मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

श्री पंचमुखी हनुमान , प्रतीकात्मक अर्थ / Symbolic Meaning

 

        श्री पंचमुखी हनुमान 



नाम का माहात्म्य: हनुमानजी के पांच मुख भिन्न भिन्न शक्तियों एवं दिशाओं को अभिव्यक्त करते हैं। राम रावण युद्ध के दौरान अहिरावण को प्राप्त वर के अनुसार पांचों दिशाओं में जल रहे दीपकों को एक साथ बुझा सकने वाला योद्धा ही उसका वध कर सकता था। अतः श्रीहनुमान ने पांचमुख वाला  रूप धारण कर पांचों दिशाओं के दीपकों को एक साथ बुझाकर अहिरावण का वध किया।

छवि: सामान्यतः प्रदर्शित की जाने वाली छवि में पंचमुखी हनुमानजी के पांच मुख एवं दस भुजाएं होती हैं। भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र होेते हैं। एक भुजा वर देने की मुद्रा में होती है। पांच मुख हैं:- हनुमान मुख, नरसिंह मुख, गरूड़ मुख, वराह मुख एवं हयग्रीव मुख। 

हनुमान मुख: यह मुख पूर्व दिशा को दर्शाता है  अतः इसे पूर्व दिशा  की ओर रखा जाता है। यह मुख हनुमानजी के मुख्य रूप का प्रतीक है। यह मुख बल, बुद्धि, विद्या, भक्ति और समस्त प्रकार के संकटों को दूर करने का प्रतीक है। इस मुख की आराधना करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।

नरसिंह मुख: सिंह के मुख की आकृति का यह मुख दक्षिण दिशा का प्रतिनिधित्व करता है। यह मुख भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार का प्रतीक है। यह ज्ञात-अज्ञात भय से बचाव एवं तनाव को दूर करता है। शत्रुओं एवं आसुरी शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करने के प्रति आश्वस्त  करता है।

गरुड़ मुख: गरुड़ के मुख की आकृति का यह मुख पश्चिम  दिशा  को बताता है। यह भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का प्रतीक है। जीवन पथ की बाधाओं, परेशानियों, नकारात्मक शक्तियों, विशाक्त वस्तुओं एवं बुरी नजर से बचाता है।

वराह मुख: दांत वाले जंगली सुअर के मुख का यह मुख उत्तर  दिशाका प्रतिनिधित्व करता है। यह विष्णु भगवान के तृतीय अवतार वराह का प्रतीक है। यह भूमि, स्थिरता, सुख और समृद्धि का प्रतीक है। मान्यता है कि यह मुख आयु वृद्धि करता है एवं समाज में यश  प्राप्त होता है।

हयग्रीव(अश्वमुख) मुख: भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार के प्रतीक के रूप में  अश्व  के मुख की आकृति का यह मुख ऊर्ध्व दिशा  अर्थात ऊपर आकाश  की ओर की दिशा  को दर्शाता  है।(चित्र मेें ऊपर की ओर प्रदर्शित  नहीं हो पाता है।) यह उच्च शिक्षा, ज्ञान एवं बुद्धि का प्रतीक है। यह सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के प्रति आश्वस्त  करता है। हयग्रीव ज्ञान के संरक्षक देवता हैं। ब्रह्माजी द्वारा रचित वेदों को दो असुरों ने चुरा लिया था। वेदों के बिना संपूर्ण सृष्टि में अज्ञानरूपी अंधकार व्याप्त हो गया। तब भगवान विष्णु ने संसार को अज्ञानता से बचाने के लिए अश्व  के सिर वाला मानव शरीर धर कर असुरों का वध कर वेदों की रक्षा की और उन्हें वापस ब्रह्माजी के हवाले किया।

(एक कथा और है, भगवान विष्णु की मुस्कारहट को व्यंग समझ क्रोध में लक्ष्मीजी के श्राप से विष्णुजी का सिर धड़ से अलग हो गया, बाद में देवी के अनुरोध पर ब्रह्माजी ने अश्व  का सिर काटकर विष्णु जी के लगा दिया और वे हयग्रीव होगए। इन्होंने वेदों को चुराने वाले असुर हयग्रीव का वध किया और वेदों को मुक्त कराया। असुर हयग्रीव को वर प्राप्त था कि उसका वध उसी के स्वरूप द्वारा ही हो सकता है अतः विष्णु ने हयग्रीव अवतार धारण किया। )

भुजाओं में दिखाई गई वस्तुओं और अस़्त्र-शस्त्र प्रतीकों के संक्षेप में अर्थ:-

आशीर्वाद मुद्रा: निश्चिंतता  का आश्वासन। 

कमंडल: ज्ञान, बुद्धि एवं विवेक का भंडार।

ढाल: आसुरी प्रवृत्तियों  से सुरक्षा।

तलवार, फरसा, छुरी: शत्रुओं के नाश  के साधन। 

पाश : दुष्प्रवृतियों  को बांध कर रखना, उन्मुक्त न होने देना।

अंकुश: बलशाली आसुरी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखना।

त्रिशूल: त्रिदोष जनित व्याधियों पर नियंत्रण। तमस, राजस एवं सात्विक प्रवृत्तियों में संतुलन।

गदा: प्रभुत्व एवं बलशाली होने का द्योतक।

वास्तु दोष : चूंकि उन्होंने पंचमुख से सभी दीपकों को बुझा दिया इसलिए यह मान्यता है कि पंचमुखी हनुमानजी की तस्वीर या मुर्ति को घर में स्थापित करने से घर में चारों ओर व्याप्त समस्त वास्तु दोष दूर हो जाते हैं। यह भी मान्यता है कि इनकी तस्वीर को घर के प्रवेश  द्वार पर लगाने से आसुरी शक्तियां घर में प्रवेश  नहीं कर सकती हैं और घर में रहने वाले सुरक्षित रहते हैं।       प्रस्तुति - दुष्यन्त अग्रवाल 


 


 

श्री हनुमान , Shri Hanuman , बजरंग बली Bajrang Bali की छवि की प्रतीकात्मक /Symbolic व्याख्या

 द्वितीय प्रकरण: श्री हनुमान जी 


                   

हनुमानजी के अन्य प्रमुख नाम: मारूति-नंदन, पवन-सुत, महावीर, बजरंग बली, राम दूत, केसरी नंदन, आदि

नाम का माहात्म्य  : हनु का अर्थ होता है ठोड़ी / नीचे का जबड़ा।  हनुमानजी का जबड़ा चेहरे से आगे उठा हुआ  है अतः उनका नाम हनुमान पड़ा।  वे पवन के पुत्र हैं अतः उन्हें मारुतिनंदन, पवनसुत भी कहते हैं। उनके अंग वज्र के समान कठोर हैं अतः वे  वज्रअंग कहलाए, अपभ्रंश होकर बजरंग हों गया।  

हनुमानजी की प्रस्तुत की जाने वाली प्रमुख छवियां: 1. पर्वत हाथ में लेकर उड़ते हुए, 2. सीना चीर कर श्रीराम-सीता की छवि दिखाते हुए 3. राम दरबार में शांति से कार्य करने के लिए तत्पर  बैठे हुए

हनुमानजी प्रतीक हैं: वे अवतार हैं शिव के। वे वनों में रहने वाले वनवासी मानव हैं। प्रतीक हैं सेवा, भक्ति और समर्पण के।

अर्द्धमानव स्वरूप: उनको दिखाया जाता है एक अर्द्धमानव स्वरूप में परंतु वस्तुतः उनके गुण अतिमानव/देवता के है

लंबी पूंछ: वस्तुतः उनके वानर होने का द्योतक नहीं अपितु उस वनवासी समाज के साथ जुड़ी पूंछनुमा पहचान का द्योतक है जिस का वे प्रतिनिधित्व करते हैं । वो पूंछ उन वनवासियों की पहचान थी जो कि बनावटी होती थी।   वो उनको अत्यंत प्रिय होती है। उस प्रतीक का कोई अपमान सहनीय नहीं होता है। क्या कोई भी वानर जनेऊ पहनेगा? क्या वह विद्यावान एवं गुणी हो सकता है?

शक्ति एवं भक्ति के प्रतीक:वे प्रतीक हैं असीमित शक्ति, भक्ति, साहस, निडरता एवं वीरता के।

समर्पण के प्रतीक: अपने आराध्य के प्रति समर्पित, हर परिस्थिति में उनकी सेवा में सदा तत्पर रहने वाले।(राम-दूत/रामदास)

प्रतीक हैं: बुद्धि, सत्य भाषण, ज्ञान के भंडार के।

पर्वत को उठाकर ले जाने वाली छवि: अपने प्रभु/स्वामी  द्वारा सौंपे गए साध्य/असाध्य/कठिन कार्य को करने के लिए तत्पर रहने की द्योतक।

हाथ में गदा: आसुरी शक्तियों के विनाश  हेतु। अर्थात् मन की दुष्प्रवृतियों पर नियंत्रण।

सीने में सीता-राम की छवि: अहंकार रहित होेकर अपने प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण का द्योतक।

राम दरबार में राम के चरणों में बैठी हुई छवि: यह छवि द्योतक है सेवक की। सत्य के प्रति समर्पित शांत, नियंत्रित एवं एकाग्र मस्तिष्क की। उनकी बैठने की स्थिति इस बात की  द्योतक है कि वे श्रीराम का आदेश मिलते से ही तत्काल खड़े हो सकें । इस इस तरह बैठने का नाम ही हनुमान बैठक पड़ गया है। 

मारूति नंदन: मारूत के पुत्र के रूप, प्रतीक हैं प्राणायाम की शक्ति के। प्राणायाम एवं मस्तिष्क सीधे जुड़े हुए हैं।

सीता का पता लगाना: यह प्रतीक है नियंत्रित एवं शांत मस्तिष्क का जो घोर जंगल में भी सीता(शुद्ध बुद्धि) को खोज लेता है। अर्थात् स्वयं की आंतरिक छुपी हुई क्षमता को पहचानना।

(यदि हम हनुमान चालीसा पर विचार करें तो हम पाते हैं कि  वह हनुमानजी रूपी प्रतीक के गुणों  से हमें अवगत कराती है। )                                       

                                                        प्रस्तुति: दुष्यन्त अग्रवाल


रविवार, 19 अक्टूबर 2025

श्री गणेश, प्रथम पूज्य , रिद्धि सिद्धि प्रदाता की प्रतीकात्मकता Shri Ganesh and Its Symbolic meaning


प्रथम प्रकरणः गणेशजी 

सनातन धर्म में विभिन्न देवी देवताओं को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत/चित्रित किया जाता है। विभिन्न स्रोतों से हम सभी इसकी कुछ कुछ जानकारी रखते हैं। प्रस्तुत शृंखला  में प्रतीकों के अर्थ को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

गणेश जी के प्रतीकात्मक स्वरूप से हम सभी भली भांति परिचित हैं। 

1. गज मस्तक: बड़े आकार का मस्तक । तीव्र बु़िद्ध एवं बड़ी सोच का द्योतक।

2. छोटे नेत्र: तीक्ष्ण दूष्टि, एकाग्रता एवं दूरदृष्टि के द्योतक।

3. बड़े कान: अधिक सुनों/दूसरों की बात को ध्यान से सुनों।

4. छोटा मुख: कम बोलों/ अनावश्यक नहीं बोलना।

5. पूर्ण दाँत : आस्था का द्योतक।. खंडित दांत: बुद्धि । अच्छाई को संभालों और बुराई का परित्याग करों। जीवन में प्रगति के लिए बुद्धि एवं आस्था दोनों का होना आवश्यक  है। कभी किसी ज्वलंत समस्या का समाधान बुद्धि से न मिले तो उसे ईश्वर (आस्था) पर छेाड़ दों।

6. सूंड: उच्च शक्ति, उच्च दक्षता एवं उच्च अनुकूलन क्षमता (किसी भी परिस्थिति में स्वयं को ढाल लेना।) सूंड बड़े अवरोधों को हटा भी देती है तो कोमल वस्तुओं को आहिस्ता से उठा भी लेती है।  

7. फरसा: आत्मरक्षा, लगाव के सभी बंधनों को त्याग देना, ईच्छाओं और मद को नियंत्रित करना।

8. पाश /रस्सी: अपने आपको सत्य के निकट ले जाना।सत्य पर चलो, सत्य से बंधकर रहो।

9. आशीर्वाद मुद्रा में हथेली: ब्रह्म तक पहुंचने के मार्ग को प्रशस्त करना एवं अवरोधों  से बचाने हेतु आशीर्वाद प्रदान करना।

10. मोदक: साधना का पुरस्कार, प्रसन्नता, संतोष एवं पोषण। कठोर एवं सूखा लड्डू अंदर से मीठा होता है।

11. बड़ा उदर: समस्त बुरे एवं अच्छे अनुभवों को शांतिपूर्वक अपने में समा लेना। गोपनीयता को बनाए रखना।

12. छोटे पांव: किसी भी कार्य हेतु जल्दबाजी नहीं करना। पूर्ण विचारोपरांत आगे कदम बढ़ाना ।

13 . चूहा: चूहा किसी भी वस्तु को अपने तीक्ष्ण दांतो से नुकसान पहुंचा सकता है। व्यक्तित्व में विद्यमान चूहा रूपी आंकाक्षाएं आपकी सारी तपस्या को भंग कर सकती हैं। उसेे नियंत्रण में रखना आवश्यक है । चूहा खेती को नुकसान पहुंचाता है उसे नियंत्रण में रखो।            प्रस्तुति: दुष्यन्त अग्रवाल 

 

माँ सरस्वती Ma Saraswati/Basant Panchami दीपावली के दिन पूज्य गणेशजी लक्ष्मीजी के साथ पूज्य विद्या की देवी/बसंत पंचमी की आराध्य देवी

  मां सरस्वती एवं बसंत पंचमी 

अन्य नाम: शारदा, वीणाधारिणी, वागेश्वरी, भारती, हंसवाहिनी, वाग्देवी, शुभदा, सौम्या 

मां सरस्वती की छवि: सामान्यतः मां सरस्वती के चित्र में उन्हें श्वेत कमल पर बैठी हुई, वीणा हाथ में लिए हुए, श्वेत वस्त्रों में, पास में धवल हंस बैठा हुआ, दिखाया जाता है।

सरस्वती का अर्थ: स्व के सार का बोध कराने वाली। वह देवी हैं आध्यात्मिक ज्ञान एवं विवेक की। वह शक्ति हैं सृष्टि रचयिता ब्रह्मा की जिनको की ब्रह्मांड की रचना करने के लिए समस्त प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता होती है। वे विद्या, वाणी, कला, कौशल, बुद्धि, की देवी हैं।

श्वेत वस्त्र: उनके श्वेत वस्त्र शुद्धता को व्यक्त करते हैं, ज्ञान बिना भ्रांति एवं मिथ्याबोध के शुद्ध एवं पवित्र होना चाहिए। 

वीणा: एक हाथ में वीणा प्रतीक है आनंद, तारतम्यता, समरसता एवं तादात्म्य की। जो कि ज्ञान एवं विवेक से प्रस्फुटित होते हैं। 

श्वेत हंस: हंस द्योतक है विभेदीकरण बुद्धि का, अर्थात् सत्य ज्ञान को ग्रहण करना एवं असत्य को त्याग देना। हंस के लिए ऐसा माना जाता है कि वह पानी में से दूध को पृथक करने की क्षमता रखता है।

मयूर: किसी चित्र में मयूर भी दिखाया जाता है जो कि पूर्ण सुंदरता का द्योतक है। पूर्ण सुंदरता विवेक में अंतर्निहित होती है।

पूर्ण विकसित श्वेत कमलासन: यह अभिव्यक्त करता है चिद्क्तिश  अर्थात शुद्ध चेतना को, जो कि सद्-चित-आनंद का मध्य शब्द है। विवेक प्राप्ति हेतु शुद्ध चेतना एक सशक्त मूलाधार है।

चार हाथ: ये प्रतीक हैं हमारे मस्तिष्क के चार पक्षों मन, बुद्धि, अहंकार एवं चित्त के।

नवरात्रि: नवरात्रि के अंतिम तीन दिन मां सरस्वती को समर्पित हैं। योग साधना के अंतिम तीन दिनों में साधक विवेक को प्राप्त कर लेता है।

आभा मंडल: मां सरस्वती के चारों ओर प्रदर्शित आभा मंडल  ज्ञान एवं विवेक के प्रसार को दर्शाता है। 

एक हाथ में पुस्तक(वेद): वेद पूर्ण एवं शुद्ध ज्ञान को प्रतिबिंबित करते हैं।

बसन्त पंचमी: माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी मनाई जाती है। पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन माँ सरस्वती का प्राकट्य  हुआ था। जब सृष्टि के प्रारम्भ में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में नीरवता व्याप्त थी तब भगवान ब्रह्मा के द्वारा अपने कमण्डल में  से जल छिड़कने से माँ सरस्वती प्रकट हुई थी। यह दिन विद्या और सृजन कार्य से सम्बद्ध व्यक्तियों यथा विद्यार्थियों, शिक्षकों, साहित्यकारों,संगीतकारों, कलाकारों आदि हेतु अत्यंत शुभ माना जाता है। विद्यालयों में भी माँ सरस्वती का पूजन किया जाता है। सन 1960 से पहले बचपन में हमें विद्यालयों में पीले रंग के वस्त्र पहन कर जाना होता  था।  बंगाल में तो यह दिन बहुत ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन विद्या आरम्भ , अन्नप्राशन , और अन्य शुभ कार्य प्रारम्भ करना श्रेष्ठ  माना जाता है। गृह प्रवेश , विवाह हेतु यह अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन माँ सरस्वती की आराधना करने से ज्ञान , बुद्धि और विवेक का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 

इस दिन पीले रंग का अत्यधिक महत्व है। खेतों में सरसों के पीले फूल खिले हुए होते हैं। सभी देवी देवताओं का पीले रंग की सामग्री से शृंगार किया जाता है। पीले रंग के मिष्ठान का भोग लगाया जाता है। घरों में भी पीले रंग की भोजन सामग्री की प्रचुरता होती है।  

सनातन धर्मावलम्बियों को घर में बच्चों से माँ सरस्वती के पास पाठ्य पुस्तकें और अन्य पाठ्य सामग्री रखकर उन का पूजन अवश्य करवाना चाहिए और "हे माँ सरस्वती मुझे   विद्या , ज्ञान ,  बुद्धि और विवेक प्रदान कर "  बोलकर प्रार्थना करने हेतु प्रेरित करना चाहिए। 

यह त्यौहार केवल ऋतु परिवर्तन ही नहीं अपितु जीवन में नई ऊर्जा , आशा, और सृजन का प्रतीक है। 


                                                                 




सनातन धर्म के पवित्र प्रतीक Sacred Symbol of Sanatan /Hindu Dharm

 सनातन धर्म के पवित्र प्रतीक

सनातन धर्म सृष्टि के प्रारंभ से प्रचलित धर्म है। इस धर्म का न आदि है और न ही अंत। यह धर्म कुछ शास्वत  मूल्यों पर आधारित है। उन मूल्यों पर चलने वाला सनातनी होता है। आजकल इसे मुख्यतः हिंदुओं से जोड़ा जाता है परंतु इसके प्रमुख मूल्य भारत भूमि से निकले सभी धर्मों यथा जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि में भी होते हैं। सनातन धर्म के भगवानों, देवी-देवताओं के चित्र या मुर्तियां होती हैं। ये चित्र या मुर्तियां वस्तुतः उनके प्रतीक हैं जो उनके लक्षणों पर आधारित होते हैं। इसी प्रकार से अनेक अन्य वस्तुएं हैं जो कि पवित्र चिह्नों/प्रतीकों के रूप में मानी जाती है।

हम जानते हैं कि प्रत्येक नाम अपने आप में एक प्रतीक है। सभी प्रतीक किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, विचार आदि से संबद्ध होते हैं। किसी भाषा के संकेत उस भाषा का जानकार समझता है। अतः प्रतीक भाषा एवं संस्कृति आधारित होते हैं। प्रतीक व्यक्ति विशेष के लिए देश , काल एवं परिस्थिति के अनुसार अर्थ रखते हैं। उदाहरण के लिए गाय सनातनियों के लिए पवित्र तथा अवध्य है तो अन्यों के लिए वह बीफ का स्रोत है। प्रत्येक संकेत कहां स्थापित है वह उस स्थान का द्योतक होता है। जैसे अगर क्रॉस किसी भवन पर लगा है तो वह चर्च है जबकि जमीन पर लगा क्रॉस कब्र को बताता है। 

सनातन एवं उनके शास्त्रों में बार बार इसी बात पर बल दिया गया है कि आप सभी ईश्वर  की दृष्टि में समान हैं। सनातन में सभी प्रकार की धार्मिक क्रियाएं यथा हवन, पूजा, आराधना, प्रार्थना, ध्यान, योग, मंत्र, वेदांत, सामाजिक कार्य, आदि मानव मात्र की सहायता एवं भलाई के लिए रखी गईं हैं भले ही आप किसी भी भगवान को माने या न माने।

भगवान के प्रतीकों का अर्थ है कि धार्मिक प्रतीकों जिन्हें की देवताओं की आराधना हेतु प्रयुक्त किया जाता है उनकी व्याख्या करना एवं उन्हें समझकर स्वयं के जीवन में अपनाना। सनातन में एक सर्वोच्च सत्ता  ईश्वर  की कई स्वरूपों में आराधना की जाती है। ये स्वरूप ईश्वर की विभिन्न शक्तियों, लक्षणों, गुणों आदि पर आधारित होते हैं। उनके रंग-रूप, वस्त्राभूषण, उनकी सिरों की संख्या, उनकी भुजाओं की संख्या, उनके हाथों में ली हुई वस्तुएं, उनके वाहन, उनके आसन, उनके आसपास का वातावरण आदि को अच्छी प्रकार से समझने पर ही हम अपनी छूपी हुई विशे षताओं , क्षमताओं, को पहचानकर एवं अपनी आत्मा को समझकर, उनके साथ जुड़कर अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं। अपने आप पर उपयुक्त नियंत्रण प्राप्त कर, प्रशिक्षित कर, एवं प्राण, मस्तिष्क, शरीर, एवं बुद्धि से संबंधित अभ्यास कर हम अपने आप को पा लेते है।

मंदिरों  आदि में प्रतिष्ठित मुर्तियों एवं उकेरे गए चित्रों की कई प्रकार से व्याख्या की जा सकती है। व्याख्या  व्यक्ति विशेष  की उसमें आस्था, श्रद्धा, विश्वास , धार्मिक परंपरा, एवं मानसिक सोच पर निर्भर करती है। विभिन्न मान्यताओं एवं संप्रदायों वाले व्यक्ति विभिन्न अर्थ निकालते हैं। दो प्रकार की व्याख्याएं हो सकती हैं एक तो सामान्य या पारंपरिक व्याख्या तथा दूसरी अधिक गहन आध्यात्मिक व्याख्या। उनमें से वो व्याख्या व्यक्ति के लिए अधिक उपयुक्त है जो कि स्वयं को आध्यात्मिक प्रगति में सहायक प्रदान करती है तथा एक श्रेष्ठ मानव बनाती है।

व्यक्ति मुर्तियों, चित्रों, की आराधना नहीं करता है, अपितु इनका उपयोग अपने मस्तिष्क की क्षमता को नकारात्मक गुणवत्ता  एवं आदतों पर विजय प्राप्त कर उच्च स्तरीय श्रेष्ठ गुणवत्ता  को अपने में सृजित करता है।

सनातन के पवित्र प्रतीक शीर्षक से प्रस्तुत की जा रही इस शृंखला में भी देवताओं एवं वस्तुओं से संबंधित प्रतीकों की व्याख्या करने का प्रयास किया जा रहा है। व्याख्या हेतु कई धार्मिक ग्रंथों  एवं अन्य स्रोतों के साथ ही स्वयं की समझ का भी उपयोग किया गया है। जैसा कि ऊपर उल्लैख किया गया है व्याख्या से सहमत होना या न होना व्यक्ति की पृष्ठभूमि, बौद्धिक क्षमता, मस्तिष्क के खुलेपन, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि पर निर्भर करता है। अतः कई उस व्याख्या से सहमत या असहमत हो सकते हैं, व्याख्या में कमी होना स्वाभाविक है, उसकी आलोचना भी कर सकते हैं।  अभिव्यक्ति करने के लिए सभी स्वतंत्र हैं। फिर भी कई जिज्ञासुओं की ज्ञान पिपासा को शांत करने के दृष्टिकोण से एक साथ एक जगह यह जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है और आशा  है कईयों को इससे लाभ प्राप्त होगा। 

                           प्रस्तुतकर्ता: दुष्यन्त अग्रवाल


दीपक Dipak सनातन का एक प्रतीक A Symbol of Hindu dharm

 

दीपक 

अन्य नाम: दीया] दीप] दीवा

महत्व: सनातन धर्म में दीपक को आत्यधिक महत्व प्राप्त है। अधिकांश  धर्मों में दीप प्रज्वलित किया जाता है। सनातन में हर शुभ कार्य यथा पूजा] शुभारंभ] गृह प्रवेश] विवाह आदि में दीप प्रज्वलन से प्रारंभ होता है। यह अत्यंत प्राचीन परंपरा है। दीपावली का तो नाम ही दीप पर रखा गया है जिसका अर्थ है दीपों की माला। दीपक में एक लघु पात्र होता है जिसमें खड़ी या आड़ी रूई से बनी बत्ती  लगाकर उसमें घी या तेल भरा जाता है] बत्ती को जलाया जाता है तो वह दीपक हो जाता है। दीप्ति का अर्थ प्रकाश  होता है और दीपक का कार्य प्रकाश  फैलाना है। अंतर्तम एवं बाह्य अंधकार को दूर करने का प्रतीक है दीपक। सामान्यतः बोलचाल में दीप के पात्र के लिए भी दीपक नाम का ही उपयोग होता है।

पुराणों में दीपक: कार्तिक मास के संदर्भ में दीपक का उल्लेख पद्म पुराण] स्कंद पुराण] अग्निपुराण आदि में हुआ है। भगवान शिव ने कार्तिकेय को बताया था कि घी या तेल का दान करने से अश्वमेध  यज्ञ का फल प्राप्त होता है। यमराज के अनुसार घर के द्वार पर दीपदान से अकाल मृत्यु से रक्षा होती है। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी। वरदान में प्राप्त हुआ कि जो तीन दिन दीपदान करेंगे उनके घर पर लक्ष्मी स्थाई रूप से निवास करेगी। अग्निदेव ने वशिष्ट मुनि को बताया कि कार्तिक मास में दीप दान करने से इच्छित फल प्राप्त होता है। दीपदान नेत्रज्योति] आयु] धन] पुत्र और सौभाग्य प्रदान करता है।


दीपावली के दीप: एक विश्लेषण  के अनुसार दीपावली के पांचों दिन जलाए जाने वाले दीपक मुख्यतः पांच संदेश  देते हैं। प्रथम दिवस-  धन तेरस को धन्वंतरी की पूजा की जाती है। वे स्वास्थ्य के देवता हैं। अतः इस दिन जलाए जाने वाले दीप  अच्छे स्वास्थ्य का संदेश  देते हैं । द्वितीय दिवस - रूप चौदस जिसे नरक चतुर्दशी  भी कहा जाता है इस दिन नरकासुर नामक राक्षस का वध किया गया था और संपूर्ण जन को राक्षसी चंगुल से मुक्त कर एक स्वच्छ एवं शुद्ध वातावरण का सृजन हुआ था। इस पर्व को तन एवं मन दोनों की सुंदरता को बढ़ाने वाला पर्व भी माना जाता है। अतः इसे शुद्धिकरण का संदेश  देने वाला दीपक कहा जा सकता है। तृतीय दिवस - इस दिन गणेश जी (रिद्धि सिद्धि प्रदाता)] लक्ष्मी (धन की देवी)] एवं सरस्वती (बुद्धि] विद्या एवं विवेक प्रदान करने वाली) की पुजा की जाती है। उक्त तीनों ही मानव की सर्वांगीण समृद्धि के द्योतक हैं। अतः दीपावली के दीप से समृद्धि का संदेश  प्राप्त होता है। इस दिन घर में समृद्धि को प्रकट करने वाली वस्तु का क्रय शुभ माना जाता है। अतः बर्तन] चांदी के सिक्के] वाहन आदि क्रय किए जाते हैं।  चतुर्थ दिवस - इस दिन गोबर से निर्मित आकृति बना कर गोवर्द्धन पूजा की जाती है। जो प्रकृति से प्राप्त गाय एवं उसके उत्पाद जिसे पंचगव्य  कहा जाता है प्राकृतिक संसाधन के प्रतीक हैं। अतः गोवर्द्धन पूजा प्रकृति के संरक्षण का संदेश  देती है। पंचम दिवस - इस दिन बहन के द्वारा भाई की सुरक्षा हेतु व्रत रखा जाता है जो कि रिश्तों  को बनाए रखने का संदेश  देता है। अतः भाई दूज के दीप को रिश्तों  का दीप मानना चाहिए।

दीपक कहां कहां जलाते हैं: सामान्यतः हर सनातन परिवार में प्रतिदिन दीपक जलाया जाता है। पूजनीय एवं श्रद्धा वाले स्थान पर सुबह, शाम को दीपक जलाया जाता है। देवताओं] wजनीय  वृक्षों एवं पौधों यथा पीपल] बरगद] बिल्व] शमी] आंवला] तुलसी आदि के समक्ष दीपक जलाये जाते हैं। सनातनी परिवारों में तो तुलसी के समक्ष दीपक प्रज्वलित किया ही जाता है।

दीपों के प्रकार: दीपक कई प्रकार के होते हैं। दीपक धातु] मिट्टी, पत्थर आदि से बनाए जाते हैं। दीपावली पर मिट्टी के दीपक जलाने का प्रावधान है। उसमें तेल या घी का उपयोग किया जाता है। छोटे, बड़े, समोई, आरती आदि दीपक के कुछ प्रकार हैं।

दीपक प्रज्वलित करने के तरीके: शनिदेव, पीपल, भैरव आदि के तेल का दीपक जलाए जाने का प्रावधान है। देवी देवताओं विशेषकर लक्ष्मीजी आदि के घी के दीपक का प्रावधान है। विशेष अवसरों पर आटे से बने दीपक जलाए जाते हैं जैसे कार्तिक मास में नदी एवं झीलों में आटे से बने दीप दान किए जाते हैं। आरती में  पांच बत्ती  का दीपक जलाया जाता है। कुछ विद्वानों का मत है कि एक ही स्थान पर घी एवं तेल का दीपक साथ साथ न जलाएं, एक ही प्रकार का दीपक जलाना चाहिए। दीपक जलाते समय भावना शुद्ध एवं मन में श्रद्धा होनी चाहिए।

 छटा प्रकरण: महालक्ष्मी 

अन्य नाम: श्री, कमला, पद्मा, रमा, पद्मिनी , इन्दिरा, विमला, आदि  

छवियां:  सामान्यतः महालक्ष्मी को लाल कमल पर लाल वस्त्रों में बैठी या खड़ी हुई अवस्था में दर्षाया जाता है। आसपास हाथी, स्वर्ण मुद्राएं एवं आभूषण आदि होते हैं। एक मुद्रा उनकी और है और वह है शेषशायी भगवान विष्णु के चरणों में बैठी हुई लक्ष्मी की। 

विष्णु की शक्ति:  महालक्ष्मी विष्णु की शक्ति की प्रतीक है। वे सर्वशक्तिमान ईश्वर के संरक्षकत्व का द्योतक हैं। यह इस बात को दर्शाता  है कि उसके माध्यम से ब्रह्मांड लयबद्ध रहता है। ब्रह्मांड की निरंतरता के लिए वो समस्त भौतिक सामग्री उपलब्ध कराती रहती है। इसी कारण सर्वाधिक लोकप्रिय मान्यता है कि वे संपदा एवं संपन्नता की देवी हैं। वे मातृशक्ति हैं सुंदरता, लयबद्धता एवं संतुलन की।

समुद्रमंथन से उनका प्रादुर्भाव: देवीय एवं आसुरी शक्तियों के सम्मिलित प्रयासों से वे निकलती हैं। यह इस बात का द्योतक है कि निरंतर अथक एवं कठीन प्रयासों से ही सफलता एवं संपन्नता अर्जित की जा सकती है।

लाल कमलासन: यह उस आध्यात्मिक मूल या आधार को दर्शाता  है जिससे कि समस्त भौतिक जगत का सृजन होता है। अर्थात हम अपनी आंतरिक शक्ति के द्वारा अपनी समस्त ईच्छाओं को वास्तविकताओं के रूप में फलीभूत कर सकते हैं।

विष्णु के चरणों में बैठी हुई लक्ष्मी: यह इस बात का प्रतीक है कि लक्ष्मी केवल विष्णु की है और उसपर केवल उनका ही अधिकार है। अर्थात धनसंपदा रूपी लक्ष्मी विष्णुरूपी पुरूषार्थ की ही है। पुरूषार्थ से ही भौतिक संसाधन अर्जित किए जा सकते हैं। 

लक्ष्मीजी शक्ति है भगवान विष्णु की: लक्ष्मी की शक्तियां वस्तुतः विष्णु की ही शक्तियां हैं और उनका उपयोग उन्हीं के कार्यों के लिए किया जाना चाहिए। हमारी स्वयं की आत्मा ईश्वर से अलग नहीं है अतः आत्मा के पास भी वे सभी शक्तियां हैं जो ईश्वर  के पास है। जिस प्रकार विष्णु अपनी शक्ति को ब्रह्मांड के संरक्षण के लिए प्रयुक्त करते हैं उसी तरह हमें भी अपनी संपदा का विश्व की भलाई के लिए उपयोग करना चाहिए। यदि हम केवल उसको संग्रहित करते हैं और उसका विश्व  की भलाई के लिए उपयोग नहीं करते हैं तो यह माना जाना चाहिए कि हम भगवान विष्णु के कार्य में सहयोग नहीं करते हैं।

स्वर्ण मुकुट: सर्वोच्चता का द्योतक।

एक हाथ में कमल: पूर्णरूप से विकसित आध्यात्मिक प्रसन्नता का प्रतीक है।

एक हाथ से गिरती स्वर्ण मुद्राएं: मां लक्ष्मी के आशीर्वाद का प्रतीक है।

हाथियों द्वारा सूंड से जल बरसाना: यह दर्शाता  है कि आध्यात्मिक संपदा के स्रोत अनंत है यह कभी समाप्त होने वालेेे नहीं हैं। यदि हम अपनी इस आध्यात्मिक संपदा, शक्ति एवं अन्य क्षमताओं को आध्यात्मिक एवं अन्य श्रेष्ठ कार्यों के लिए उपयोग करते हैं तो वह निरंतर बढ़ती ही हैं। 

नवरात्रि: नवरात्रि के नौ दिनों में मध्य के तीन दिवस मां लक्ष्मी को समर्पित हैं। प्रथम तीन दिन में मां दूर्गा सभी नकारात्मकता को हटा देती है तब मध्य के तीन दिनों मंे लक्ष्मी समृद्धता लाती है, लयबद्धता एवं सतुलन स्थापित होता है। और इसके बाद ही हमारा मस्तिष्क उच्च स्तरीय सोच की ओर बढ़ता है जिससे कि विवेक अर्थात सरस्वती प्राप्त होती है। 

अग्रवाल जाति की कुलदेवी :  महालक्ष्मीजी अग्रवाल जाति के प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन की इष्ट देवी हैं। उनके आशीर्वाद एवं कृपा से ही वे जीवन में सफल हुए।  अतः महालक्ष्मी अग्रवाल जाति की कुलदेवी हैं।       

  प्रस्तुति: दुष्यन्त अग्रवाल