप धारण कर लिया। शिलाद ने नंदीश्वर को संपूर्ण शिक्षा प्रदान की। शिलाद के शुभचिंतकों के यह कहने पर कि नंदीश्वर की आयु कम होगी, शिलाद रोने लगे। तब नंदीश्वर ने अपने पिता को आश्वस्त  करते हुए कहा कि मैं महादेवजी के भजन से मृत्यु को जीत लूंगा। नंदीश्वर ने नदी के पावन तट पर रुद्रमंत्र का जाप कर महादेव को प्रसन्न कर लिया। तब महादेव ने कहा पुत्र तुम तो मेरे ही समान हो तुम्हें मृत्यु का कोई भय नहीं होना चाहिए। तुम सदैव मेरे पार्श्व/बाजू  में रहोगे। तब माता पार्वती की सलाह पर महादेव ने अपने प्रियपुत्र नंदीश्वर को सभी गणनायकों का अध्यक्ष घोषित कर दिया। नंदीश्वर का विवाह दिव्य कन्या सुयशा  के साथ कराया गया। महादेव ने कहा कि नंदीश्वर सदैव उनके साथ रहेंगे। यही वर माता पार्वती ने भी नंदी को दिया। अतः जहां भी शिवजी बिराजमान होते हैं वहां वाहन एवं द्वारपाल के रूप में नंदी भी बिराजते हैं।

नंदीकेश्वर  मंदिर: जबलपुर मध्यप्रदेश  में नर्मदा के तट पर स्थित है नंदीश्वर का मंदीर। ऐसी स्थानीय मान्यता है कि यहीं पर नंदीश्वर ने तप किया था।

श्वेत नंदी प्रतीक हैं: अहिंसा , शक्ति, समर्पण, सामर्थ्य , अनुशासन एवं निष्ठा के।

नंदी द्वारपाल हैं: शिव मंदिरों के द्वारपाल के सदृश्य  हैं नंदी।

चार पांव: कुछ विद्वानों के अनुसार नंदी के चार पांव धर्म के चार सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये हैं तप, पवित्रता, दया और सत्यनिष्ठा।

समृद्धि एवं आशीर्वाद: मंदिर में शिवजी के दर्शन  से पूर्व नंदी के दर्शन  से आशीर्वाद एवं समृद्धि प्राप्त होती है।

प्रजनन एवं सामर्थ्य : नंदी प्रतीक हैं प्रजनन/उपजाऊपन, पौरुष/साहस, सुदृढता/सामर्थ्य  के।

बैलों के प्रति सम्मान का आधार: नंदी के कारण ही बैलों के प्रति सम्मान दिखाया जाता है। कृषि प्रधान देश में बैल एक अत्यंत महत्वपूर्ण संशाधन रहा है। ट्रेक्टर/मोटर वाहन  के आने से पहले बैल हल चलाने और गाड़ियां खींचने में काम आते थे। उन गाड़ियों का नाम ही बैल गाड़ी है , आज भी गाँव में दिख जाती हैं। आजकल बैल कम और सांड अधिक दिखाई देते हैं क्योंकि अब बैल का उपयोग न होने से वे आवारा सांड के रूप में घूमते हैं। बैल पालतू होता है सांड सामान्यतः पालतू नहीं होते। 

सेंगोल: तमीलनाड़ू के ऐतिहासिक राजशाही चौल  वंश  के प्रतीक सेंगोल के शीर्ष पर नंदी बना होता है जो कि शासक को उसके राजधर्म को निभाने के कर्तव्य को दर्शाता  है।

आध्यात्मिकता: नंदी प्रतीक हैं आंतरिक सामर्थ्य  और बुराई के विरूद्ध दृढ़ता से खड़े रहने का।

भगवान आदिनाथ का प्रतीक चिह्न : वृषभ को भी नंदी का ही स्वरुप माना जाता है परन्तु इसमें विद्वान लोग एकमत नहीं हैं। वैसे इस प्रतीक से भी वे ही सन्देश हैं जो नंदी के हैं। 

 


शनिवार, 1 नवंबर 2025

गाय: सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र प्रतीक Puja wrat upwas kathaen sanatan symbol

गाय: सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र प्रतीक 

      

गाय के अन्य नाम: गौ, धेनु, गौरी, गैया, सुरभि, भद्रा, कामधेनु

प्रस्तुत की जाने वाली छवि: गाय को सर्वाधिक श्रीकृष्ण के चित्र में उनके पीछे खड़ा हुआ दिखाया जाता है। एक चित्र गाय का उसके बछड़े के साथ दुग्ध पान करते हुए होता है। आजकल एक चित्र और अधिक प्रचलन में है जिसमें गाय के शरीर पर अन्य देव एवं पवित्र प्रतीक प्रदर्शित  किए हुए होते हैं।

गाय का माहात्म्य: पुराणों के अनुसार गाय साक्षात विष्णु रूप है, सर्व वेदमयी एवं वेद गौमय हैं। भगवान राम के पूर्वज महाराजा दिलीप नन्दिनी गाय की पूजा करते थे। जीवन के प्रारंभ में श्रीकृष्ण एक ग्वाले के रूप में रहे तथा उनका गायों के साथ बहुत अधिक जुड़ाव रहा, गौचरण से ही उन्हें सारगर्भित ज्ञान प्राप्त हुआ था। गणेशजी का मस्तक काटने पर शिवजी को एक गाय दान करने का दंड दिया गया था परिणामस्वरूप माता पार्वती को गाय दान करनी पड़ी थी। भगवान भोलेनाथ का नंदी दक्षिण भारतीय आंगोल नस्ल का बैल है। गाय एक अत्यंत महत्वपूर्ण संसाधन रहा है जो कि पंच गव्य उपलब्ध कराती है। सनातन धर्म,  संस्कृति और पर्यावरण में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। गाय अत्यंत पवित्र एवं पूजनीय होती है। गाय में देवताओं का वास माना जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार गौ सर्वदेवमयी एवं वेद सर्वगौमय है। गाय समृद्धि, मातृत्व एवं अहिंसा का प्रतीक है। पृथ्वी को भी गौ कहा गया है। श्रीमद्भगवदगीता में भगवान कृष्ण ने कहा कि गायों में वे कामधेनु हैं । गुरु वशिष्ट ने गौवंश  का विस्तार किया। भगवान कृष्ण ने गाएं चराने का कार्य गोपाष्टमी से प्रारम्भ  किया था। गाय की योनि में से होकर ही आत्मा मनुुष्य योनि में प्रवेश  कर सकती है। बिल्वपत्र की उत्पत्ति  गाय के गोबर से ही हुई थी। गाय को ऋग्वेद में अघन्या, यजुर्वेद में गौ को अनुपमेय(जिसको कोई उपमा नहीं दी जा सकती) अथर्ववेद में संपतियों का घर कहा गया है।  

गौ-माता: हिंदू धर्म में गाय को मां का स्थान प्राप्त है। उसे गौ-माता पुकारा जाता है। गाय में 33 प्रकार के देवताओं का वास माना जाता है। उन्हें विष्णु का रूप भी माना जाता है।

अहिंसा का प्रतीक: गाय अहिंसा का प्रतीक है इसलिए भी वह अवध्य है।

करूणा का प्रतीक: गाय की रक्षा करना सभी जीवों के प्रति करूणा एवं उनकी गरिमा का प्रतीक है।

आध्यात्मिकता: ऐसी मान्यता है कि कई योनियों में भ्रमण करने के बाद आत्मा गाय की योनि में आती है और उसके बाद ही आत्मा मनुष्य योनि में आ पाती है।

व्रत:  गाय से जुड़े कई व्रत हैं। जिनमें गौवर्द्धन पूजा  एवं वत्स द्वादसी या बछबारस प्रमुख हैं। गोपद्वम व्रत,गोपाष्टमी व्रत, पयोव्रत आदि अन्य व्रत हैं।

आर्थिक महत्व: दूध, दही, मक्खन, छाछ, पनीर, गोबर एवं गौमूत्र सभी बिकते हैं जो कि आर्थिक लाभ देते हैं।

पर्यावरणीय महत्व: 

जैविक खादः गाय का गोबर जैविक खाद का महत्वपूर्ण स्रोत है। 

ईंधन: यह बायो गैस का महत्वपूर्ण स्रोत है। गाय के गोबर से निर्मित उपले धूप, हवन आदि में काम आते हैं। ईंधन के तौर पर भी इनका सीधा उपयोग होता है। 

वनों की कटाई में कमी: उपलों का एवं गोबर गैस के प्रयोग से जंगलों की जलाऊ लकड़ी पर दबाव कम होता है।

कृषि: गाय के गोबर का खाद भूमि को टिकाऊ उर्वरता देता है। गाय के बछड़े जो आगे जाकर बैल बनते हैं वे भी हल आदि चलाने में काम आते हैं।

स्वास्थ्य संबंधी उपयोग: 

पोषकता: गाय के दूध में उपस्थित कैल्शियम , प्रोटीन एवं विटामिन हड्डियों को मजबूती प्रदान करते हैं।

पाचन: दही पाचन में सुधार करता है।

प्रतिरक्षा प्रणाली: गाय का घी एवं दही प्रतिरक्षा प्रणाली को सषक्त बनाते हैं।

कैंसर व्याधि में उपयोग: कैंसर के उपचार एवं उसके रोकथाम में गौमूत्र को उपयोगी पाया गया है।

पवित्रता: गौमूत्र को अत्यंत पवित्र माना गया है। उसका उपयोग कई धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।

गाय अवध्य है: सनातन धर्म में गाय का वध करना, उसका मांस भक्षण करना अक्षम्य अपराध माना जाता है।

(टिप्पणी: गाय की महिमा अपरंपार है उसका वर्णन आसान नहीं है, संक्षेप में देने का प्रयास किया गया है।)



 

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

मयुर: सनातन धर्म का एक और प्रतीक Sacred Symbol of Sanatan The Peacock

 मयुर: सनातन धर्म का एक और प्रतीक 


  

प्रस्तुत की जाने वाली छवि: भगवान श्रीकृष्ण एवं मां सरस्वती के चित्र में अक्सर इसका चित्रण होता है। भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में मौरपंख होता ही है जो कि मयुर के महत्व को बताता है। श्रीकृष्ण के चित्र में दर्शाया  जाने वाला मोर एवं मयुर पंख प्राकृतिक सौंदर्य में आनंद से जीवनयापन करने का द्योतक है। यह प्रतीक है कि हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हुए आनंद से जीवननिर्वाह करना चाहिए।

माहात्म्य: सनातन धर्म का एक पवित्र प्रतीक है मयुर जोकि सौंदर्य, पुरुषत्व , गर्व ,गरिमा, आध्यात्मिकता एवं दिव्यता का प्रतीक है। मयुर पुनर्जन्म, विवेक, एवं संरक्षण को प्रदर्शित  करता है। सनातन धर्म में मयुर भी कई चित्रों में दिखाई देता है। ऐसी मान्यता है कि मयुर का सृजन भगवान विष्णु के वाहन गरूड़ के पंखों से हुआ है।

एक कथा के अनुसार श्रापवश  इंद्र के शरीर पर हजारों छाले हो जाने पर वह पंखों पर हजारों नेत्र सदृश्य धब्बों युक्त पक्षी बन गया।

एक अन्य कथा के अनुसार जब इंद्र रावण को युद्ध में पराजित नहीं कर पाया तो वह एक पक्षी के पंखों के पीछे छुप गया। बाद में इंद्र ने उस पक्षी को हजार नेत्र होने का वरदान दिया।

देवीय शक्तियों से संबध: 

कार्तिकेय का वाहन: भगवान शंकर के  बड़े पुत्र कार्तिकेय का वाहन है मयुर। भगवान कार्तिकेय युद्ध एवं विजय के प्रतीक हैं। कार्तिकेय  को अग्नि एवं स्वाहा का पुत्र भी माना जाता है परन्तु वाहन मयूर ही है। 

श्रीगणेश  का वाहन/आसन: श्रीगणेश  को मयुरेश्वर  भी कहा जाता है क्योंकि वे मयुरासन पर बैठे दिखाए जाते हैं।

मां सरस्वती से संबंध: मां सरस्वती के किसी किसी चित्र में मयुर भी दिखाया जाता है जो कि पूर्ण सुंदरता का द्योतक है। पूर्ण सुंदरता विवेक में अंतर्निहित होती है। 

मयुर मां लक्ष्मी का भी प्रतिनिधित्व करता है।

मयुर के पंखों में अनेक नेत्र सदृश्य  आकृतियां होती हैं जो कि दृष्टि, विवेक और अंतर्दृष्टि के द्योतक हैं।

सुंदरता एवं गरिमा का प्रतीक: मयुर सुदंरता एवं गरिमा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे सौंदर्य, लालित्य एवं स्पंदन के प्रतीक हैं।

संरक्षक: मयुर संरक्षक हैं। वे प्रतीक हैं सामर्थ्य , संरक्षण, आपदा के विरूद्ध डटकर खड़े रहने की प्रवृत्ति  का। इसी कारण मयूर युद्ध के देवता कार्तिकेय के वाहन हैं।  

आसुरी शक्तियों से रक्षा करने वााला: मयुर को सांप को मारते हुए दिखाया जाता है जो कि प्रतीक है बुराई से रक्षा करने का। इसीलिए आसुरी शक्तियांे से बचाव के लिए भी मयुर पंखों का उपयोग होता है। मयुर पार्थिव एवं दैवीय संबंध को अभिव्यक्त करते हैं। मयुर के पंखों का कई धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यां में उपयोग होता है।

भारत का राष्ट्रीय पक्षी: मयुर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है जिसको मारना अपराध है।



नाग पंचमी- पूजन एवं कथा Puja Wrat Upwas kathaen sandesh sanatan pratik

  नाग पंचमी- पूजन एवं कथा  


(श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में नाग पंचमी का व्रत किया जाता है। अग्रवालों में इसका विशेष महत्व है। एक दिन पहले सायंकाल भोजन बनाकर रख लिया जाता है क्योंकि उसी को दूसरे दिन प्रयुक्त करना होता है। चने, मूँग, आदि भिगो लिए जाते हैं।)

1 . पूजन विधि- 1. प्रातः शीतल जल से स्नान कर लेना चाहिए।

2. इस दिन वैसे तो साँप की बांबी पर जाकर नाग की पूजा की जाती है परंतु आजकल यह संभव नहीं है इसलिए घर के आंगन में साँप  की बांबी के प्रतीक स्वरूप रेती का छोटा सा टीला बना कर तथा उस पर नाग की मूर्ति रखकर पूजा कर सकते हैं। यदि नाग की मूर्ति नहीं हो तो गीली मिट्टी से कुंडली मार कर बैठे नाग बनालें।

3. पुजा  के प्रारंभ में प्राणायाम, ध्यान एवं गणपति की स्थापना कर पूजन करें।

4. दाहिने  हाथ में कुछ जल, कंकु, अक्षत, पुष्प लेकर निम्नलिखित संकल्प लें-

 - मेरे कुल में विभिन्न उपद्रवों के निवारण एवं रोग रहित आयुवृद्धि हेतु मैं नाग पंचमी व्रत करती हूँ।

                                                                      प्राकृतिक बाम्बी 

   


                                                                   रेत से बनी नाग की बांबी              

  


                                                                      रूई से बनी पुनियाँ          

5. नाग देवता का पूजन भी उसी विधि से किया जाता है जैसे कि सारे पूजन किये जाते हैं। इस पूजा में चूँकि ठंडे का ही प्रावधान है इसलिए प्रतीक स्वरूप  दिया एवं अगरबत्ती  बिना जलाए ही रख दिए जाते हैं। चित्र में दिखाए अनुसार रूई की पुनियां (रूई की पुनी पर कुछ कुछ दूरी पर बीच में कंकू एवं हल्दी लगाकर) बना कर नाग पर चढ़ाई जाती हैं। 

6 पिछले दिन बनाई गई ठंडी भोजन सामग्री का भोग लगाएँ। ठंडा ही भोजन किया जाता है।  सामग्री में दही का प्रयोग अवश्य  करें। 

7 सासूजी/बहिन बेटी के लिए बायना निकाले।

2   नागपंचमी की पौराणिक  कथामहाभारत काल में द्वापर युग की समाप्ति एवं कलियुग के प्रारम्भ के संधिकाल में राजा जनमेजेय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए नागों का संहार करने के लिए एक विशाल यज्ञ करवाया । राजा परीक्षित की मृत्यु सर्पों के राजा तक्षक के डसे जाने से हुई थी । हवन कुंड में लाखों नाग आहुति बन रहे थे । तब आस्तिक ऋषि ने राजा से इस यज्ञ को बंद करने का आग्रह  किया 

3  नागपंचमी की लोक कथा -

एक साहुकार था। उसके सात बेटे और बहुएँ थी। एक बार सातों बहुए खदान से मिट्टी लेने के लिए गईं। खोदते समय उसमें से एक नाग निकला। जब सभी बहुए नाग को मारने लगी तो सबसे छोटी बहु ने उसे मारने नहीं दिया और नाग को अपना भाई बनाते हुए बोली- “मेरे पीहर में बाप, बांबी में साँप।” तब सारी देरानी-जेठानियाँ बोली कि कल इसकी छाने लाने की बारी है, इसे वहीं भेजेगें, वहाँ नाग निकलेगा और उसे डस लेगा। जब दूसरे दिन छोटी बहु छाने लेने गई तो वहाँ नाग बैठा था, वह उसे देखकर जोर से फुफकारा। नाग को देखकर वह बोली- “भाईजी, राम राम।”  नाग बोला, “तुने मुझे भाई बोला है इसलिए वर्ना तो मैं डस लेता।” तो छोटी बहु बोली, “ऐसे कैसे डस  लेता तू तो मेरा धरम भाई है,” और बोली - 

जीवो नाग नागोलियो, जीवो वासुकी नाग, 

जिव मेरो लाड़ लड़ायो, नेवर घाली पाँव।

यह सुनकर नाग ने उसे नेवर देकर जाने दिया। पांव में नेवर पहिन कर छोटी बहु इठलाती हुई घर पहुंची तो उसकी जेठानियाँ उसे जीवित देखकर बोल पड़ी कि नाग ने उसे तो डसा ही नहीं। थोड़ी देर बाद नाग आया और बोला, “मेरी बहिन को भेजो मैं उसे ले जाने आया हूँ।”

 यह देखकर जेठानियाँ ईर्ष्यावश  आपस में चर्चा करने लगी कि देखो इसको तो इसका मुँह बोला धरम भाई नाग लेने आ गया और अपने को तो सगा भाई भी लेने नहीं आया। उन्होंने छोटी को तैयार कर भिजवा दिया। रास्ते में उन दोनों को खून की नदी बहती मिली। तब नाग उसे अपनी पूँछ पकड़ा कर नदी पार कराने लगा तो खून की नदी दूध की हो गई। वह अपने पीहर नाग के घर पहुँच गई। वहाँ नाग की माता एवं अन्य भाई भी रहते थे। वहाँ उसको बहुत लाड़ प्यार मिला। बहुत दिन हो गए, एक दिन नागिन छोटी बहु से बोली कि बेटी मैं काम से बाहर जा रहीं हूँ तू दूध को ठंडा करके भाइयों को पिला देना। छोटी बहु ने दूध को ठंडा किए बिना ही गर्म गर्म दूध ही पिला दिया इससे किसी का फन तो किसी कि जीभ जल गई। एक दिन पड़ोसन से झगड़े में उसने बोल दिया कि मेरखाड़िया-बाड़िया की सौगंध। यह सुनकर भाइयों को लगा कि बहिन अब ऊब गई हैं, उन्होंने माँ से कहा कि इसको बहुत दिन हो गए हैं अब इसे इसके ससुराल भेज दो। जब उसको बहुत सारा धन देकर विदा करने लगे तो ताई-चाची बोली कि बाईजी तुम्हारे भाइयों ने तुम्हे बहुुत लाड-़प्यार दिया पर विदा करते समय तुम्हे छ कोठार की चाबी तो दे दी पर सातवें कोठे की चाभी तो दी ही नहीं। तब उसने नाग भाई से पूछा कि उसने सातवें कोठे की चाबी क्यों नहीं दी तो भाई बोला कि सातवें कोठे की चाबी लेगी तो पछताएगी, पर उसने जिद करके चाबी ले ही ली। उसने सातवां कोठा खोला तो वह चौंक  पड़ी, उसने देखा कि उसमें एक बूढ़ा नाग बैठा था। उसने जोर से फुफकार मारी, छोटी बहु बोली कि बाबाजी राम राम। तब वह बुढ़ा नाग बोला कि तूने मुझे बाबाजी कहा इसलिए छोड़ देता हूँ वर्ना तुझे डस लेता। तो वह बोली मैंने आपको अपना पिता बनाया भला आप मुझे क्यों डस लेतेे। यह कहकर वह बोली -

जीवो नाग नागोलियो, जीवो वासुकी नाग

जिव मेरो लाड़ लड़ायो, नौ करोड़ का हार।

नाग देवता प्रसन्न हो गया और उसने हार निकालकर दे दिया। इस प्रकार बहुत सारा धन, जेवरात, हीरे जवाहरात लेकर वह अपने ससुराल पहुँची तो उसकी इस संपति को देखकर सारी जेठानियाँ बोली कि अपने को तो सगे पीहर से भी कुछ नहीं मिलता इसे तो पीहर नहीं होने के बाद भी इतना कुछ मिल गया। दूसरे दिन छोटी के बच्चे ताइयों के अनाज की बोरियाँ साफ करा रहे थे तो वे व्यंग में बोली की तुम हमारी बोरियाँ मत साफ कराओ, तुम्हारे मामा-नाना तो अजरांगिया-बजरांगियां हैं, वो सुनते होंगे तो चांदी की बोरियां मंगा देंगे। ये बात बच्चों ने अपनी मां से जाकर कही तो नाग भाई ने भी सुनली। उसने अपनी मां से कहकर सोने चांदी की बोरियां मंगवा दी और एक बाई रखवा दी। तीसरे दिन बच्चे उनके यहां झाड़ू निकाल रहे थे तो फिर से ताइयों ने ताना मारा तो नाग भाई ने सोने चांदी की झाड़ू मंगवा दी। यह देखकर ताइयों ने विचार किया कि इनको तो ताना मत मारो, ये तो जैसे सुनते हैं इसका घर धन दौलत से भर देते हैं। अपन इसके लिए राजा को जाकर भिड़ा देते हैं। वे राजा के पास गई और शिकायत करी कि उनकी देरानी के पास नौ करोड़ का हार है वो उसको थोड़े ही शोभा देता है वह तो रानी के गले में ही शोभा देगा। तब राजा ने साहुकार और उसकी बहु को बुलाकर उससे वह हार देने के लिए कहा। बहु ने उसे उदास मन से दे दिया पर साथ ही बोली कि “मेरे गले का मोती का हार, रानी के गले में नाग हो जावे”। यह कह कर वह जाने लगी तभी रानी के गले का हार  नाग हो गया और वह रानी को डसने लगा तो रानी ने राजा से यह कहकर कि बहु ने कुछ जादू टोना कर दिया है, बहु को फिर से बुलवा लिया। राजा ने उसे डाटा कि तूने रानी के साथ यह क्या कर दिया। तो छोटी बोली कि मैंने तो कुछ नहीं किया, मुझे तो मेरे मुंह बोले धरम भाई नाग देवता ने यह हार दिया था। यह सुनकर राजा ने वह हार वापस दे दिया और साथ ही एक हार अपनी तरफ से और दे दिया। यह देखकर जेठानियां और जल भून बैठी कि यह  तो राजा से भी नहीं डरी, तो फिर उन्होंने  उसके पति के कान भरे कि तेरी बहु तो सेठ के यहाँ जाती है और वहां से धन लेकर आती है तू उससे लड़ता क्यों नहीं है। यह सुनकर कान का  कच्चा उसका पति छोटी से झगड़ पड़ा और उसने पूछा सच बता तू इतना धन कहां से लाती है। यह सुनकर छोटी ने अब तक की घटना की सारी कहानी सुना दी। यह सुनकर उसके पति ने सारे गांव में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब कोई अब से नागपंचमी का व्रत करेंगे, नाग देवता की पूजा करेंग ,बाँसी खाएंगे और बायणा निकालेंगे।

हे नाग देवता जैसा बिना पीहर वाली छोटी बहु को दिखाया वैसा ही सभी कहने सुनने वालों को दिखाना।

इसके बाद कोई भी गणेशजी की कहानी कहें। 

4 .अनुकरणीय संदेश  -

  • सर्प की हत्या न करें।
  • किसी को भी आदर सूचक अपनत्व भरे वचनों से संबांधित करने पर वह आपका अपना हो जाता है।
  • किसी की उन्नति देखकर ईर्ष्या  न करें।


गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

चौथ माता की लोक कथा -1 पूजा , व्रत , उपवास , कथाएं , सनातन प्रतीक , Puja ,wrat upwas ,kathayen , sanatan symbols

 


चौथ  माता  की लोक कथा -1 




  एक माँ-बेटे थे। लकड़हारा बेटा कमाकर लाता जिससे दोनों का खर्च आराम से चल जाता था। बेटा जो लकड़ी लाता माँ उसमें से दो लकड़ी रख लेती तथा उन्हें बेचकर चौथ  माता के पूजन और व्रत की सामग्री लाती थी।चौथ के दिन 5 लड्डू बनाती। एक गणेश जी, एक चौथ माता का, एक बायणे का तथा चंद्र दर्शन  के बाद एक खुद खा लेती। एक चौथ के दिन बेटा अपने पड़ौस में गया वहाँ महिलाएँ चौथ माता की पूजा कर रहीं थी। यह देखकर बेटे ने पूछा कि आप सब क्या कर रहीं हैं? महिलाएँ बोली की हम चौथ माता का पूजन कर रहीं तेरी माँ तो हर महिने यह करती है, चूरमा बनाती है, क्या तुझे खाने को नहीं देती है? बेटा घर गया और माँ से लड़ने लगा कि मैं इतनी मेहनत से कमा कर लाता हूँ और तू लड्डू बना कर मजे से खाती है। माँ ने कहा - “बेटा यह व्रत तो मैं तेरी भलाई के लिए ही करती हूँ। तू ही बता भला कोई केवल लड्डू खाने के लिए दिनभर भूखा रहकर रात को चंद्रमा दिखने के बाद क्यों खाएगा।”... पर बेटे को क्रोध के कारण माँ की बात समझ में नहीं आई। उसने माँ को चौथ का व्रत करने के लिए मना किया और रूठ कर घर से जाने लगा। माँ  ने कहा - “बेटा ले ये आखे(अक्षत/पूरे चावल) ले जा, जब भी तुझ पर कोई संकट आए चौथ माता का नाम लेकर छोड़ देना तेरा संकट दूर हो जाएगा।”

  बेटा घर छोड़ कर निकल पड़ा। मार्ग में एक खून की नदी मिली। उसने आखे छोड़े और बोला यदि चौथ माता तू सच्ची है तो मूझे रास्ता दे। नदी में रास्ता बन गया और वह नदी के पार आगया। आगे बाघ आदि वाले जंगल में फंसा। उसने चौथ माता के नाम पर आखे छोड़े। फिर से उसे रास्ता मिल गया। इससे उसको चौथ माता के प्रताप पर विश्वास हो गया। आगे जाकर एक ऐसे राज्य में पहुँचा जहाँ का राजा हर माह एक  मनुष्य की बली देता था। ठिकाने की तलाश  में वह एक वृद्धा माँई के घर पहुँचा। उसने देखा कि वृद्धा मालपूए बनाती जा रही थी और रो भी रही थी। उसने रोने का कारण  पूछा। वृद्धा ने बताया कि आज राजा उसके बेटे की बली चढ़ाने वाला है। यह सुनकर चौथ माता पर विश्वास  के चलते उसने कहा कि मुझे मालपुआ खाने को दे दे मैं तेरे बेटे की जगह चला जाउँगा। मालपूए खाकर वह सो गया। राजा का बुलावा आने पर उसे वृद्धा ने जगा दिया। वह उठकर जाते हुए आखे छोड़ता गया और चौथ माता से विनती करता गया कि हे माता मेरे संकट को टालना। राजा ने बली देने के लिए मिट्टी के घड़े पकाने के लिए आवा तैयार कर रखा था। बेटा आवा में बैठ गया। तीन दिन निकल गए। आवा के पास खेलने वाले बच्चों ने आवा पर कंकर मारा तो आवा के पकने की आवाज आई। बच्चों ने राजा को आवा पकने का समाचार दिया। राजा को आश्चर्य  हुआ कि आवा पकने मेें छः महीने लगते हैं तीन दिन में कैसे पक गया। राजा आवे के स्थान पर गया तो देखा कि वहांँ पर जवारे उगे हुए थे और मिट्टी के घड़ों के स्थान पर सोने-चांदी के कलश  दिखाई दे रहे थे। राजा आश्चर्य  चकित होकर कलश  उतारने लगा इतने मे आवाज आई- हे राजा कलश  धीरे-धीरे उतारना। राजा डर गया कहीं लड़के का भूत तो नहीं है? लड़के ने कहा- “हे राजन डरो मत मैं तो वही लड़का हूं जिसकी तुमने  बली दी थी। मेरी माँ  चौथ माता का व्रत करती थी उसी के प्रताप से मैं बच गया।“

 राजा ने उसकी बात की सच्चाई को परखने के लिए उसे जंजीरों से बँधवा दिया और बोला कि अब छूट कर बता। चौथ माता सच्ची होगी तो यह जंजीर खुल जाएगी और मुझे बाँध लेेगी। लड़के ने चौथ माता का नाम लेकर आखे छोड़ते हुए कहा कि तूने मुझे तीन संकटों से उबारा है अब इस चौथे संकट से भी मुझे निकाल। यह कहते से ही वह बंधन मुक्त हो गया और राजा जंजीर में बंध गया।

  राजा ने अपनी बेटी का विवाह उस लड़के से कर दिया। एक दिन दोनों पति-पत्नी बैठे हुए थे तो बिजली कड़की, जिसे देखकर लड़का बोला कि मेरे गाँव में बिजली चमकी है।  राजकुमारी बोली जब क्या आपका गाँव भी है? हां गाँव भी है और वहाँ माँ भी है? अरे तो फिर आप अपनी माँ  को अकेली छोड़कर यहां क्यों बैठे हैं? बेचारी सासुमाँ  किस हाल में होगी? चलो अपने गाँव चलो।..... राजा ने दोनों को बहुत सारा धन देकर उनको विदा किया।

  गाँव पहुँचने पर वे माँ  से मिले और माँ  के पैर पड़ते हुए बोले- माँ  तेरी चौथ माता की कृपा और प्रताप से ही मैं वापस जीवित लौट सका हूँ।... माँ  ने सारे गाँव  में ढूंढी  पिटवा दी कि साल में 13 नहीं तो 4 नहीं तो कम से कम 2 चौथ माता के व्रत तो अवश्य  करें। बाद में बहु और गाँव की अन्य महिलाएँ भी व्रत करने लगी और चौथ माता के आशीर्वाद से सभी सुखपूर्वक रहने लगे।

  हे चौथ माता, जैसा लड़के का संकट टाला और उसके परिवार को सुख-समृद्धि दी वैसे ही सबके दुखों को दूर करना और सबको सुख शांति देना।

अनुकरणीय संदेश :-

  •  दृढ़ आस्था से की गई आराधना व्यक्ति में आत्मविश्वास उत्पन्न करती है जिससे उसे जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
  •   सुख-समृद्धि प्राप्त होने पर अपने माता-पिता और परिवार को नहीं भूल जाना चाहिए।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी- सिद्धिनायक व्रत- (गणेश चौथ ) Puja ,wrat ,upwas ,kathaen ,sacred symols of sanatan dharm

 भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी- सिद्धिनायक व्रत- (गणेश  चौथ ) 


(भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को यह व्रत किया जाता है। वस्तुतः इसे हम गणेश  चौथ  के नाम से अधिक जानते हैं। इस तिथि को चंद्र दर्शन  वर्जित है, चंद्र  दर्शन हो जाने पर मिथ्या कलंक लगने की संभावना रहती है। इसलिए इस चौथ पर चंद्र  दर्शन नहीं किए जाते जबकि अन्य चौथ पर चंद्रदर्षन कर ही व्रत खोला जाता है। )

मध्यान्ह में सिद्धिविनायक का ध्यान कर श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक पूजन करें।

1 पूजा से पूर्व नित्यानुसार स्नान, स्वयं के मस्तक पर तिलक करवा लें, लच्छा बांध लें एवं पूर्व या उत्तर  दिशा  में मुँह कर निम्नानुसार आचमन, प्राणायाम एवं ध्यान करें।

2 सर्वप्रथम शुभ मुहुर्त में दीपक एवं अगरबत्ती  प्रज्ज्वलित करलें।

3 पवित्रीकरण- ॐ अपवित्रः पवित्रों वा सर्वावस्थां गतोअपि वा। ॐ पुंडरीकाक्षः पुनातु, ॐ पुंडरीकाक्षः पुनातु, ॐ पुंडरीकाक्षः पुनातु का  उच्चारण करते हुए स्वयं एवं पूजन सामग्री पर पवित्र जल का छिड़काव करदें।

4 पवित्रीधारण- यदि उपलब्ध हो तो कुशकी रिंग बनाकर दाहिने हाथ की अनामिका में पहन लें।

5 आचमन -  ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः। इन मंत्रोंको बोलकर कर्पुरसे सुवासित आचमन करें। आचमन के लिए हर बार इसी सुवासित जल का उपयोग करें।

6 ॐ हृषिकेशाय नमः का उच्चारण करते हुए हाथ धोलें।

7 प्राणायाम - गायत्रीमंत्र “ओम भुर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोद्यात” का वाचन करते हुए 5 बार अनुलोम विलोम प्राणायाम करलें।

8 रक्षाद्वीप प्रज्वलन - अक्षतों पर घी का दीप रखकर प्रज्वलित करें। अगरबत्ती जला लें। 

9 शांति पाठ करें। ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षः शांतिः पृथिवी शान्तिरापः शांतिरोषधयः शांति। वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः शांतिब्र्रह्म शांति सर्व शांतिः शांतिरेव शांति सा मा शांतिरेधि ॐ

10 गणपति की स्थापना एवं पूजा करें।

11 यदि पहलें से पूजित प्रतिमा नहीं है तो बाएं हाथ में अक्षत लेकर दाहिने हाथ से कुछ  अक्षत लेकर नई प्रतिमा या सुपारी पर छोड़ते हुए निम्न मंत्र का वाचन करते हुए प्राणप्रतिष्ठा करें-

ॐ मनो जूतिर्जुषता माज्यस वृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ समिमं दधातु। विश्वेदेवास इह मादयन्तामो प्रतिष्ठ।। ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठंतु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च।। अस्यै देवत्व मर्चायै मामहेति च कश्चन।।  

12 गणपति-गौरी पूजन- हाथमें अक्षत लेकर गणेश जी का ध्यान करें।             ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः उच्चारण करते हुए अक्षत चढ़ादें।

 गणपतिके दाहिनी ओर भगवती गौरीका आहवान करें। उनपर अक्षत अर्पित करें।

12.1 आसनम् समर्पियामी कहते हुए आसनके पास अक्षत छोड़दें। आचमन समर्पियामी कहते हुए आचमन अर्पित करें।

12.2 स्नानम् समर्पियामी कहते हुए शुद्धजल से स्नान कराएँ।

12.3 पंचामृत स्नानम् समर्पियामी कहते हुए पंचामृतसे स्नान कराएँ।

12.4 शुद्धोदक स्नानम समर्पियामी कहते हुए शुद्धजल से स्नान कराएँ।

12.5 वस्त्रं समर्पियामी कहते हुए रोली लच्छा चढ़ाएँ। 

12.6 यज्ञोपवीत समर्पियामी कहते हुए जनेउ चढ़ाएँ एवं आचमन कराएँ।

12.7 उपवस्त्रं समर्पियामी कहते हुए यदि कोई वस्त्र हो तो या लच्छा चढ़ाएँ एवं आचमन कराएँ।

12.8 चंदनानुलेपं समर्पियामी कहते हुए चंदन चढ़ाएँ।

12.9 अक्षतं समर्पियामी कहते हुए अक्षत चढ़ाएँ।

7.12.10 पुष्पं समर्पियामी कहते पुष्प एवं माला तथा श्री गणेष के इक्कीस नाम लेकर इक्कीस प्रकार के पŸो समर्पित करें।

1. ॐ सुमुखाय नमः - शमी पत्र  2. ॐ गणाधीषाय नमः  - भंगरैया का पत्ता  3. ॐ उमापुत्राय नमः - बिल्व पत्र 4. ॐ गजमुखाय नमः - दूर्वादल 5, ॐ लंबोदराय नमः - बेर का पत्ता  6. ॐ हरसूनवे नमः - धतूरे का पत्ता   7. ॐ शूर्पकर्णाय नमः - तुलसी दल  8. ॐ वक्रतुंडाय नमः - सेम का पत्ता   9. ॐ गुहाग्रजाय नमः - अपामार्ग का पत्ता  10. ॐएक दंताय नमः - वनभंटा का पत्ता  11. ॐ हेरंबाय नमः - सिंदूर का पत्ता या चूर्ण  12. ॐ चतुर्होत्रे नमः - तेजपात 13. ॐ सर्वेषराय नमः - अगस्त्य का पत्ता  14. ॐ विकटाय नमः - कनेर का पत्ता 15. ॐ हेमतुंडाय नमः - कदली पत्र  16. ॐ विनायकाय नमः - आक का पत्ता 17. ॐ कपिलाय नमः - अर्जुन का पत्ता 18. ॐ वटवे नमः - देवदार का पत्ता 19. ॐ भालचंद्राय नमः - मरूआ का पत्ता  20. ॐ सुराग्रजाय नमः - गांधारी पत्र 21. ॐ सिद्धिविनायकाय नमः - केतकी पत्र।

यह संभव है कि हम न तो इन सभी प्रकार के पत्तों  को पहचानते हैं और न ही ये आसानी से उपलब्ध हो सकते हैं। अतः जो पत्ते  उपलब्ध न हो सकें उनके स्थान पर बिल्व पत्र को समर्पित कर दें।

12.11 इसी प्रकार संबंधित वस्तु का नाम.......समर्पियामी के साथ लेते हुए अबीरं, धूपं, दीपं चढ़ाएँ। दीप के बाद हाथ धो लें।

.12.12 नैवेद्यं समर्पियामी कहते हुए गुड़ एवं मोदक(लड्डू) चढ़ाएँ एवं आचमन कराएँ।

12.13 ऋतुफलं, तांबुलम्, द्रव्य दक्षिणाम् समर्पियामी।(ये सब वस्तुएं चढ़ाएं)

12.13. आरती, कर्पुर आरती एवं शीतला आरती करें।

12 .14 पुष्पांजलि करें। 

12 .15 पूजन में जाने अनजाने रही किसी भी त्रुटि, कमी  हेतु  क्षमा याचना करें।